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गीतोपदेश: जीवन का सार और मोक्ष का द्वार 

अर्थात कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है, कर्म के फलों में कभी नहीं’ इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि कर्मफल पर हमारा कोई अधिकार नहीं है। इसलिए, हमें कर्मफल के लिए कोई कर्म नहीं करना चाहिए। हमें कर्मफल का ध्यान नहीं रखना चाहिए और अकर्मण्यता में आसक्त नहीं बनना चाहिए। भगवद्गीता को अर्जुन और भगवान् कृष्ण के बीच एक संवाद के रूप में प्रस्तुत किया गया है। और इसमें ज्ञान, कर्म और भक्ति के विभिन्न मार्गों और कैसे वे आत्मा को मोक्ष  की ओर ले जाते हैं, इसी पर प्रकाश डाला गया है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। 
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।

यह संवाद कुरुक्षेत्र युद्ध की शुरुआत से ठीक पहले होता है। सुलह के कई प्रयास विफल होने के बाद, युद्ध अपरिहार्य था। आखिरकार युद्ध का दिन आ गया और सेनाएँ युद्ध के मैदान में आमने-सामने हो गईं। जैसे ही युद्ध शुरू होने वाला था, अर्जुन ने कृष्ण से युद्ध के मैदान के बीच में रथ चलाने के लिए कहा, ताकि विरोधी सेनाओं पर अधिक बारीकी से नज़र रखी जा सके। यह देखकर कि विरोधी पक्ष में उसके रिश्तेदार, शिक्षक और मित्र शामिल थे, अर्जुन उनसे लड़ने के को लेकर दुविधा की स्थिति में आ गए और वे अपने ही बंधु बांधवों से लड़ने का विचार त्यागने पर विचार करने लगे, इस दुविधा पूर्ण स्थिति में अर्जुन ने कृष्ण से मदद मांगी। जो बातचीत हुई, कृष्ण की सलाह, संदेश और अर्जुन को दी गई शिक्षाएँ, वही हैं जिन्हें अब भगवद्गीता के रूप में जाना जाता है। 

गीता का उद्देश्य ही परमात्मा के ज्ञान, आत्मा के ज्ञान और सृष्टि विधान के ज्ञान को स्पष्ट करना है। गीता वास्तव में चरित्र निर्माण का सबसे बड़ा और उत्तम शास्त्र है। इसके माध्यम से भगवान ने कहा है कि चरित्र कमल पुष्प समान संसार में रहकर और श्रेष्ठ कर्मों से बनेगा कि घर-बार छोड़ने और कर्म संन्यास क्रियाएं करने से। जिस दिन श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था उस दिन मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी थी, इसीलिए इस दिन को गीता जयंती के रूप में मनाया जाता है। इस दिन उपवास करने की भी मान्यता है।    

श्रीमद्भगवत गीता चारों वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद) का संक्षिप्त रूप है। दूसरे शब्दों में गागर में सागर है। चारों वेदों में अठारह हजार श्लोक (मंत्र) हैं। उनको गीता में 574 श्लोकों में लिखा है। जिस कारण से गीता में सांकेतिक शब्द अधिक हैं। वैसे तो गीता में सात सौ श्लोक हैं। जिनमें 574 काल ब्रह्म ने श्री कृष्ण के मुख से कहे हैं, शेष श्लोक संजय तथा अर्जुन के द्वारा कहे गए हैं जो ज्ञान से संबंधित नहीं हैं। गीता के सांकेतिक शब्दों को कहीं कहीं अनुयायियों ने अपने अर्थो में व्याख्या किया है। उदाहरण के लिए गीता अध्याय 18 श्लोक 66 में “व्रज” शब्द है। उसका अर्थ है जाना, जाओ, चले जाना, दूर जाना। सर्व गीता अनुवादकों ने व्रज का अर्थ “आना” किया है। श्रीमद्भगवत गीता चारों वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद) का सारांश है। 

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत,
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्,
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्,
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।

