अंधेरी स्याह भीगती सर्द रात की वो सुबह….? 

पूस की उस घनी अंधेरी स्याह और सर्द रात में मैं टीने के टपरी नुमा शेड के नीचे तन्हा बैठे हुए धीरे-धीरे बरसते पानी को देखते हुए विचारों के उधेड़बुन में खोया हुआ था। पूस का महीना होने के कारण ठंड भी काफी अधिक थी। इस बीच आसमान से रह रहकर बिजली कौंध रही थी, बादलों की गड़गड़ाहट तेज आवाज और अंधेरे के बीच बिजली की चमक से कुछ देर के लिए अचानक उजाला छा जाता था। फिर घना अंधेरा पसर जाता था। लगता था पानी गिरने के आसार बन रहे थे ,इस दरमियान हवाएं भी तेज हो चली थीं। उस समय रात के करीब एक बज रहे होंगे।रात धीरे-धीरे गहरा चुकी थी ,मेरे मन में भी वैसे ही विचारों की गति भी तेज होती बढ़ती चली जा रही थी। मन की बेचैनी और चिंता भी बढ़ी जा रही थी।जहां मैं बैठा था वह  मेटरनिटी हॉस्पिटल का नीचे की ओर ग्राउंड फ्लोर में टपरे नुमा टीने का शेड था।

यह हास्पिटल जो बिलासपुर शहर के जगमल चौक के पास पड़ता था, वहीं ऊपर की मंजिल में मेरी पत्नी सुनीता जो गर्भवती थी और एडमिट थी। प्रसव होने का डॉक्टर द्वारा दिया गया नियत समय कई दिन पहले बीत चुका था। करीब आठ दिन निकल चुके थे। मेरी पत्नी पहली बार गर्भवती हुई थी। मेरे घर में नए मेहमान आने की खुशियां तो थीं, लेकिन ये खुशियाँ प्रसव समय आठ दिन अधिक बीतने के बाद अब गहरी चिंता में बदल चुकी थी। 

उन दिनों मैं कुछ अर्थाभाव का भी सामना कर रहा था सो चिंता का एक दूसरा कारण यह भी था।आर्थिक परेशानियों के चलते ही मैंने पत्नी को गर्भावस्था के बाद से ही शहर के मिशनरी चैरिटेबल हॉस्पिटल में दिखा रहा था, जहां शुल्क कम लिया जाता था। प्रसव में देर होने से मैं दोहरी चिंता में पड़ गया था। सबकुछ कुशलता से निपटेगा कि नहीं, दूसरे इस वजह से खर्च भी काफी अधिक ना बढ़ जाए। बस इन वजहों से मैं काफी परेशान और चिंतित गहरी सोचनीय मुद्रा में बैठा हुआ था। ‌इस दौरान धीरे-धीरे समय भी गुजर रहा था और प्रसव का समय तो खैर आठ दिन बीत चुका था। डॉक्टर के अथक प्रयासों से भी भी कोई परिणाम नहीं निकलने पर आखिर डॉक्टर ने बीते शाम अस्पताल में एडमिट करने कहा था। एडमिट करने के बाद तुरंत डॉक्टर ने प्रसव होने के आवश्यक चिकित्सकीय प्रयास शुरू कर दिए थे। 

डॉक्टर के बताए अनुसार प्रसव का संभावित समय नजदीक आता जा रहा था। इस बीच सब कुछ सामान्य चल रहा था। पत्नी की शारीरिक स्थिति पूरी तरह ठीक थी, पेट में पल रहे बच्चे की भी गतिविधियां और स्वास्थ्य सामान्य बताया गया था, लेकिन बहुत देर होने से अब किसी अनजाने अनहोनी की चिंता मन में रह रहकर बढ़ चुकी थी। मैंने डॉक्टर की सलाह पर मिशनरी प्रसूति अस्पताल में लाकर एडमिट कर दिया था। लेकिन न तो प्रसव हुआ था और ना ही मेरी पत्नी को प्रसव वेदना उठी थी।अब ऐसे ही करते-करते करीब आठ दिन बीत चुके थे, और इस बीच लगातार हम डॉक्टर से सलाह लेते रहे। डॉक्टर हमें समझाती रहीं कि कुछ नहीं होगा हम देख रहे हैं ,कोई खतरे की बात नहीं है। लेकिन मेरे मन में चिंता बढ़ती जा रही थी। न जाने क्यों मन में एक डर सा बैठ गया था कि आगे पता नहीं क्या होगा। आठ दिन देर होने पर डॉक्टर से पूछने पर वह भी अब असमंजस में आ चुकी थी,प्रसव के लिए अधिक दिन बीत जाने पर डॉक्टर ने आखिर अपनी चिंता जाहिर करते हुए बताया कि अब इतने दिन के बाद भी प्रसव का नहीं होना और न ही पेन का उठना कुछ तो खतरे की बात है।

