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खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

18 जून महारानी लक्ष्मीबाई बलिदान दिवस पर विशेष-

काशी में जन्मी, विठूर में पली बढ़ी, झांसी में रानी का पद प्राप्त करने वाली लक्ष्मी बाई का जीवन संघर्षों की कहानी हैं। सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेज़ों से टक्कर लेने वाली और ग्वालियर में अंग्रेज़ों से ही युद्ध करते हुये प्राणोत्सर्ग करने वाली वीरांगना लक्ष्मी बाई का साहस और व्यक्तित्व उनके हर कार्य में छलकता था।

सन् 1853 ई. में गंगाधर राव की मृत्यु हो जाने पर रानी को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। एक ओर सदाशिव राव भाऊ अपने को झांसी की गद्दी का असली उत्तराधिकारी होने का दावा कर रहे थे, तो दूसरी ओर पड़ोसी राज्य ओरछा की लड़ाई में सरकार झांसी राज्य हड़पने की योजना बना रही थी, ऊपर से अंग्रेजों की गिद्ध दृष्टि भी झाँसी पर लगी हुई थी। रानी लक्ष्मी बाई तीनों ओर से घिरी हुई थी।

अंग्रेजों ने राजा रानी द्वारा गोद लिये – बालक दामोदर राव को उत्तराधिकारी स्वीकार नहीं किया। झाँसी की सेना अव्यवस्थित थी, युद्ध का सामान नहीं था। रानी के चारों ओर भयावह स्थिति थी। ऐसी विषम परिस्थितियों में लक्ष्मी बाई ने बड़े धैर्य और साहस से कार्य किया।

 उन्होंने अपने चारों ओर मंडराते हुये युद्ध के बादलों को छितराने के लिये युद्ध सामग्री को एकत्रित किया। पहली बार रानी लक्ष्मी बाई ने स्त्रियों को युद्ध की शिक्षा देकर उनका अलग से सैन्य दल बनाया। सेना सुव्यवस्थित होते ही रानी ने सदाशिवराव पर आक्रमण कर उसे पराजित किया। ओरछा राज्य के सेनापति को युद्ध के मैदान से भगाया। वह अंग्रेज़ों से जा मिला किंतु रानी ने इसकी चिंता नहीं की। अंग्रेज़ों की दृष्टि पहले से ही झाँसी पर लगी हुई थी।

जब अंग्रेज़ों ने अपने मित्र राज्य ओरछा की सेना की पराजय सुनी तो वे चौकन्ने हो गये। यह ऐसा था जब देश में अंग्रेज़ों के विरोध में आग सुलग रही थी। बिठूर में नाना साहब पेशवा और तात्या टोपे अंग्रेजों से लोहा ले रहे थे अत: उद्देश्य एक था, अतः दोनों ही एक दूसरे की मुसीबत के समय सहायता को हमेशा तत्पर थे। रानी ने मर्दन सिंह को लिखे एक पत्र में लिखा था कि-” विदेशियों का शासन भारत वर्ष में नहीं होना चाहिये।” मर्दन सिंह ने भी रानी के विचारानारूप उनका तब तक साथ दिया जब तक कि वे जेल के सीखंचों के बाहर रहे।

‌ ह्युरोज की सेना के आगे मर्दन सिंह टिक नहीं सके। वे भागकर वसोदिया चले गये। ह्युरोज़ ने वहाँ भी आक्रमण कर दिया। मर्दन सिंह को यहाँ से भी भागना पड़ा। हयूरोज विद्रोहियों को हराता हुआ सागर पहुँचा। सागर से उसने झांसी के लिये कूच किया। रास्ते में उसने मर्दन सिंह और बखतवली को हराते हुये बानपुर पर भीषण आक्रमण किया। वहाँ से झाँसी की ओर बढ़ा।

जनरल गेर के साथ ह्युरोज़ अपनी सशस्त्र सेना के साथ झाँसी पहुँचा। झाँसी के किले को उसने चारो ओर से घेर लिया। ऐसी विषम स्थिति में रानी ने तात्या टोपे को सहायता के लिये पत्र लिखा। इस समय तक मर्दन सिंह और बखतबली भागकर कालपी गये थे।

झाँसी की ओर प्रस्थान करने के लिये तात्या टोपे नाना साहब से अनुमति प्राप्त कर बाईस हज़ार सैनिकों के साथ झांसी की ओर बढ़े, किंतु वह कुछ समय के लिये चरखारी में उलझ गये। वहाँ से चलकर तात्या टोपे ने मऊ में मुकाम किया। यहाँ से उसने झांसी की स्थिति का पता लगाकर युद्ध की घोषणा की। किंतु यह सेना झांसी तक नहीं पहुँच पाई। हयुरोज़ की सेना ने तात्या टोपे की सेना को झांसी के बाहर ही हटा दिया।

अंग्रेज़ी सेना ने झांसी के किले में बार-बार आक्रमण कर झांसी पर कब्ज़ा कर लिया। रानी को झांसी को छोड़ने पर बाध्य होना पड़ा। ह्युरोज़  को झांसी पर कब्जा करने के लिये वीरांगना लक्ष्मी बाई के साथ कठिन संघर्ष करना पड़ा था। उसने रानी की रणनीति, वीरता, युद्ध संचालन की बड़ी प्रशंसा की है। वहीं अंग्रेजों से अपने को बचाती हुई रानी कालपी पहुँच गई। कालपी में रहकर रानी ने पुनः सैन्य संगठन और युद्ध करने की योजना बनाई। हयुरोज़ भी मौन नहीं बैठा था।

उसने एक भारी सेना कालपी पर अधिकार करने के लिये भेज़ दी। विद्रोहियों ने युद्ध में डटकर अंग्रेज़ों का सामना किया और महारानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों पर पर टूट पड़ी। घोड़े पर सवार, मुँह में लगाम थामे पीठ पीछे बालक दामोदर को बांधे और हाथ में भुजाला लिये रानी दोनों ओर से बैरियों को काटते हुये अपने सैनिकों को प्रोत्साहन दे रही थीं, किंतु अंग्रेजों के निरंतर आक्रमण के कारण रानी को युद्ध मैदान छोड़ना पड़ा।

कालपी का किला भी अंग्रेज़ी के अधिकार में आ गया। रानी के साथ सभी विद्रोही कालपी छोड़कर ग्वालियर चले गये और वहाँ के किले पर अधिकार कर लिया। किंतु हयुरोज भी अपनी सेना लेकर ग्वालियर की ओर बढ़ा और मुरार नामक स्थान पर अपनी छावनी डाल दी। ग्वालियर का युद्ध रानी लक्ष्मीबाई अंतिम युद्ध था।

रानी ने अंतिम सांस तक अंग्रेजो से युद्ध करते हुये वीरगति प्राप्त की। रानी लक्ष्मी बाई के धैर्य, साहस, रणनीति, युद्ध संचालन की सराहना स्वयं ह्यूरोज सहित अन्य तात्कालिन अंग्रेजों ने भी की है। धन्य है वह वीरांगना जिसने अपनी वीरता से दुश्मन को भी अपनी प्रशंसा करने को बाध्य कर दिया। तभी तो कवियित्री सुभद्रा कुमारी चौहान ने लिखा है – 

“खूब लड़ी मर्दानी वह तो

 झांसी वाली रानी थी…..।”

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