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न्यायधानी सहित राज्य में धर्मांतरण का बढ़ता शिकंजा

बिलासपुर: न्यायधानी सहित राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों में धर्मांतरण के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। यह चौंकाने वाली और चिंताजनक तथ्य है। केवल जनवरी महीने में ही इसके बारह मामले सामने आए थे। सामाजिक संगठनों का आरोप है कि वह परिवार के लोगों से मेल बढ़ाते हैं। मेल बढ़ाने के बाद उन्हें धर्मांतरण के लिए समझाते हैं। फिर प्रलोभन देकर उनका धर्म बदलवाते हैं। इसके लिए यह मिशनरियाँ प्रार्थना सभा और चंगाई सभा का आयोजन करती हैं, और लोगों को इसके लिए तरह तरह के प्रलोभन देती हैं। इसके बाद इनका प्रार्थना सभा, चंगाई सभा के माध्यम से ब्रेनवाश किया जाता है। फिर खेल शुरू होता है धर्मांतरण मतांतरण का। 

न्यायधानी व जिले में कहां-कहां धर्मांतरण का प्रयास

बता दें की न्यायधानी में ही सिरगिट्टी, तिफरा, सकरी, चिंगराजपारा, चांटीडीह, मोपका, घुरु, चिल्हाटी सहित जिले के हाफा, पचपेड़ी, बेलगहना, रतनपुर, सीपत, मन्नाडोल, मस्तूरी, लखराम, हरदीकला टोना सहित शहर के स्लम एरिया में मतांतरण का खेल चल रहा है। मिशनरी संस्था से जुड़े लोग इन जगहों में प्रार्थना सभा कराते हैं, जिसकी आड़ में लोगों का धर्म परिवर्तन कराया जा रहा है।बिल्हा इलाके के एक सरकारी स्कूल में भी हेड मास्टर ने छोटे-छोटे बच्चों को धर्म परिवर्तन को लेकर सीधे शपथ ही दिला डाली। इस घटना का वीडियो वायरल हुआ तो सरकार और प्रशासन हरकत में आई। जिसके बाद हेडमास्टर को सस्पेंड कर उसके खिलाफ पुलिस कार्रवाई की जा रही है।

दिलचस्प ये है कि ये घटना सरगुजा और बस्तर के किसी गांव में नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के दूसरे सबसे बड़े शहर के उस इलाके में हुई, जहां हाईकोर्ट है। वहीं न्यायधानी में ही पिछले दिनों धर्मांतरण का एक अन्य मामला सामने आया है। यहां एक महिला ने अपने ही पति पर धर्मान्तरण कराने का आरोप लगाया है। पत्नी के अनुसार उसके पति ने घर से भगवान् की मूर्तियों और फोटो को फेंककर प्रभु यीशु की तस्वीर लगा दी और उसे भी इसे धर्म अपनाने का दबाव बनाने लगा। मामला पूरा सिविल लाइन थाना क्षेत्र का है। महिला ने इस मामले की जानकारी हिन्दू संगठनों को दी थी। जिसके बाद उनके संगठन के सदस्यों के साथ महिला ने थाने पहुँचकर शिकायत पुलिस को इस सम्बन्ध में दी है।

बड़े पैमाने पर आदिवासी अपना रहे ईसाई धर्म

प्रदेश के आदिवासी बहुत क्षेत्रों में खासकर बस्तर, जशपुर, रायगढ़ क्षेत्र में बड़े पैमाने पर आदिवासियों को ईसाई धर्म में लिया जा रहा है. यह विवाद का विषय बना हुआ है. बस्तर के नारायणपुर क्षेत्र में तो यह गुटीय संघर्ष में तब्दील हो चुका है। आदिवासी और धर्म परिवर्तन करने वाले आदिवासियों के बीच गाहे-बगाहे विवाद की स्थिति बनती रहती है। पुलिस को बार-बार बीच-बचाव करना पड़ता है। 

धर्मांतरण के दबाव में युवकों ने की आत्महत्या

बता दें कि धर्मांतरण का विवाद लोगों को आत्महत्या के लिए मजबूर कर रहा है। हाल में दो युवकों ने धर्मांतरण के दबाव से तंग आकर आत्महत्या कर ली है। दुर्ग और धमतरी क्षेत्र में इन युवकों की पत्नी और अन्य परिवार के सदस्यों ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था, जिसके बाद धर्मांतरण के लिए दबाव बना रहे थे, जिससे व्यथित युवकों ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। 

बस्तर में धर्मांतरण की सर्वाधिक शिकायतें

धर्मांतरण के खिलाफ पिछले 11 महीने में छत्तीसगढ़ में 13 एफआईआर की जा चुकी है। इसके अलावा बस्तर संभाग में ही धर्मांतरण की अलग-अलग 23 शिकायतें पुलिस को की जा चुकी हैं।यह मामला लगातार गंभीर होता जा रहा है।बड़े बोदल वाले मामले में गत दिनों बस्तर बंद का आह्वान किया गया था। 