इस बीच बीते आठ दिनों में डॉक्टर ने मेरी पत्नी को कई बार चेक किया था। इसके पहले उन्होंने मुझे चिंता न करने के लिए ढाढस भी बंधाया था। लेकिन आठ दिन बीत जाने के बाद स्वाभाविक है चिंता तो बढ़ेगी ही सो मैंने आखिर का डॉक्टर से जोर देकर कहा कि डॉक्टर मुझे बताएं कि आठ दिन बीतने पर भी प्रसव नहीं होने के कारण कोई खतरा तो नहीं है..? मेरे काफी जोर देने पर आखिर डॉक्टर ने कहा कि आप ऐसा करें इन्हें तत्काल यहां से ले जाए। क्योंकि यहां ऐसी कोई सुविधा नहीं है वैसे भी पेट के अंदर का बच्चा जो है वह अपने गले में गर्भनाल को लपेट लिया है, इस कारण शायद प्रसव नहीं हो पा रहा है! डॉक्टर ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए बताया कि इस बीच मैंने कई बार प्रसव पीड़ा उठने वाली दवा और इंजेक्शन भी दिया है, लेकिन इसका भी कोई असर नहीं हो रहा है। आश्चर्य हो रहा है कि दी गई दवा काम क्यों नहीं कर रही है। उन्होंने कहा कि इन सब के बाद भी प्रसव ना होना ऐसा मेरे लिए भी पहला केस है। अब तो मुझे भी कुछ चिंता हो रही है, इसलिए आप जितनी जल्दी हो सके इन्हें ऐसे अस्पताल ले जाएं जहां ऑपरेशन की सुविधा हो।अब देर करने से दोनों को खतरा हो सकता है।   

इतना सुनते ही मैं डॉक्टर से कहा कि आपको यह बात पहले ही बता देनी थी, तो हम पहले ही कुछ इंतजाम कर लेते ,लेकिन अब इतनी देर रात को कहां जाएंगे और किस हास्पिटल में लेकर जाएंगे…? फिर जरूरी नही की वहां तत्काल इनकी आवश्यक चिकित्सा शुरू कर दी जाएगी। यह भी डर मन में कौंध रहा था।डॉक्टर ने जब दूसरे हॉस्पिटल जाने को कहा था तब रात के करीब बारह बजे से कुछ अधिक हो चुके थे ।इसके बाद मैंने तुरंत ऑटो या सवारी के लिए सड़क पर आकर देखा तो सड़क पूरी तरह सुनसान पड़ी हुई थी। कोई आदमी भी आ नहीं नजर आ रहा था, ऑटो गाड़ियां तो दूर की बात थी। यह देखकर मेरे माथे पर चिंता की लकीरें और बढ़ गई की ऐसी हालत में मैं पत्नी को दूसरे अस्पताल कैसे ले जा पाऊंगा। 

फिर भी मैंने सड़क में आगे पीछे जाकर मैंने ऑटो या किसी गाड़ी की काफी तलाश की, लेकिन दुर्भाग्य था कि उस रात को कोई भी ऑटो नहीं मिल पाया।जैसे जैसे समय धीरे-धीरे बीत रहा था वैसे ही चिंता भी बढ़ती जा रही थी। इस समय तक मैं काफी घबरा चुका था। डॉक्टर ने तो पहले ही कह दिया था कि ज्यादा देर करना उचित नहीं होगा, शीघ्र से शीघ्र आप दूसरे हास्पिटल में लेकर चले जाएं। मेरी घबराहट और चिंता देखकर पत्नी ने मुझे हिम्मत बंधाते हुए कहा कि ऑटो नहीं मिल रहा है तो चलो कोई बात नहीं मैं धीरे-धीरे पैदल चलने का प्रयास करूंगी, चलो चलते हैं दूसरे हॉस्पिटल।लेकिन मैं इसके पक्ष में बिलकुल नहीं था…पर क्या करें परिस्थितियों भी ऐसी नाजुक हो चली थी कि मुझे पत्नी की बात मानना पड़ी। 

