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‘गो-गो की वापसी’ : बाल-संवेदना, जीवन-मूल्यों और कल्पनाशीलता का सशक्त कहानी-संसार

हिंदी बालसाहित्य का उद्देश्य केवल बच्चों का मनोरंजन करना नहीं है, बल्कि उनके व्यक्तित्व का समग्र विकास करना भी है। श्रेष्ठ बालसाहित्य वह है, जो बालक की सहज जिज्ञासा, कल्पनाशीलता, संवेदनशीलता और नैतिक चेतना को बिना किसी आरोपित उपदेश के विकसित करे। वह बालक को उसके परिवेश से जोड़ते हुए जीवन के विविध अनुभवों से परिचित कराए और उसके भीतर मानवीय मूल्यों का स्वाभाविक विकास करे। इसी दृष्टि से श्रीमती विमला रस्तोगी का बाल कहानी-संग्रह ‘गो-गो की वापसी’ उल्लेखनीय बाल कहानी संग्रह है।

इस संग्रह में कुल नौ कहानियाँ संगृहीत हैं- लाल मुर्गी, सबसे प्यारा घर, खरगोश की दुकान, गो-गो की वापसी, ऐसे बने रंगीन दिवाली, बच्चे कहाँ गये ?, झूठी शान, मेंढकी राजकुमारी तथा मिल गईं खुशियाँ। ये सभी कहानियाँ मनोरंजन और संस्कार का संतुलित एवं प्रभावी समन्वय प्रस्तुत करती हैं। प्रत्येक कहानी अपनी विशिष्ट कथाभूमि, पात्रों और घटनाक्रम के माध्यम से अलग पहचान बनाती है, किंतु इन सभी का मूल उद्देश्य बालमन में संवेदनशीलता, विवेक, नैतिक मूल्यों तथा सकारात्मक जीवन-दृष्टि का विकास करना है।

बालसाहित्य की पहली और सबसे महत्त्वपूर्ण कसौटी बाल-मनोविज्ञान है। यह संग्रह इस कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है। लेखिका ने बच्चों की रुचि, जिज्ञासा, कौतूहल, खेल-भावना और कल्पना को ध्यान में रखकर कथानकों का निर्माण किया है। कहीं रोमांच है, कहीं हास्य, कहीं भावुकता और कहीं समस्या के समाधान का संतोष। यही कारण है कि कहानियाँ बच्चों को आरंभ से अंत तक बाँधे रखती हैं। इनमें घटनाओं का क्रम सहज है और कथ्य बालकों के अनुभव-जगत के निकट है।

संग्रह की पहली कहानी ‘लाल मुर्गी’ साहस, सतर्कता और मातृत्व की कहानी है। लाल मुर्गी अपने बच्चों की रक्षा के लिए सदैव सजग रहती है। धूर्त लोमड़ी शन्नो की चालाकियों और लाल मुर्गी की सूझ-बूझ के बीच विकसित कथानक बच्चों में रोमांच उत्पन्न करता है। गले में सुई-धागा और कैंची रखने जैसी साधारण-सी बात अंत में संकटमोचक बन जाती है। इस छोटे से प्रसंग के माध्यम से लेखिका यह स्थापित करती हैं कि बुद्धिमानी और धैर्य कठिन परिस्थितियों में सबसे बड़े सहायक होते हैं। कहानी बच्चों को भयभीत नहीं करती, बल्कि संकट का सामना करने का आत्मविश्वास देती है।

‘सबसे प्यारा घर’ परिवार के महत्व को अत्यंत मार्मिक ढंग से स्थापित करती है। रानो बिल्ली और डब्बू मेमना घर छोड़कर स्वतंत्र जीवन का आकर्षण देखते हैं, परंतु जंगल की कठिनाइयाँ उन्हें यह अनुभव करा देती हैं कि घर जैसा सुरक्षित और प्रेमपूर्ण स्थान कहीं नहीं होता। भेड़ियों और भालू से बचने के लिए रानो की चतुराई कथा में रोमांच भर देती है, जबकि अंत में दोनों का घर लौटना यह संदेश देता है कि परिवार केवल रहने का स्थान नहीं, बल्कि सुरक्षा, अपनत्व और विश्वास का आधार है। लेखिका ने इस भाव को अत्यंत स्वाभाविक रूप में प्रस्तुत किया है।

