-26 जनवरी गणतंत्र दिवस पर विशेष-
प्रत्येक वर्ष 26 जनवरी को हमारा देश गणतंत्र दिवस के रूप में राष्ट्रीय पर्व मनाता है। यह दिन हमारे लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इसी दिन 1950 में स्वतंत्र भारत का संविधान लागू हुआ था। स्वतंत्रता प्राप्ति का पर्व 15 अगस्त भी उतना ही महत्वपूर्ण है, परंतु 26 जनवरी को संविधान द्वारा मिली स्वायत्तता और कानून की परिधि में स्वतंत्रता का वास्तविक रूप साकार हुआ। 26 जनवरी 1950 से पहले तक, हम ब्रिटिश शासन की परोक्ष परतंत्रता में ही जीवन यापन कर रहे थे। संविधान में उल्लिखित उद्घोष “हम भारत के लोग भारत को संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए संकल्पित हैं” यह सुनिश्चित करता है कि 26 जनवरी केवल एक तिथि नहीं, बल्कि संपूर्ण स्वतंत्रता का प्रतीक है।

2026 में, हम गणतंत्र दिवस की 77वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। यह एक ऐसा अवसर है जब हमें आत्ममंथन करने की आवश्यकता है कि हमने इन 77 वर्षों में क्या खोया और क्या पाया। 1947 में मिली स्वतंत्रता के बाद हमने एक समृद्ध, स्वावलंबी और समानता पर आधारित भारत का सपना देखा था। लेकिन 77 वर्षों की यात्रा में हम जिस स्थिति में खड़े हैं, वह आत्मगौरव के साथ-साथ आत्मावलोकन का भी विषय है।
उपलब्धियां
- वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति: भारत ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। चंद्रयान और मंगल मिशन जैसे उपलब्धियों ने भारत को विश्व मंच पर अग्रणी बनाया।
- कृषि और उद्योग: हरित क्रांति के माध्यम से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की गई और औद्योगिक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त हुआ।
- शिक्षा और स्वास्थ्य: शिक्षा के क्षेत्र में साक्षरता दर में वृद्धि हुई और कई प्रतिष्ठित संस्थानों का निर्माण हुआ। स्वास्थ्य के क्षेत्र में पोलियो उन्मूलन और कोविड-19 वैक्सीनेशन जैसे प्रयास उल्लेखनीय हैं।
- सामाजिक समरसता: संविधान द्वारा समानता, धर्मनिरपेक्षता, और सामाजिक न्याय को प्रमुखता दी गई, जिसने समाज में समरसता का आधार प्रदान किया।
चुनौतियां
- भ्रष्टाचार और स्वार्थपूर्ण राजनीति: राजनीति सेवा का माध्यम बनने के बजाय स्वार्थ और शक्ति का साधन बन गई है। भ्रष्टाचार व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है।
- आर्थिक असमानता: देश में आर्थिक विषमता का स्तर चिंताजनक है। अमीर और गरीब के बीच की खाई लगातार बढ़ रही है।
- सामाजिक विघटन: जातीयता, सांप्रदायिकता, और क्षेत्रीय असमानता ने समाज को विभाजित कर दिया है।
- न्याय प्रणाली की खामियां: न्याय प्रणाली की जटिलता और विलंबता ने आम आदमी के लिए न्याय को दुर्लभ बना दिया है। लाखों मुकदमे दशकों से लंबित हैं।
हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का गर्व तो करते हैं, लेकिन क्या हमारा लोकतंत्र वास्तव में मजबूत है? 77 वर्षों के बाद भी जनता की भागीदारी सीमित है। धन और बाहुबल का राजनीति पर बढ़ता प्रभाव लोकतंत्र की आत्मा पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

