जूना बिलासपुर के 11 प्राचीन घाट उपेक्षा के साए में, इतिहास बन रहा खंडहर

माँ बिलासा की नगरी बिलासपुर की पहचान उसके इतिहास, संस्कृति और मां अरपा नदी की पावन धारा से रही है। कहा जाता है कि शहर की पहली बसाहट जूना बिलासपुर ही थी, जो जलदायिनी अरपा के किनारे-किनारे बसी थी। जब बिलासपुर गांव के रूप में अपना आकार ले रहा था, तब यहां केवट-मल्लाह समुदाय की बस्तियां अधिक थीं। इन्हीं में से एक समूह बिलासा केवंटिन का भी था, जिनके नाम पर आगे चलकर इस नगर का नाम बिलासपुर पड़ा।

ऐतिहासिक जूना बिलासपुर क्षेत्र में अरपा नदी के तट पर कभी 11 घाट जीवंत थे

मोपका नाका घाट, बड़घाट, काली मंदिर घाट, डोंगा घाट, डुमर घाट, जनकबाई घाट, साव धर्मशाला घाट, केंवटपारा घाट, बिलासपुर घाट और पचरी घाट सहित कई अन्य घाट आज भी मौजूद है और अपने पुराने दिनों की याद में उद्धार की  राह तक रहे हैं।कभी इन घाटों पर जीवन धड़कता था। सुबह-सुबह स्नान-ध्यान, पूजा-पाठ की आवाजें गूंजती थीं। वहीं स्थानीय महिलाएं व धोबी कपड़े धोते, बच्चे नदी की रेत पर खेलते-कूदते आमतौर‌ पर नजर आते थे। यह नजारे 80 दशक के के उत्तरार्ध तक दिखाई पड़ते थे जो इसके बाद धीरे-धीरे जैसे-जैसे नदी के रेत और पानी खत्म हुआ फिर उपर से नदी की साफ सफाई भी उसी रफ्तार से खत्म होती गई। शहर बढ़ता गया आबादी बढती गई बस्तियां आबाद होती गईं…वहीं अरपा नदी मरती चली गई। नदी की पावनता पर हमने जो ग्रहण लगाया तो घाटों की जीवंतता, चहल-पहल और पवित्रता उपयोगिता भी समाप्त हो चली। आज हालात यह है कि सब घाट सूने हैं गंदे हैं। कूड़े करकट के ढेर से पटे हुए हैं। और तो और लोगों ने यहां हद ही कर दी है कि घाट पर ही बेजाकब्जा कर अवैध निर्माण कर लिया। आज नदी और घाटों की यह दुर्दशा देखने पर मन बड़ा ही विदीर्ण हो उठता है।नदी और नदी के घाटों को देखकर मन विचलित और उदास हो उठता है। 

उन दिनों घाट पर रौनक और चहलपहल थी

उन दिनों में नदी पार से व्यापारियों, किसानों की आवाजाही घाट पर बनी रहती थी, कृषि उपज, फल-फूल, दूध दही लेकर वे इन घाटों के जरिये ही शहर आते थे। शहर में मवेशी, गायें भी भारी संख्या में पाले जाते थे। इनकी बरदी (टोली) जब जूना बिलासपुर की गलियों से होते हुए घाट होकर नदी की ओर जाती हुई गायों की टोली को देखने पर बड़ी मनमोहक लगता था। ये जीवन का राग सुनाते हुए दिन स्वर्ग का साक्षात दृश्य पैदा करती थी। प्रतिदिन इन्हीं गलियों में एक क्रम में ये गाएं जब नदी घाट होकर जूना बिलासपुर की गलियों में  फिर शाम के समय में लौट कर आती थीं तो शाम के धुंधलके में सूर्य की तिरछी लालिमायुक्त किरणों से वह क्षण एक अलौकिक आनंद से भर जाता था। गोधूलि की इस बेला में  सड़क पर क्रम से जाती हुई गायों का झुंड, इस‌ दौरान बछडों का रंभाना उड़ती हुई धूल,चरवाहों के द्वारा सीधे चलने के लिए गायों को आवाजें देना, फिर गायों के गले में बंधी हुई घंटियों की टनटनाहटों से वह दृश्य ही अलौकिक हो उठता था। 

 नदी घाट को कर दिया गया पूरी तरह उपेक्षित

उन दिनों नदी तट पर बने हुए घाटों में दिनभर अक्सर काफी चहल-पहल बनी रहती थी। नदी के इन किनारों में सामाजिक मेलजोल, परंपराएं और स्थानीय संस्कृति की धारा बहती थी। लेकिन आज दृश्य पूरी तरह बदल चुका है।कभी जीवन से भरपूर ये घाट अब वीरान, जर्जर और गंदगी से पटे पड़े हैं।कहीं झाड़-झंखाड़ उग आए हैं, तो कहीं अवैध कचरा डंपिंग का अड्डा बन चुका है। और तो और इन घाटों का स्वरूप भी काफी बदलकर खस्ता हाल में पहुंच चुका है। ऊपर से तुर्रा यह है कि लोगों ने घाटों के ऊपर ही अवैध मकान बनाकर कब्जा किया हुआ है। अब आलम यह है कि इन घाटों की ओर कोई रूख भी नहीं करता और न ही इनके रखरखाव की कोई फिक्र है।अब तो कोई इधर जाना भी नहीं चाहता। 

