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पशुपालन एवं डेयरी विभाग और विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन ने पशुधन क्षेत्र में सार्वजनिक निजी भागीदारी के लिए रोडमैप तैयार किया

मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के तहत पशुपालन और डेयरी विभाग (डीएएचडी) ने विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूओएएच) के सहयोग से 11 से 13 फरवरी 2025 तक नई दिल्ली में डब्ल्यूओएएच पीवीएस-पीपीपी (पशु चिकित्सा सेवाओं का प्रदर्शन-सार्वजनिक निजी भागीदारी) केन्द्रित सहायता कार्यशाला का सफलतापूर्वक आयोजन किया। कार्यशाला का उद्देश्य वैक्सीन प्लेटफॉर्म, पशु चिकित्सा कार्यबल विकास, संस्थागत बुनियादी ढांचे और खुरपका-मुंहपका रोग (एफएमडी) मुक्त क्षेत्रों के निर्माण जैसे क्षेत्रों में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) के माध्यम से पशु चिकित्सा सेवाओं को मजबूत करना था।

चर्चा का मुख्य विषय पशु चिकित्सा संबंधी पीपीपी भागीदारी के माध्यम से भारत में पशु चिकित्सा सेवाओं में महत्वपूर्ण अंतराल को खत्म करना था, जिसमें निम्नलिखित पर जोर दिया गया:

  • जिला स्तर पर एनएबीएल-मान्यता प्राप्त पशु चिकित्सा प्रयोगशालाओं की स्थापना सहित पशु चिकित्सा बुनियादी ढांचे का विस्तार करना।
  • उन्नत निगरानी और एफएमडी मुक्त क्षेत्र विकास के माध्यम से रोग नियंत्रण कार्यक्रमों को मजबूत करना।
  • पशु चिकित्सा संबंधी प्रशिक्षण और ज्ञान-साझाकरण प्लेटफार्मों के माध्यम से पशु चिकित्सा कार्यबल क्षमता का निर्माण करना।
  • एक मजबूत टीका मूल्य श्रृंखला विकसित करके पशु चिकित्सा टीका उत्पादन में आत्मनिर्भरता को मजबूत करना।
  • पशु चिकित्सा अनुसंधान, निदान और विस्तार सेवाओं में निजी क्षेत्र की विशेषज्ञता को एकीकृत करने के लिए एक व्यापक पीपीपी नीति ढांचे को परिभाषित करना।

डीएएचडी की सचिव सुश्री अलका उपाध्याय ने पशुधन क्षेत्र को समर्थन देने में पशु चिकित्सा सेवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला, जो भारत के कृषि सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) में 30% से अधिक का योगदान देता है। उन्होंने एनएबीएल मान्यता के साथ पशु चिकित्सा प्रयोगशालाएं स्थापित करने की आवश्यकता को रेखांकित किया और इस बात पर बल दिया कि रोग निगरानी, ​​कार्यबल क्षमता और टीका उत्पादन के लिए निजी क्षेत्र का सहयोग आवश्यक है। “ इस कार्यशाला ने पशु चिकित्सा सेवाओं में संरचित पीपीपी जुड़ाव के लिए एक मंच तैयार किया है । उन्होंने कहा कि चर्चाएं एक ऐसे रोडमैप में योगदान देंगी जो राष्ट्रीय रोग नियंत्रण कार्यक्रमों को बढ़ाती हैं, पशु चिकित्सा बुनियादी ढांचे का विस्तार करती हैं और पशु स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए एक स्थायी पारिस्थितिकी तंत्र सुनिश्चित करती हैं। सुश्री उपाध्याय ने पशु चिकित्सा सेवाओं में दीर्घकालिक निवेश और निजी क्षेत्र की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए एक वर्ष के भीतर एक पशु चिकित्सा संबंधी पीपीपी नीति विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन के एशिया और प्रशांत क्षेत्र के क्षेत्रीय प्रतिनिधि डॉ. हिरोफुमी कुगिता ने पशु चिकित्सा सेवाओं में भारत के नेतृत्व तथा ज्ञान-साझाकरण और प्रयोगशाला सहयोग के माध्यम से  सर्वोत्तम प्रथाओं में योगदान देने की इसकी क्षमता को स्वीकार किया।

पशुपालन आयुक्त और देश के मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. अभिजीत मित्रा ने कहा कि पशु चिकित्सा सेवाओं को बढ़ाने के लिए एक संरचित संस्थागत ढांचे की आवश्यकता है, जहां सार्वजनिक और निजी क्षेत्र मिलकर काम करें। उन्होंने कहा, “इस कार्यशाला ने इस तरह के ढांचे को परिभाषित करने के लिए आधार तैयार किया है, और अगले कदम क्रियान्वयन और क्षमता निर्माण पर केंद्रित होंगे।”

कार्यशाला में राज्य पशुपालन विभागों, पशु चिकित्सा परिषदों, रोग निदान प्रयोगशालाओं, आईसीएआर अनुसंधान संस्थानों, पशुधन उत्पादन के स्वास्थ्य और विस्तार एजेंट (ए-हेल्प), भारतीय कृषि कौशल परिषद, केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन, निजी क्षेत्र के हितधारकों, भारतीय पशु स्वास्थ्य कंपनियों के महासंघ (आईएनएफएएच), वैक्सीन निर्माताओं, खाद्य और कृषि संगठन और विश्व बैंक से 100 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। कार्यशाला के दौरान संसाधन जुटाने, जोखिम प्रबंधन और हितधारक एकीकरण के लिए पीपीपी रणनीतियों को परिभाषित करते हुए सात ड्ब्ल्यूओएएच विशेषज्ञों ने चर्चाओं को सुगम बनाया। कार्यशाला का समापन पशु चिकित्सा क्षेत्र के लिए पीपीपी रोडमैप की प्रस्तुति के साथ हुआ, जिसमें पशु चिकित्सा सेवाओं, रोग निगरानी और पशुधन उत्पादकता को बढ़ाने के लिए कार्रवाई योग्य रणनीतियों की रूपरेखा तैयार की गई। परिणाम नीति विकास, निवेश जुटाने और संरचित पीपीपी कार्यान्वयन में योगदान देंगे, जिससे भारत के पशुपालन क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक लाभ सुनिश्चित होंगे।

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