इस श्लोक का भावार्थ है कि जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं ( कृष्ण ) अपने रूप को रचता हूँ यानी साकार रूप से लोगों के सामने प्रकट होता हूँ! यह श्लोक जीवन के सार और सत्य को बताता है।गीता का सार इन्ही कुछ श्लोकों में छिपा हुआ है। कर्म किए जा, फल की चिंता मत कर” आप चाहे कुछ भी करो लेकिन उस काम को लालच, अहंकार से मत करो, बल्कि प्रेम, दया और समर्पण से करो। कोई काम जो आप कर रहे हो तो उसे पूरे मन से करो, पूरा ध्यान उस में लगा दो। जब आप काम कर रहे हो तो किसी और विचार को परे करना चाहिए। काम करने के वक्त काम और बस काम। चाहे वह विचार उस काम के फल का ही क्यों ना हो, आपको उसे नजरअंदाज कर देना चाहिए, क्योंकि अगर आप फल के बारे में सोचोगे तो आप उस काम को अपना सौ प्रतिशत नहीं दे पाओगे।

इसलिए  वर्तमान काल में रहकर आप उस काम को करने में ध्यान दो और उसके फल के बारे में भूल जाओ। अपने काम को हमेशा मन से करना चाहिए और उस काम से आपको क्या प्राप्त करना है। उसके बारे में ज्यादा मत सोचो। तो ही आपके लिए अच्छा होता है। सिर्फ अपने काम पर ध्यान देने से आप किसी भी काम को शांतिपूर्वक और अच्छे से कर पाओगे।

भगवद्गीता का सार संक्षेप में इस प्रकार है:

  • धर्म और कर्तव्यः जीवन में अपने धर्म और कर्तव्य का पालन करना महत्वपूर्ण है।
  • कर्मयोगः कार्य करते समय फल की चिंता न करें, केवल कर्म पर ध्यान दें।
  • ज्ञानयोगः आत्मज्ञान के द्वारा मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।
  • भक्तियोगः ईश्वर के प्रति समर्पित भक्ति मनुष्य को मुक्ति दिला सकती है।
  • स्थितप्रज्ञः जीवन में संतुलन और स्थिरता बनाए रखना।
  • आत्म-नियंत्रणः इंद्रियों पर नियंत्रण और आत्म-संयम।
  • ईश्वर की सर्वोपरिताः ईश्वर सभी जीवों में निहित हैं और सब कुछ उनसे प्रेरित होता है।
  • अवतारवादः धर्म की रक्षा के लिए ईश्वर समय-समय पर अवतार लेते हैं।
  • माया: सांसारिक जीवन माया से भरा हुआ है, और इससे परे जाना महत्वपूर्ण है।
  • ध्यान और समाधिः ध्यान और समाधि के द्वारा आध्यात्मिक विकास संभव है।

 गीता जयंती, मार्गशीर्ष महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था।गीता जयंती को मोक्षदा एकादशी या मत्स्य द्वादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन गीता, भगवान श्रीकृष्ण, और वेद व्यास जी की पूजा की जाती है। गीता जयंती के दिन उपवास रखने और गीता का पाठ करने की मान्यता है। इसी दिन पितरों के नाम से तर्पण करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। गीता जयंती के दिन दान करने की भी परंपरा है। गीता में लिखे श्लोक मनुष्य के कल्याण में मददगार हैं। गीता में वर्णित उपदेशों से जीवन जीने का तरीका सीखा जा सकता है। गीता जयंती पर उपवास करने से मन पवित्र होता है और शरीर स्वस्थ रहता है। गीता जयंती के दिन सच्चे मन से भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए।गीता विश्व का एक इकलौता ग्रंथ है श्रीमद भगवत गीता, जिसकी जयंती मनाई जाती है। यही कारण है कि गीता ग्रंथ का जन्म भगवान श्रीकृष्ण के मुख से हुआ है। बता दें कि गीता में वर्णित सभी श्लोक श्रीकृष्ण के मुख से निकले हैं। इसलिए गीता जयंती मनाई जाती है।

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