वह भी क्या दिन थे

उन दिनों अरपा नदी में बारहों महीने स्वच्छ जल प्रवाहित होता रहता था। लोगों का निस्तार नहाना धोना, कपड़े धोना, पूजा पाठ करना लोगों की दिनभर की दिनचर्या मानो इन्ही घाटों और नदी के तट पर ही गुजरती थी। नदी के रेतीले जगहों में चारों ओर हरीयाली भरपूर छाई रहती थी। यहां के स्थानीय केवट नदी की रेत में  कोचई, कांदा, ककड़ी, कद्दू, लौकी जैसे फसलों को भरपूर मात्रा में उगाया करते थे। नदी का रेत नहीं हुआ मानो बाग बगीचों का संसार हो और इनमें लगी हुईं हरी-भरी लताएं, पेड़ पौधे भरपूर लगे हुए बड़े मनभावन लगते थे। फिर नदी का रेत जैसे-जैसे खत्म हुआ वैसे वैसे ही ये बाडियां और हरियाली भी खत्म हो गई। अब तो नदी के हर तरफ पानी का बहाव रुकने से बदबू और गंदगी ने वातावरण दूषित कर दिया है। फिर ना जाने कहां से जलकुंभी जैसे प्रदूषित करने वाले पौधों ने नदी में डेरा जमा लिया तो नदी की रही सही स्वच्छता भी समाप्त हो गई।

अरपा के घाटों की दुर्दशा के लिए नौकरशाही भी जिम्मेदार

अरपा नदी की दुर्दशा के साथ-साथ अरपा के घाटों को भी पूरी तरह से दूरावस्था में पहुंचा दिया गया है। ये घाट शहर की  पहचान थे, शहर की संस्कृति और संस्कार के वाहक थे। इन्हें भी आज महज स्वार्थ पूर्ति के लिए मटियामेट कर दिया गया है। अधिकारीवर्ग जो शहर की संस्कृति, संस्कार और विरासत से पूरी तरह अनभिज्ञ हैं, वे बेदर्दी से नदी और नदी के घाटों की उपेक्षा कर विकास का ढोल‌ पीट रहे हैं। फलतःअब घाट पूरी तरह समाप्त हो गए हैं। जब तक इनका संरक्षण और विकास नहीं किया जाएगा शहर की पहचान भी उसी तरह मिट जाएगी। 

सोमनाथ यादव
पूर्व अध्यक्ष, पिछड़ा वर्ग आयोग एवं
 संयोजक, अरपा बचाओ अभियान
सोमनाथ यादव
पूर्व अध्यक्ष, पिछड़ा वर्ग आयोग एवं
 संयोजक, अरपा बचाओ अभियान

स्थानीय धरोहर के संरक्षण की पुकार, प्रशासन की उदासीनता पर उठ रहे सवाल

सबसे चिंता की बात यह है कि इनकी देखरेख करने वाला कोई नहीं। स्थानीय निकाय से लेकर प्रशासन तक सभी इनकी ओर से बेखबर या उदासीन दिखाई देते हैं। नतीजतन, शहर की यह ऐतिहासिक धरोहर अपनी पहचान और अस्तित्व खोने के कगार पर है। विशेषज्ञों और इतिहासकारों का मानना है कि ये घाट सिर्फ पत्थरों की सीढ़ियां नहीं थे, बल्कि बिलासपुर की सांस्कृतिक जड़ों, तटवर्ती सभ्यता और केवट मल्लाह परंपरा के जीवित साक्ष्य थे। यदि समय रहते इनका संरक्षण, सौंदर्यीकरण और ऐतिहासिक पुनरुद्धार नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां इस धरोहर के महत्व से अनभिज्ञ रह जाएंगी। स्थानीय समाजसेवी और जानकार भी इस ओर ध्यान आकर्षित कर रहे हैं कि”शायद प्रशासन को लगता है कि अब ये घाट बेकार हैं, लेकिन सच यह है कि ये बिलासपुर के इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं, जिन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए।आज आवश्यकता है-घाटों की साफ-सफाई और पुनरोद्धार ऐतिहासिक महत्व को दर्शाने वाले सूचना पट्ट लगाने की ताकि लोग इसके महत्व और उपयोगिता को अच्छी तरह से जान सकें। तटवर्ती क्षेत्र का सौंदर्यीकरण किया जाना भी आवश्यक है। 

स्थानीय समुदाय को जोड़ते हुए संरक्षण अभियान

अरपा नदी पुनर्जीवन के साथ घाटों को सांस्कृतिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करना।यदि समय रहते पहल नहीं हुई, तो जूना बिलासपुर के ये 11 घाट केवल कहानियों में जिंदा रह जाएंगे, और शहर अपनी एक अनमोल विरासत सदा-सदा के लिए खो देगा। 

अरपा की गोद में बसे थे जो घाट, 
अब सूने-सूने रोते हैं, कभी 
जहाँ जीवन गाता था, 
आज गंदगी और सन्नाटे ही सोते हैं 
कहाँ गई वो रौनकें प्यारी? 
कूड़े तले दबकर, इतिहास भी 
बेचारी हो गई अरपा के घाट पुकारें हमें 
“अब तो बचाओ मुझे, मेरे हिस्से की 
संस्कृति संस्कार विरासत सँभालो।।”

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
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