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क्यों हम क्वालीफाई हो रहे, एजुकेट नहीं??

क्वालीफाईड होने में पीछे रह गई एजुकेशन 

– अतुल मलिकराम (लेखक और राजनीतिक रणनीतिकार)

​डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा था,”शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं है, बल्कि इसे समाज के हित में उपयोग करना चाहिए।” लेकिन समय के साथ यह धारणा धुंधली होती जा रही है। हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं, जहाँ डिग्री को योग्यता का प्रमाण माना जाता है, लेकिन उस डिग्री के पीछे वास्तविक शिक्षा और ज्ञान का कितना योगदान है, यह एक गंभीर सवाल बन गया है। डिग्री का महत्व यह है कि वह किसी व्यक्ति की योग्यता का प्रमाण पत्र होती है। लेकिन जब यह प्रमाण पत्र केवल नाम का रह जाए, और इसके पीछे कोई ठोस ज्ञान न हो, तो इसका वास्तविक मूल्य क्या रह जाता है? 

आज के समय में योग्यता और शिक्षा के बीच की खाई इतनी गहरी हो गई है कि इसे पाटना मुश्किल होता जा रहा है। हर साल लाखों छात्र ग्रेजुएट हो रहे हैं लेकिन लाखों छात्रों के ग्रेजुएट होने का मतलब यह नहीं कि वे अपनी डिग्री के अनुसार शिक्षित भी हो रहे हैं। इनमें से केवल कुछ प्रतिशत ही ऐसे होंगे जो सच में कुछ सीख के निकले होंगे। इसका कारण यह है कि आज के युवाओं में डिग्री लेने की इच्छा तो है लेकिन वास्तविक ज्ञान प्राप्त करने की नहीं। या यूँ कहें कि हमारे युवा डिग्री लेकर क्वालीफाई तो हो रहे हैं, लेकिन वास्तव में एजुकेट नहीं हो रहे हैं। 

अब आप कहेंगे कि क्वालीफिकेशन और एजुकेशन दोनों एक ही बात है, तो मैं आपको बता दूँ यह दो अलग-अलग चीजें है, जिसे हम अक्सर एक समझने की भूल कर देते हैं। क्वालीफिकेशन और एजुकेशन के अंतर को समझना बेहद जरूरी है। क्वालीफिकेशन का मतलब है, किसी व्यक्ति का औपचारिक रूप से किसी खास काम के लिए योग्य होना, जिसे आमतौर पर डिग्री, सर्टिफिकेट, या डिप्लोमा के रूप में पहचाना जाता है। दूसरी ओर, शिक्षा का मतलब है, वास्तविक ज्ञान और कौशल का विकास, जो न केवल किताबी ज्ञान से बल्कि अनुभव, विश्लेषण, और तार्किक सोच से आता है। 

आजकल अक्सर यह देखने में आता है कि युवाओं का मुख्य लक्ष्य केवल डिग्री प्राप्त करना हो गया है। उनका ध्यान सिर्फ इस बात पर होता है कि किस तरह जल्द से जल्द कोर्स को पूरा कर लिया जाए, एक अच्छी सी डिग्री हासिल की जाए और उस डिग्री के आधार पर एक बढ़िया सी नौकरी मिल जाए। इस चक्कर में वे न तो उस कोर्स की गहराई में जाते हैं, न ही उस विषय के बारे में कुछ सीखते हैं। यह स्थिति तब और भी गंभीर हो जाती है जब ऐसे लोग उच्च पदों पर पहुंच जाते हैं। बिना किसी वास्तविक ज्ञान और अनुभव के, वे उस पद की जिम्मेदारियों को सही तरीके से निभा नहीं पाते। इसका असर न केवल उनके काम पर, बल्कि उस संगठन पर भी पड़ता है, जहाँ वे कार्यरत होते हैं। 

दूसरी ओर, ऐसे लोग भी होते हैं, जिनके पास अनुभव और ज्ञान तो होता है, लेकिन डिग्री न होने के कारण वे उस पद के लिए क्वालीफाई नहीं हो पाते। इस असमानता के कारण न केवल योग्य लोग बेरोजगार रह जाते हैं, बल्कि अयोग्य लोगों के रोजगार में होने से कार्य की गुणवत्ता पर बुरा प्रभाव पड़ता है। 

