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सोलह कलाओं और विविध भूमिकाओं के साथ विलक्षण श्री कृष्ण

कृष्ण जन्माष्टमी पर्व पर विशेष-

कहते हैं जब जब धरती पर अत्याचार और पाप बढ़ जाते हैं ,अधर्म का बोलबाला बढ़ जाता है। तब तब अवतारी पुरुष इस धरा पर जन्म लेते हैं, और वे ही पृथ्वी पर हो रहे अत्याचारों और पाप को खत्म करते हैं, धर्म की स्थापना और अधर्म का नाश करते हैं। ठीक ऐसे ही द्वापर युग में घोर अत्याचारी राजा कंस का दूराचार और अधर्म अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच चुका था। जन जन में त्राहि-त्राहि मची हुई थी।, यह सब देखकर पृथ्वी इतनी ज्यादा व्यथित हुई कि वह व्याकुल हो उठी, तब उसने अपनी समस्या निदान की भगवान विष्णु से प्रार्थना की, विष्णु ने उन्हें आश्वासन दिया कि – “हे पृथ्वी तू चिंतित हो रही है मैं बहुत जल्दी ही तेरी छाती का भार हल्का कर दूंगा। जा तू​ निश्चिंत रह मैं शीघ्र ही अवतार लेकर कंस का वध कर दूंगा। पृथ्वी पर बढे पाप अधर्म और चारों ओर मचे हाहाकार को खत्म करूंगा।” पृथ्वी यह सुनकर बड़ी प्रसन्नचित वापस लौटती है। 

उधर कंस की राजधानी इस समय मथुरा थी। उसने अपने न्यायप्रिय पिता को बेड़ियों में जकड़कर काल कोठरी में डाल दिया था और स्वयं जबरदस्ती राजा बन बैठा था। कंस के इस कदम से किसी को जरा भी प्रसन्नता नहीं हुई उल्टे हर कोई बहुत दुखी हुआ, पर किसी की भी हिम्मत नहीं थी कि वह उसके विरुद्ध कोई भी टिका टिप्पणी कर सके‌। सो सभी ने मुंह सी लिया था। कंस की एक बड़ी लाड़ली बहिन देवकी थी, उसने उसका विवाह अपने ही दरबार के उच्चाधिकारी वसुदेव से कराया था। एक दिन भविष्यवाणी होती है कि – “हे कंन्स अब तेरा विनाश होने का समय निकट आ गया है, तेरा काल शीघ्र ही तेरी ही बहन देवकी के कोख से जन्म लेगा”। कंस ने जब यह सुना तो उसने तत्काल अपनी प्यारी बहिन और अपने बहनोई देवकी वासुदेव को करागार में डाल दिया। कंस भविष्यवाणी से इतना ज्यादा डर गया था कि उसने कृष्ण जन्म के पूर्व ही देवकी के सात नवजात शिशुओं को मौत के घाट उतार दिया। वहीं उसने राज्य में जन्म लेने वाले प्रत्येक बच्चों को भी मार डाला। उस कालखंड में जन्मे सहस्त्रों शिशु आने वाली क्रांति के लिये बलि हो गये। लेकिन जो होना है वह तो होकर ही रहेगा, जो विधाता ने लिख दिया है वह तो किसी के मिटाए मिट ही नहीं सकता, कंस चाहे कितना भी शक्तिशाली रहा पर वह भी विधि की रचनाओं में बाधा नहीं डाल सका।

देवकी पुनः आठवीं बार पुनः गर्भवती थी। निरंतर कंस के गुप्तचरों की निगरानी जारी थी, कि कब देवकी शिशु को जन्म दे और कंस उसका वध कर सके। भादो की काली अंधेरी रात्रि कृष्ण पक्ष की बेला में अर्धरात्रि को कारावास में ही कृष्ण ने जन्म लिया। कृष्ण जन्म के समय सभी द्वारपालो गुप्तचरों को अचेतावस्था ने आ घेरा (वह तो कृष्ण की माया थी) और वसुदेव ने गुप्त रूप से कृष्ण को मथुरा से दूर सुरक्षित स्थान वृंदावन में नंद के पास पहुंचा दिया, जहां देवकी से भी बढ़कर ममत्व लुटाने वाली माता यशोदा कृष्ण का इंतजार कर रही थी। कंस ने कालांतर में कृष्ण का पता लगाकार पूतना, अकासुर, बकासुर, धन्वासुर, कालिया नाग आदि अनेक राक्षसों के द्वारा कृष्ण का वध करना चाहा, किंतु कृष्ण ने इन सभी का नाश खेल खेल में ही कर दिया। शत्रु उसे मारने आते, कृष्ण उन से खेलते और वे मारे जाते। वे तो बस मंद-मंद मुस्कुराते रहते और बांसुरी बजाते रहते। एक तरफ ये खेल चल रहा था। दूसरी ओर कृष्ण गोपियों की मटकी फोड़ना, दही और माखन चुराना और तरह तरह की बाल सुलभ लीलाओं का खेल भी खेल रहे थे। जब माता यशोदा उनके शरारतों से तंग आकर उनके कान उमेठती तो कृष्ण बढ़ी मासूमियत से कहते हैं। 