सरगुजा में तेजी से हो रहा धर्मांतरण

 सरगुजा संभाग में धर्मांतरण का काम जोरों से होता रहा है। यहां एशिया महाद्वीप का दूसरा सबसे बड़ा चर्च है।स्व दिलीप सिंह जूदेव जो जशपुर राजपरिवार से थे। 5 बार सांसद, केंद्र में मंत्री रहते हुए उन्होंने लाखों कन्वर्टेड ईसाइयों के पैर धोकर उनकी घर वापसी करवाई और उनको हिंदू बनाया था, लेकिन उनके स्वर्गवासी हो जाने के बाद मिशनरियाँ यहां काफी सक्रिय हो चुकी है और धर्मांतरित के कार्य में जोर-जोर से लग चुकी है।गौरतलब है कि राज्य की करीब 32 प्रतिशत आबादी आदिवासी है। इनमें सरगुजा, बस्तर के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले आदिवासियों के लिए धर्मांतरण बहुत बड़ा मुद्दा है। 2011 की जनगणना के अनुसार छत्तीसगढ़ की कुल आबादी 2.55 करोड़ थी। जिनमें इसाइयों की संख्या 4.90 लाख थी। यानी तब ईसाई कुल आबादी के 1.92 फ़ीसदी रही हैं। राज्य में रोमन कैथोलिक वर्ग की जनसंख्या 2.25 लाख और मेनलाइन चर्च, जिसमें चर्च ऑफ़ नार्थ इंडिया, मेनोनाइट्स, ईएलसी, लुथरन आदि शामिल हैं, इनकी जनसंख्या 1.5 लाख रही है। हालांकि आज की स्थिति में छत्तीसगढ़ की कुल आबादी 3 करोड़ से अधिक व ईसाइयों की भी आबादी में इजाफा हुआ है। 

धर्मांतरण के विरुद्ध ठोस कानून नहीं

बता दें कि छत्तीसगढ़ में वर्तमान में धर्मांतरण पर रोक लगाने के लिए कोई कानून नहीं है। किसी धर्म के अनुयायी के कहने पर लोग दूसरे धर्म को स्वीकार कर छत्तीसगढ़ में मतांतरण के घातक एजेंडे की वर्तमान स्थिति का अंदाजा इन हालातों से लगाया जा सकता है कि मतांतरित व्यक्ति के कफन दफन तक को लेकर विवादों का सामना करना पड़ रहा है। मतांतरण के मामले में बस्तर से लेकर जशपुर, सरगुजा तक विवाद है।

धर्मांतरण के विरुद्ध कानून की तैयारी

धर्मांतरण के खिलाफ प्रदेश में सख्त कानून की अनुशंसा हो चुकी है। विधानसभा में भी यह मुद्दा उठ चुका है। समाज प्रमुखों और धार्मिक संगठनों ने भी धर्मांतरण पर खुलकर विरोध व्यक्त किया है। इन सबके बीच मामला थमने का नाम नहीं ले रहा है। प्रदेश में धर्मांतरण रोकने सरकार सख्त कदम उठाने जा रही है। विधानसभा सत्र में धर्म स्वतंत्र विधेयक प्रस्तुत किया है। इस विधेयक का उद्देश्य प्रदेश में धर्मांतरण के मामलों में कमी लाना व दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करना है। गौरतलब है कि प्रदेश में छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता (संशोधन) अधिनियम-2006 के प्रविधान हैं, लेकिन इसे सख्त बनाने की तैयारी चल रही है। विभागीय सूत्रों के मुताबिक विधानसभा में प्रस्तुत होने वाले विधेयक में 10 साल तक की सजा का प्रविधान भी शामिल किया जा सकता है।

समाज के लोग बहुत भोलेभाले होते हैं। कुछ लोग धर्म की चादर ओढ़कर समाज को तोड़ने का काम करते हैं। वह समाज सेवा के नाम पर लोगों की आस्था और भावनाओं से खिलवाड़ भी करते हैं। ऐसे लोगों को मेरा साफ शब्दों में कहना है वह जितना जल्दी हो ऐसी हरकतों से बाज आएं। सरकार धर्मांतरण को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति पर काम करेगी। अब ऐसा करने वाली ताकतें चाहें कितनी भी मजबूत हों उनसे सख्ती से निपटेंगे।  हमारे लिए मतांतरण का अर्थ राष्ट्रांतरण है, हम इसे इसी नजरिये से देखते हैं। भय या लोभ से किये गए किसी भी मतांतरण का हम दृढ़ता से मुकाबला करेंगे, इसे सहन नहीं करेंगे। – विष्णुदेव साय मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़

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