ज्ञानामृत का पान हमें, प्रति दिवस कराते हैं गुरुवर। शिष्य बने कंगूरा, नींव शिला बन जाते…
Category: कविता
तमसो मां ज्योतिर्गमय
अंतहीन रजनी के तिमिर में नन्हीं दीपशिखा है प्रज्ज्वलित। अभिलाषाओं की चिंगारी गहन अंधेरे में भी…
मौसम ने बदला रंग
वर्षा ऋतु की मनोहारी छटा, प्रकृति का नव श्रृंगार, हरियाली, उमंग और कर्म का संदेश समेटती…
तारों के बीच बैठा मैं
रात चांदनी की चादर ओढ़े है, तारे अपनी शाश्वत भाषा में टिमटिमा रहे हैं, और मैं…
रूठती मैं पहले भी थी, अब भी रूठती हूँ पर…
पहले रूठती थी तो पापा जी झट से मुझे गुदगुदी करते, गोदी में झूला झुलाते, या…