” ब्यान आन सन बैर पड़ी हैं, 
बरबस मुख लपटाओ ,
मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो “

माखनचोर कृष्ण क्या गोपियां और क्या ग्वाले वह तो जनजन के मन में बस गये है। कृष्ण की मोहनी मूरति के प्रेम में सारा समाज ही डूब रहा था। वो शायद कृष्ण के मन में यमुना के पानी से अधिक गहरा प्रेमजाल था, जिससे प्रत्येक जन को अपने अंदर समा लिया था। कृष्ण का प्रेम तो गोपियों, ग्वालो, गांव, वृंदावन, कुंज गलियों, कदंब पेड़ों, यमुना नदी और क्या कहें सृष्टि के कण कण में उसकी मनोहर छवि और बांसुरी की माधुरी में सब कुंछ समा गया। महारास के प्रेम पर्व पर हर गोपी के साथ पारलौकिक प्रेम के नृत्य माधुर्य में डूबे गोपाल कृष्ण की मधुर मुरली की वह तान जब गोपियाँ सारे बंधन और लोकलाज को तज तोड़कर पहुंच गई थी, अपने गोपाल कृष्ण के पास। अधूरे श्रृंगार में अधूरे वस्त्र में प्रेमरस से भावविभोर, जिसे घर में बंद कर दिया गया था, उस गोपी का मात्र शरीर ही रह गया, दिव्य आत्मा तो शरीर त्यागकर पहुंच गई महारास में। कृष्ण वृंदावन छोड़ मथुरा के लिये प्रस्थित हो रहे थे, तब विश्व के इस महान प्रेमी कृष्ण के लिये वृंदावन, बाग-बगीचे, ग्वाले गोपियां, फूल-पत्ते, घाट-बाट, गाय-बछड़े, नर, नारी, नंद यशोदा सभी रो उठे थे उनकी विरह वेदना से, पर…. कृष्ण ने भी तो इस विरह वेदना को भोगा था।

उधो माहि ब्रज रिसरत नाही, वैसुर भी वैधक दोहनी सरग, दुहावनी जाही, दरस बिन दूखन लागे नैन” ।।

        वृंदावन में वही गलियां हैं, वही पेड पौधे हैं, वहीं घाटबाट है वही यमुना का तट हैं वहीं कदंब का पेड़ हैं, पर कृष्ण के बिना कहीं हलचल नहीं कलरव नहीं हैं। कृष्णा के बिना तो मानो सब कुछ निर्जीव सा हो गया हैं, जैसे आत्मा के बिना इस शरीर का कोई महत्व नहीं हैं, वैसे ही कृष्ण के बिना वृंदावन तो जैसें अनाथ हो गया। ऐसे उदात्त प्रेम का संदेश देने वाले कृष्ण का जीवन वैभव विलास में नहीं बीता, उन्होने तो प्रकृति की गोद में निर्वासित जीवन का बचपन बिताया। उन्होंने पेड़ पौधे, नदी पहाड़, जीवजंतुओं को अपना प्यार दिया। दूध- दही घी और मक्खन के अमृत से स्वस्थ जीवन देने वाली गौ की सेवा चाकरी की। और कृष्ण ने इससे वहीं संदेश दिया कि हमारे जीवन में वनसंपत्ति और पशुधन का बहुत महत्व हैं। 

“बिन गोपाल बैरन भई कुंजियां” । कृष्ण मथुरा गमन करते हैं ऊधो उन्हें वृदांवन छोड़ने के लिये बाध्य तो कर देते हैं पर उनका प्रेमरस से सिद्ध हृदय नहीं बदल पाते हैं। कंस का वध आखिर भविष्यवाणीनुसार कृष्ण के हाथों होता हैं। कृष्ण उनके पिता को पुनः सिंहासनरूढ़ करते हैं। कृष्णा ने दुराचारी कंस का वध किया बल्कि एक और राज्य था जहां एक आततायी राजपुरुष अत्याचार व पापाचार की ओर अग्रसर हो रहा था, एक ऐसे राजवंश का जो अपनी ही कुलवधू को भरी सभा में वस्त्रहीन कर रहा था, उसे भी सत्य और न्याय का पाठ पढ़ाया। हस्तिनापुर राज्य में कौरव पांडव (सभी भाई) के बीच राज्य का विवाद गहरा हो रहा था। बड़े विद्धजन सूरमा जिसमें भीष्म, द्रौण, कृपाचार्य, विदुर आदि चुपचाप तमाशबीन बनकर रह गये। सत्य की बड़ी विचित्र व्याख्या हो रही थी। धर्म (युधिष्ठिर) और छलकपट (शकुनी) जुआ खेल रहे हैं। दांव में पांडवों की पत्नी लग हुई हैं। भाई की पत्नी को निर्वस्त्र कर दुर्योधन जांध पर बैठाने का संकल्प किया हैं, धृतराष्ट्र अंधा हैं, और अंधा ही बना हुआ हैं। गांधारी ने आंखों पर पट्टी बांध ली हैं।

