योग भक्ति श्रेष्ठ है,
ना आग्रह है ना विग्रह
भक्ति भाव से मिलता अनासक्ति योग
योग भक्ति है देता निरोगी काया
होगा भक्ति योग से वह प्राप्त
जहाँ रोग नहीं, न मृत्यु है न बुढ़ापा
मिलता परम शांति जहां किसी का
अभाव नहीं शरीर में प्राण फूंके
आत्मा को मिले ऐसी उमंग,
भर देते तन-मन में ताजगी
योग से करो ऐसी भक्ति,
कि शरीर के अंग शुद्ध हो जाते
फिर आत्मा से परमात्मा मिल जाते
जैसे अंधियारे में दीप जल जाते हैं।
जो कहते हैं हमें आज तक परमात्मा
नहीं मिले,भाव योग करके देखो
शुद्ध मन से, भक्ति से
हर योग से हर रोग हरे,
मिले परमात्मा की झलक
यही योग भक्ति का भाव विधान।।