‘खरगोश की दुकान’ ईमानदारी और परिश्रम की प्रतिष्ठा करने वाली कहानी है। मटकू खरगोश बिना मेहनत किए लाभ कमाना चाहता है और छल-कपट का सहारा लेता है। आरंभ में उसकी चतुराई सफल होती प्रतीत होती है, किंतु धीरे-धीरे उसका छल उजागर हो जाता है। अंततः उसे अपनी भूल का एहसास होता है और वह मेहनत तथा सत्यनिष्ठा का मार्ग अपनाता है। यह परिवर्तन कहानी का सबसे सशक्त पक्ष है। लेखिका ने उपदेश देने के बजाय पात्र के अनुभवों के माध्यम से यह स्पष्ट किया है कि विश्वास और ईमानदारी ही स्थायी सफलता का आधार हैं।

संग्रह की शीर्षक कहानी ‘गो-गो की वापसी’ भावनात्मक दृष्टि से सबसे प्रभावशाली रचनाओं में से एक है। गो-गो नामक बंदर केवल एक पालतू जीव नहीं, बल्कि परिवार का सदस्य बन चुका है। परिस्थितिवश उससे बिछुड़ना और फिर पुनः अपने प्रियजनों के पास लौट आना कथा को गहन संवेदनात्मक धरातल प्रदान करता है। कहानी यह संदेश देती है कि पशु भी मनुष्यों की भाँति प्रेम, अपनत्व और बिछोह का अनुभव करते हैं। नारियल तोड़ने वाले बंदरों के माध्यम से श्रम और ग्रामीण जीवन का यथार्थ चित्र भी उभरता है। वर्तमान समय में, जब बच्चों का जीव-जगत से संपर्क सीमित होता जा रहा है, यह कहानी पशु-प्रेम और करुणा का महत्त्व प्रभावी ढंग से स्थापित करती है।

‘ऐसे बने रंगीन दिवाली’ केवल त्योहार की कहानी नहीं, बल्कि श्रम, बचत, आत्मनिर्भरता और सामूहिक सहयोग की कथा है। कालेराम और लालेराम के विपरीत स्वभावों के माध्यम से लेखिका दिखाती हैं कि परिश्रम करने वाला व्यक्ति अभावों के बीच भी संतोष और सम्मान प्राप्त करता है, जबकि आलस्य अंततः पछतावे का कारण बनता है। चंपक वन के पशु-पक्षियों का सामूहिक प्रयास दिवाली को उत्सव से अधिक सामाजिक सहयोग का प्रतीक बना देता है। विशेष उल्लेखनीय बात यह है कि कहानी पटाखों और दिखावे से अधिक श्रम, सादगी और पर्यावरण के अनुकूल उत्सव मनाने की प्रेरणा देती है। इस प्रकार यह समकालीन संदर्भों से भी जुड़ती है।

‘बच्चे कहाँ गये ?’ संग्रह की अत्यंत संवेदनशील कहानी है। रतन द्वारा चिड़िया के घोंसले और उसके बच्चों के प्रति दिखाया गया स्नेह बच्चों के भीतर प्रकृति और जीव-जगत के प्रति आत्मीयता जगाता है। जब घोंसले से बच्चे गायब हो जाते हैं तो कथा में स्वाभाविक कौतूहल उत्पन्न होता है। अंत में उनका सुरक्षित मिल जाना बच्चों के मन में राहत और प्रसन्नता का भाव उत्पन्न करता है। साथ ही किशन के व्यवहार के माध्यम से यह संदेश भी मिलता है कि पक्षियों और छोटे जीवों को हानि पहुँचाना अनुचित है। कहानी पर्यावरणीय चेतना और जीवों के संरक्षण का सहज पाठ पढ़ाती है।