इस अव्यवस्था का मुख्य कारण हमारी शिक्षा प्रणाली है, जहाँ छात्रों को केवल परीक्षा में अच्छे अंक लाने के लिए तैयार किया जाता है, उन्हें ना विषय को गहराई से समझने के लिए प्रेरित किया जाता है ना ही किसी नए दृष्टिकोण से सोचने के लिए तैयार किया जाता है। बड़े-बड़े कॉलेज भी सिर्फ प्लेसमेंट कराने का लक्ष्य ही रखते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि छात्र शिक्षा की वास्तविक महत्ता से अंजान रह जाते हैं। 

शिक्षा का असली मकसद व्यक्ति को व्यावहारिक जीवन के लिए तैयार करना है, लेकिन हमारे पुराने जमाने के पाठ्यक्रमों में आज की जरुरत के लिए उपयोगी व्यावहारिक ज्ञान का अभाव है। उदाहरण के लिए दुनिया आज सोशल मिडिया और वीडियो कॉल पर पहुँच गई है और हमारे पाठ्यक्रमों में आज भी पत्र लेखन ही सिखाया जा रहा है। वास्तविक जीवन में इसका परिणाम यह होता है कि छात्र केवल किताबी ज्ञान के आधार पर पास तो हो जाते हैं, लेकिन व्यावहारिक समस्याओं का सामना करने में असमर्थ होते हैं। 

ऊपर से आजकल युवाओं में सीखने की ललक भी नहीं है। पहले के समय में शिक्षक कठोर मेहनत करवाकर कोई पाठ सिखाते थे और छात्र भी बड़ी निष्ठा से उसे सीखते थे। लेकिन आजकल के बच्चे बिना मेहनत के बिना कुछ नया सीखे एक बने बनाए ढर्रे पर चलने के आदि हो गये हैं। जब बच्चे कुछ नया सीखना ही ना चाहें, तो आखिर कोई सीखा भी कैसे पाएगा। टेक्नोलॉजी ने भी इसमें कोई कसर नहीं छोड़ी है। पहले सुविधाओं के अभाव में बच्चे अच्छी तरह किसी भी पाठ को सीखते थे लेकिन आज जब सब एक क्लिक पर उपलब्ध है तो छात्रों में वैसी लगन नहीं है।   

सामाजिक तौर पर भी आजकल केवल दिखावा ही महत्वपूर्ण हो गया है, समाज में आपको इस आधार पर आंका जाता है कि आपके पास कितनी बड़ी डिग्री और कितनी अच्छी नौकरी है। फिर चाहे आपके पास सच में कोई योग्यता हो या नहीं इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है। इसलिए भी आजकल क्वालीफिकेशन का महत्व एजुकेशन से ज्यादा हो गया है। बड़ी-बड़ी कंपनियों में चयन का आधार भी डिग्री ही है, जिससे केवल क्वालीफाईड लोग ही नौकरी पा सकते हैं, भले ही उनके पास वास्तविक ज्ञान और कौशल हो या न हो।  

जब तक हम शिक्षा के मूल उद्देश्य को नहीं समझेंगे और केवल डिग्री के पीछे दौड़ते रहेंगे, तब तक यह समस्या बनी रहेगी। इसके समाधान के लिए सबसे पहले, शिक्षा प्रणाली में सुधार करते हुए, कौशल विकास पर जोर दिया जाना चाहिए। छात्रों को उनके क्षेत्र में आवश्यक तकनीकी और व्यावहारिक कौशल सिखाने के लिए विशेष पाठ्यक्रम और ट्रेनिंग कार्यक्रमों का आयोजन जरूरी है। इसके साथ ही, शिक्षा संस्थानों और इंडस्ट्री के बीच समन्वय बढ़ाने की जरूरत है, ताकि पाठ्यक्रम इंडस्ट्री की आवश्यकताओं के अनुरूप हो और छात्र डिग्री प्राप्त करने के बाद तुरंत रोजगार के लिए तैयार हों।

इसके अलावा, आजीवन सीखने की अवधारणा को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि युवा यह समझें कि शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवनभर चलने वाली एक सतत प्रक्रिया है। अंततः, कंपनियों को केवल डिग्री के आधार पर भर्ती करने के बजाय, उम्मीदवारों के वास्तविक ज्ञान, कौशल, और अनुभव पर ध्यान देना चाहिए। 

यदि हम इन बिंदुओं को सही मायनों में लागू कर पाएं, तो न केवल हमारे देश की कार्य शक्ति मजबूत होगी, बल्कि समाज की भी नींव मजबूत होगी। हमें इस दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है ताकि आने वाली पीढ़ी केवल क्वालीफाईड नहीं, बल्कि सच में एजुकेटेड हो, और इस तरह से हम एक सशक्त और उज्ज्वल भविष्य की दिशा में अग्रसर हो सकेंगे।

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