और फिर हमने जल्दी-जल्दी अपने सारे सामान समेटे और अस्पताल से बाहर निकलने का उपक्रम करने लगे। इस समय रात बारह बजे से ऊपर हो चुका था, वही, मौसम भी बिगड़ने लग गया था..लग रहा था कि अब तब में बारिश शुरू हो जाएगी। उपर आसमान में बादल भी जोर-जोर से गरज रहे थे, हवाएं तेज चलनी शुरू हो गई।आसमानी बिजली भी चमक चमक कर डराने लग गई। मेरे लिए ये समय घबराहट भरा और डरावना हो चुका था। फिर भी हिम्मत और भगवान के सहारे आखिरकार इस बिगड़ते हुए मौसम में पत्नी को मैं लेकर पैदल ही खाली सुनसान सड़क पर चल पड़ा। ऐसा करने का बिल्कुल मन नहीं था लेकिन क्या करें मजबूरी थी, पत्नी को मुझे जितनी जल्दी हो शीघ्रताशीघ्र हास्पिटल पहुंचाना जरूरी जो था, वरना कुछ भी हो सकता था। धीरे-धीरे हम नीचे उतरकर सड़क पर आ पहुंचे..इधर सड़क भी पूरी तरह सुनसान और अंधेरे में डूबी हुई थी। सारे शहर में अंधेरा सा फैला हुआ था शायद बिजली गुल हो चुकी थी। 

         इसी बीच बारिश की बूंदाबांदी भी शुरू हो गई , यह सब देखकर मन घबराने लगा। मन में मैंने भगवान से कहा- हे भगवान सब ठीक हो जाए..! यही प्रार्थना करते हुए हम पैदल धीरे-धीरे अपने गंतव्य की ओर बढ़ने लगे। गनीमत तो यह थी कि सासू मां भी हमारे साथ थीं जिनके रहने से कुछ हिम्मत मिल रही थी।अंततः धीरे-धीरे हम डॉक्टर के बताए हुए जगमल चौक मेटरनिटी हॉस्पिटल पहुंच ही गए। हॉस्पिटल में तुरंत इमरजेंसी प्रकरण देखते हुए पत्नी को एडमिट कर लिया गया। शायद मिशनरी अस्पताल की डॉक्टर ने फोन कर उन्हें सारी जानकारी दे दी थी। सो वे लोग भी तैयार थे।वहां के डॉक्टर ने तत्काल अपनी चिकित्सा प्रक्रिया शुरू कर दी, इस बीच डॉक्टर ने मुझे नीचे जाकर बैठने को कहा था, सो मैं अस्पताल के नीचे टपरेनुमा टीन की शेड के नीचे चिंतामग्न विचारों के उधेड़बुन में खोया एक स्टूल में बैठा हुआ था।इस बीच बारिश धीरे-धीरे काफी तेज हो चुकी थी। पानी की बौछारें मुझ पर भी पड़कर मुझे भिगाने लगी थी ,लेकिन मेरा इन सब बातों की तरफ ध्यान ही नहीं था। केवल पत्नी और होने वाले बच्चे की चिंता थी,उनकी कुशलता के लिए मैं भगवान से प्रार्थना कर रहा था।