 अन्याय अपनी आंखों से सभी देख रहे हैं। यह सब हो रहा हैं और कहा जा रहा हैं सत्य और न्याय कौरवों के पक्ष में है। अंततः जो होना था वह हुआ “महाभारत” अवश्यंभावी हो गया। युद्ध की घोषणा हो गयी। कृष्ण ने हथियार न उठाने की शपथ लेकर पांडवों का सारथी बनना स्वीकार किया। दोनों ओर से शंख, घंटे और युद्ध की अभिलाषा बढ़ाने वाले वाद्यों की ध्वनि प्रतिध्वनि हो रही थी। आकाश और पृथ्वी को गुंजित करने वाली तुमुलध्वनि और शस्त्रों के टंकार के बीच अर्जुन ने कृष्ण से कहा — “हे केशव मेरे सामने युद्ध करने के लिये कौन कौन उपस्थित हैं, कृपाकर उन्हे देखने के लिये मेरा रथ दोनों सेनाओं के बीच ले चलें।” अर्जुन ने जब देखा सामने उसके’ भाई-बंधु, पितामह, साले संबंधी, गुरु सखा, सभी खड़े हैं तो अर्जुन भाव विव्हल हो उठते हे और कहते हैं – “हे केशव मैं यह युद्ध नहीं लड़ सकता। मेरा शरीर इन्हें देखकर कांप रहा हैं मेरा मन द्रवित और चित्त स्थिर नहीं रह गया हैं।

न कांक्षे वियंज कृष्णं”
न च राज्यं सुखानिच
किंतो राज्योन गोविंद
किं भोर्गेजा वितेन वा” ।।

        अर्जुन शस्त्र त्यागकर बैठ जाते हैं। तब कृष्ण उन्हें कहते हैं “हे सखा बड़े विषम समय में तुम्हारी बुद्धि भ्रमित हुई हैं, तुम तो कायरता को प्राप्त हो गये हों। तुम हदय की उच्च भावनाओं से दूर हो गये हो। क्षुद्रता के शिकार हो गये, इस क्षुद्र दुर्बलता को त्याग दो। कृष्ण ने उन्हें आगे समझाते हुये ‘कहा कि “हे अर्जुन जो सोच करने योग्य नहीं हैं, तू उनको सोचा करता है ,अरे वे सब जिन्हें युद्ध करना हैं वे अमर होकर नहीं आये हैं, उन्हें मरना ही हैं, तू तो निमित्त मात्र हैं। आदमी तो कर्म करता है। यश अपयश का भी भागी होता हैं ,परंतु, कर्म तो उसे करना ही हैं, जो जनम लिया हैं। जीवित व्यक्ति की मृत्यु और मरे हुए का जन्म होना निश्चित हैं। तुझे मोह हो गया है। भले ही तू ज्ञानियों की बातें कर रहा है, अरे तेरे सामने तो युद्ध उपस्थित हैं और तू कर्तव्य त्यागकर संन्यासियों की सी बातें कर रहा हैं।‌ जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगो, या मरकर स्वर्ग का राज्य प्राप्त करो यही विरोचित धर्म हैं तुम्हारा।”

 महाभारत युद्ध के द्वारा कृष्ण ने कर्मयोग की व्याख्या की हैं। कृष्ण के गीतोपदेश और साक्षात ईश्वर दर्शन कर अर्जुन दिव्य दृष्टि से देखता है तो उसे अपनी नादानी और भूल पर बड़ा विक्षोभ होता है। वह तक्क्षण युद्ध के लिये उद्थत हो उठता है। कौरव राजवंश के नाश के लिये चल रहे अठारह दिनी युद्ध महाभारत में कृष्ण ने युद्ध नीति, कूटनीति और रणनीति का कुशल संचालन किया। पाण्डवों की अकल्पनीय जीत का मुख्य आधार स्तंभ और एक मूल कारण श्री कृष्ण बने।

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