‘झूठी शान’ सामाजिक व्यवहार और मानवीय संबंधों की कहानी है। मनकू अपने रूप और बाहरी आडंबर पर गर्व करता है तथा दूसरों को तुच्छ समझता है। लेकिन जब वह स्वयं संकट में पड़ता है, तब वही पड़ोसी और मित्र उसकी सहायता करते हैं जिन्हें वह कभी महत्व नहीं देता था। यह अनुभव उसके अहंकार को समाप्त कर देता है। कहानी का सबसे बड़ा गुण यह है कि इसमें नैतिक शिक्षा घटनाओं के माध्यम से आती है, उपदेश के रूप में नहीं। बच्चों को यह संदेश सहज रूप से मिलता है कि व्यक्ति की पहचान उसके व्यवहार और सहयोग की भावना से होती है, न कि बाहरी दिखावे से।

‘मेंढकी राजकुमारी’ लोककथा की परंपरा से जुड़ी कहानी है। साधारण रूप में दिखाई देने वाली मेंढकी वास्तव में गुणों, बुद्धिमत्ता और संवेदनशीलता से सम्पन्न राजकुमारी होती है। सबसे छोटा पुत्र उसके प्रति विश्वास और सम्मान का व्यवहार करता है, जबकि अन्य लोग केवल बाहरी रूप देखते हैं। अंत में मेंढकी का वास्तविक रूप प्रकट होना यह संदेश देता है कि मनुष्य का मूल्य उसके रूप से नहीं, बल्कि उसके गुणों और कर्मों से निर्धारित होता है। लोककथा की शैली, जादुई वातावरण और रोचक घटनाएँ बच्चों की कल्पनाशक्ति को समृद्ध करती हैं।

संग्रह की अंतिम कहानी ‘मिल गयीं खुशियाँ’ आधुनिक जीवन की पृष्ठभूमि पर रची गई अत्यंत मार्मिक कहानी है। तरुणिमा (तरु) प्रारंभ में मोबाइल और टेलीविजन की दुनिया में खोई हुई बच्ची है, जिसे दूसरों से अधिक लगाव नहीं है। एक असहाय बिल्ली के बच्चे ‘स्वीटी’ की देखभाल करते-करते उसके भीतर करुणा, जिम्मेदारी और प्रेम का विकास होता है। स्वीटी के खो जाने पर तरु की व्याकुलता और पुनः मिल जाने पर उसकी प्रसन्नता कहानी को भावनात्मक ऊँचाई प्रदान करती है। यह कहानी स्पष्ट करती है कि पशुओं के प्रति स्नेह मनुष्य के भीतर मानवीय संवेदनाओं को और अधिक विकसित करता है। डिजिटल युग में बच्चों के बदलते जीवन-संदर्भों को देखते हुए यह कहानी विशेष रूप से प्रासंगिक बन जाती है।

इन सभी कहानियों का सामूहिक अवलोकन करने पर स्पष्ट होता है कि लेखिका ने जीवन-मूल्यों की प्रस्तुति में अत्यंत संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है। कहीं भी उपदेशात्मकता का बोझ नहीं है। पात्र स्वयं अपने अनुभवों से सीखते हैं और वही सीख पाठक तक पहुँचती है। यह शैली बाल साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता मानी जाती है। यदि नैतिक संदेश कथा पर आरोपित हो जाए तो बालक की रुचि समाप्त हो जाती है, किंतु विमला रस्तोगी ने इस खतरे से स्वयं को बचाए रखा है।

संग्रह की भाषा सरल, सहज, प्रवाहपूर्ण तथा बालकों की ग्रहण-क्षमता के अनुरूप है। कठिन शब्दों का अनावश्यक प्रयोग नहीं किया गया है। छोटे-छोटे वाक्य, स्वाभाविक संवाद और बोलचाल की शैली कथाओं को जीवंत बनाती है। संवाद पात्रों के स्वभाव के अनुरूप हैं तथा कथानक को गति प्रदान करते हैं। भाषा में साहित्यिक गरिमा भी बनी रहती है और बालसुलभ सहजता भी।

