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मौसम ने बदला रंग

प्यासी धरती पुलक उठी
जब वर्षा का संकेत मिला।

मरुभूमि के सूखे तन पर
हरित विहँसता रूप खिला।

चपला चमकी नभ के उर में
झम झम वर्षा होने लगी।

मौसम ने बदला अपना रंग
चहुँ ओर नव उमंग छाने लगी।

धूल धूसरित पल्लव तरु के
वर्षा में भीगकर नव्य हुए।

चातक,मोर,पपीहे के संग
सारे उपवन भव्य हुए।

झर झर गिरते निर्झर मानो
गाने लगे राग मल्हार।

अंकुर फूट पड़े माटी से
वृष्टि ने किया भू का श्रृंगार।

प्रकृति का यह नव रंग सिखाता
नूतनता को सहर्ष अपनाना।

समय बुरा हो या हो अच्छा
कर्म के पथ पर बढ़ते जाना !!!

स्मृति श्रीवास्तव
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