पौराणिक कथाओं से वर्तमान तक: भारत की 108 महागाथाओं की यात्रा

भारत की 108 पौराणिक महागाथाएँ केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि भारतीय चेतना की एक सजीव यात्रा है। यह कृति भारत को किसी भौगोलिक या राजनीतिक इकाई के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक प्रवाह के रूप में प्रस्तुत करती है। डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित पुस्तक भारत की 108 पौराणिक महागाथाएँ जिसके लेखक गोपाल शर्मा जी है। गोपाल शर्मा की यह पुस्तक उस सनातन परंपरा का आधुनिक पुनर्पाठ है, जिसमें मिथक, इतिहास, दर्शन और लोक-स्मृति एक-दूसरे में घुलकर एक व्यापक बौद्धिक अनुभव रचते हैं। गोपाल शर्मा का लेखकीय परिचय अपने आप में इस कृति की विश्वसनीयता को मजबूत करता है। साहित्य, भाषा, संस्कृति, धर्म और पौराणिक अध्ययन पर लगभग सौ पुस्तकों के लेखक होने के कारण वे केवल कथावाचक नहीं, बल्कि एक गहन अध्येता और संवेदनशील व्याख्याकार भी हैं। वेदों, उपनिषदों और पुराणों के उनके हिंदी और अंग्रेज़ी अनुवादों की विद्वत परंपरा इस पुस्तक में भी स्पष्ट रूप से झलकती है। यह पुस्तक अकादमिक बोझिलता से मुक्त है, फिर भी बौद्धिक गरिमा से परिपूर्ण है—यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।
पुस्तक का मूल ढांचा ‘108’ अध्यायों पर आधारित है, और यह संख्या यहाँ केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि दार्शनिक रूप से सारगर्भित है। 108 भारतीय परंपरा में ब्रह्मांडीय पूर्णता का संकेत है—108 मनकों की माला, 108 ऊर्जा केंद्र, और ज्ञात से अज्ञात की यात्रा के 108 चरण। लेखक इस संख्या के माध्यम से पाठक को संकेत देते हैं कि यह पुस्तक रैखिक इतिहास नहीं, बल्कि चेतना की परिक्रमा है।
शर्मा अध्यायों को किसी सख्त कालक्रम में नहीं बांधते। वे “आत्मा की वाणी” के अनुसार विषयों का चयन करते हैं। पुस्तक भारत और ‘भारत’ नाम की उत्पत्ति से शुरू होकर वेदों, ऋषियों, देवताओं, नदियों, राजाओं, स्त्रियों, दार्शनिकों और अंततः आधुनिक संदर्भों तक पहुँचती है। यह संरचना पाठक को स्वतंत्रता देती है—आप इसे क्रम से पढ़ें या किसी भी अध्याय से आरंभ करें, हर जगह एक पूर्ण अनुभव मिलता है।



इस कृति में पौराणिक कथाएँ केवल देवताओं की लीलाएँ नहीं रह जातीं, बल्कि वे मानवीय संघर्ष, नैतिक द्वंद्व, करुणा, प्रेम, त्याग और प्रश्नाकुलता की कहानियाँ बन जाती हैं। नचिकेता का यम से संवाद हो या सावित्री का मृत्यु से संघर्ष, गार्गी और मैत्रेयी का दार्शनिक साहस हो या द्रौपदी और गांधारी की मौन पीड़ा—हर कथा आधुनिक पाठक से सीधे संवाद करती है। लेखक इन पात्रों को पूजनीय प्रतिमाओं से निकालकर चिंतनशील मानवीय रूप में प्रस्तुत करते हैं।
भाषा की दृष्टि से पुस्तक अत्यंत समृद्ध है। शर्मा की शैली में काव्यात्मकता और वैचारिक स्पष्टता का सुंदर संतुलन दिखाई देता है। कहीं उपनिषदों की गंभीरता है, कहीं पुराणों की कथा-धारा, और कहीं आधुनिक निबंधात्मक प्रवाह। वे स्वयं स्वीकार करते हैं कि कुछ स्थलों पर उपदेश देने का मन हुआ—और यही ईमानदारी पाठक को लेखक से जोड़ती है। यह पुस्तक ज्ञान थोपती नहीं, बल्कि जिज्ञासा जगाती है।
विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि लेखक ने अल्प-ज्ञात कथाओं को भी आधुनिक संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है। यह कार्य “तलवार की धार पर चलने” जैसा है—जहाँ परंपरा से विचलन का खतरा भी है और नवीनता की मांग भी। शर्मा इस संतुलन को साधने में सफल रहते हैं। वे न तो मिथकों का सरलीकरण करते हैं और न ही उन्हें अकादमिक जटिलता में उलझाते हैं। पुस्तक का अंतिम खंड पाठक को वर्तमान से जोड़ता है। यह याद दिलाता है कि ये कथाएँ किसी बीते युग की धरोहर नहीं, बल्कि जीवन के जीवित दस्तावेज हैं। आज के समय में, जब पहचान, मूल्य और संस्कृति को लेकर प्रश्न उठते हैं, यह पुस्तक आत्मगौरव और आत्मचिंतन—दोनों का अवसर देती है।



कुल मिलाकर, भारत की 108 पौराणिक महागाथाएँ एक ऐसी कृति है जो विद्वानों, विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और सामान्य पाठकों—सभी के लिए समान रूप से उपयोगी है। यह पुस्तक न तो पाठ्यपुस्तक बनने का दावा करती है और न ही पूर्ण संकलन होने का। यह एक “जपमाला” है—जिसका हर मनका पाठक को ठहरने, सोचने और भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करता है। यदि इस पुस्तक को पढ़ते हुए पाठक के भीतर “एक शांत हलचल”—शाश्वत जीवन की एक कोमल प्रतिध्वनि—जन्म लेती है, तो निस्संदेह लेखक का उद्देश्य पूरा होता है। यह पुस्तक भारतीय ज्ञान परंपरा में रुचि रखने वाले प्रत्येक पाठक के लिए अत्यंत अनुशंसित है।
पुस्तक: भारत की 108 पौराणिक महागाथाएँ
लेखक: गोपाल शर्मा
प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स

समीक्षक : उमेश कुमार सिंह