शिल्प की दृष्टि से भी यह संग्रह उल्लेखनीय है। प्रत्येक कहानी का आरंभ आकर्षक है, मध्य भाग में घटनाओं का क्रम स्वाभाविक रूप से विकसित होता है और अंत संतोषप्रद तथा प्रभावपूर्ण है। कथानकों में अनावश्यक विस्तार नहीं है। लेखिका ने छोटे-छोटे प्रसंगों के माध्यम से बड़े जीवन-सत्य व्यक्त किए हैं। यही संक्षिप्तता और कसावट कहानियों को प्रभावी बनाती है।

कल्पनाशीलता इस संग्रह का एक और सशक्त पक्ष है। पशु-पक्षियों का मानवीकरण, लोककथा का वातावरण और बाल-कल्पना के अनुरूप घटनाओं का विकास बच्चों को आनंदित करता है। साथ ही कहानियाँ यथार्थ से भी जुड़ी रहती हैं। यही कारण है कि पाठक कल्पना के संसार में विचरण करते हुए भी वास्तविक जीवन के अनुभवों से जुड़ा रहता है।

समकालीन दृष्टि से देखें तो यह संग्रह आज के समय की अनेक चुनौतियों को भी स्पर्श करता है। पर्यावरण संरक्षण, पशु-प्रेम, परिवार का महत्व, श्रम की प्रतिष्ठा, डिजिटल उपकरणों पर बढ़ती निर्भरता, सामाजिक सहयोग और मानवीय संवेदनाएँ, ये सभी विषय आज के बच्चों के लिए अत्यंत प्रासंगिक हैं। लेखिका ने इन्हें सहज कथात्मक शैली में प्रस्तुत कर कहानियों को समयानुकूल बना दिया है।

यदि आलोचनात्मक दृष्टि से विचार करें तो कुछ कहानियों में अंत अपेक्षाकृत शीघ्र आता है और कुछ प्रसंगों का विस्तार किया जा सकता था। कहीं-कहीं नैतिक निष्कर्ष अधिक स्पष्ट रूप में सामने आता है। फिर भी ये छोटी-छोटी सीमाएँ संग्रह की समग्र साहित्यिक गुणवत्ता को प्रभावित नहीं करतीं, क्योंकि बाल साहित्य में संक्षिप्तता और स्पष्टता भी आवश्यक गुण हैं।

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि ‘गो-गो की वापसी’ एक ऐसा बाल कहानी-संग्रह है, जो बालसाहित्य की प्रमुख कसौटियों बाल-मनोविज्ञान, मनोरंजन, कल्पनाशीलता, भाषा की सहजता, कथानक की रोचकता, मूल्यबोध, सामाजिक सरोकार तथा संवेदनात्मक प्रभाव पर सफल सिद्ध होता है। इसकी कहानियाँ बच्चों को केवल पढ़ने का आनंद ही नहीं देतीं, बल्कि उन्हें बेहतर मनुष्य बनने की प्रेरणा भी प्रदान करती हैं। यही किसी भी श्रेष्ठ बालसाहित्य की सबसे बड़ी उपलब्धि है। निस्संदेह, विमला रस्तोगी का यह बाल कहानी संग्रह हिंदी बालसाहित्य की समृद्ध परंपरा में एक सार्थक और मूल्यवान योगदान है, जिसे बाल पाठकों के साथ-साथ अभिभावकों, शिक्षकों तथा बालसाहित्य के अध्येताओं द्वारा भी समान रुचि और सम्मान के साथ पढ़ा जाना चाहिए।

किताब : ‘गो-गो की वापसी’ (बाल कहानी-संग्रह),

लेखिका : विमला रस्तोगी, मूल्य : 175 रुपये,

प्रकाशक : श्वेतावर्ण प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण : 2024

समीक्षक : डॉ. उमेशचन्द्र सिरसवारी

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