            इस दौरान बेहद चिंतित जंजालों के बीच घिरे हुए मुझे यह नहीं पता चला कि कब भोर हो गई। करीब साढ़े पांच बजे अचानक नर्स ने जब  मुझे पुकारा तभी मेरी तंद्रा भंग हुई। उसकी आवाज सुनकर मैं उसकी ओर सवालिया नजरों से देखने लगा तो उसने कहा की आपको जल्दी डॉक्टर  बुला रहे हैं, इतना सुनते ही मैं तुरंत डाक्टर के पास पहुंच गया। मुझे देखते ही उन्होंने कहा- हमने अब तक प्रसव के लिए सब प्रयास कर लिया है ..अब  लगता है कुछ भी नहीं किया जा सकता। केवल ऑपरेशन ही एक उपाय बचा है और जल्द ही आपरेशन  नहीं करेंगे तो दोनों की जान पर खतरा हो सकता है, इसलिए आप ऑपरेशन करने के परमिशन पेपर पर सिग्नेचर कर दें। यह सुनकर मैं कुछ हिचकिचाया और पत्नी की ओर देखा तो पत्नी ने सहमति के लिए इशारा किया, तो मैंने  पेपर पर सिग्नेचर करने में देर नहीं किया। इसके बाद डॉक्टर की टीम ऑपरेशन की तैयारी में जुट गई। मैं फिर नीचे जाकर इंतजार करने लगा।अंततः सुबह करीब सवा छह बजे ऑपरेशन हुआ और अंततःसुखद सूकुन भरी खबर मुझे मिली की ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा है,और स्वस्थ बच्चा हुआ था ,जच्चा बच्चा दोनों सुरक्षित और खतरे से बाहर थे। नर्स ने आकर जब यह सब समाचार मुझे सुनाया तो मन में भरी तमाम चिंताएं कुहासा बनकर उड़ गई।

           मारे खुशी के कोई ठिकाना नहीं था।मैंने ऊपर वाले को धन्यवाद दिया, फिर डॉक्टर के परमिशन मिलने पर मैंने जाकर के पत्नी को देखा। पत्नी कुछ अर्ध बेहोशी की हालत में बेड पर लेटी हुई थी और बच्चा भी पालने में आंखें बंद किए सोए हुए था। मैंने देखा वह दोनों पूरी तरह ठीक नजर आए। यह सब कुछ देख लेने के बाद मन में ठंडकता आ गई और रातभर की छाई हुई चिंता की लकीरें मिट गईं। इस बीच सासू मां ने मुझे पत्नी और नवजात बच्चे के लिए आवश्यक सामग्री लाने की हिदायत दी तो मैं जल्दी-जल्दी सामान लाने घर की ओर  निकल पड़ा।अब इधर मैं घर की ओर आ रहा था  तभी एक और खुशियों  भरी अजीब घटना हो गई। जैसा कि मैंने बताया कि मैं खुशी खुशी घर की ओर जा रहा था तब तक सुबह के करीब साढ़े आठ बज चुके थे।घर पहुंचने ही वाला था कि रास्ते में मुझे बचपन के मित्र संतोष यादव मिल गए।

मैंने उनसे कुशलछेम पूछा और आगे कुछ कहता उसके पहले ही वह अचानक बड़ा खुश होकर बोल उठा – “बहुत-बहुत बधाई हो दोस्त भतीजा हुआ है! ” इतना  सुनते ही मैं बड़े आश्चर्य में चौक कर उसे देखने लग गया कि इसे कैसे मालूम हुआ कि मेरे यहां पुत्र आगमन हुआ है। मैंने इस बारे में अब तक तो किसी को कुछ बताया भी नहीं है। मैं आखिर आश्चर्य में डूबा हुआ उससे बोल ही पड़ा कि भाई यह बात तुझे कैसे मालूम हो गई…?मैं तो अभी सीधे अस्पताल से ही आ रहा हूं! तब उसने मेरी बात को अनसुना करते हुए खुश होकर बोलने लगा। कैसे नहीं मालूम होगा भाई क्योंकि मैं बच्चों का बाप जो हूं,और आप उसके चाचा!यह सुनकर मैं और आश्चर्य में सकपका उठा।

तब मैंने कहा – इसका क्या मतलब भाई…?तब उसने जो बतलाया उससे खुशियाँ दुगनी तो हुई ही मुझे बहुत तेज़ हंसी आने लगी। दरअसल उसकी पत्नी ने भी ठीक उसी समय शहर के शासकीय अस्पताल में एक पुत्र को जन्म दिया था। फिर मैंने जब उसे यह बताया कि भाई मेरे यहां भी इसी समय पुत्र रत्न का आगमन हुआ है।मैं समझा था तू मेरे पुत्र के बारे में बता रहा है। तब यह सुनकर उसने कहा कि मैं तो अपने पुत्र के बारे में बोल रहा था भाई। जब दोनों को यह पता लगा कि दोनों के ही घर में इस समय पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है तो जानकर हम दोनों ने हंसते हुए एक दूसरे को गले लगा लिया।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”

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