बिलासपुरः धान की कटाई के बाद मनाया जाने वाला छत्तीसगढ़ का लोकपर्व छेरछेरा सामाजिक समरसता और दान भावना का अनूठा उदाहरण है। पौष माह की पूर्णिमा पर मनाए जाने वाले इस पर्व को दान का महापर्व कहा जाता है। नगर में शनिवार को छेरछेरा पूर्णिमा की परंपरा पूरे उल्लास के साथ निभाई गई, इस अवसर पर गांवों के साथ शहर के बाजारों और मोहल्लों में भी लोकसंस्कृति जीवंत नजर रहीं।छेरछेरा पर्व छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति की आत्मा से जुड़ा हुआ है। यह त्योहार किसानों की सालभर की मेहनत, अन्न के सम्मान और समाज में बराबरी की भावना को दर्शाता है। जिले में पौष छेरछेरा पूर्णिमा पर सुबह से ही बच्चों की टोलियां हाथों में झोला, बोरी या थैला लेकर घर-घर निकल पड़े। छेरछेरा. माई कोठी के धान ला हेरते हेरा की लोकपंक्तियां गलियों, चौक-चौराहों और बाजारों में गूंजी। इस दिन लोग धान, चावल, पैसे या खाद्य सामग्री का दान करते हैं। मान्यता है कि छेरछेरा के दिन अन्नदान करने से घर में सुख-समृद्धि और धन-धान्य की कमी नहीं रहती। जूना बिलासपुर,गोंडपारा व्यापार विहार, गोल बाजार, तेलीपारा, तोरवा, सरकंडा और नेहरू चौक जैसे इलाकों में छेरछेरा बच्चों के लिए किसी त्योहार से कम नहीं रहा।

हितार्थ एक सेवा ने भी बच्चों के संग मनाया छेरछेरा त्योहार
छेरछेरा पुन्नी के अवसर पर आज बच्चों की टोली हितार्थ एक सेवा की संस्थापक सुनीता सिंह के निवास पर “छेरछेरा… माई कोठी में कोठी के धान ल हेरते हेरा” गीत को गुंजायमान करती हुई पहुंची। जहां बच्चों को छेरछेरा के रूप में मिष्ठान वितरित किया गया एवं एवं उपहार देकर सभी बच्चों को संतुष्ट किया गया इस अवसर पर हितार्थ एक सेवा के फाउंडर मेंबर सुरेश सिंह बैस ने सभी बच्चों को मिष्ठान वितरित करते हुए कहा की छेरछेरा का यह पर्व छत्तीसगढ़ के सोंधी सोंधी माटी की खुशबू लेकर आता है। मां अन्नपूर्णा की कृपा को नतमस्तक करते हुए ये खुशियों भरा पर्व मनाया जाता है। इस अवसर पर लोक कल्याण की भावना और मां धरती और अन्नपूर्णा का इस कामना के साथ पूजा अर्चना किया जाता है की मां ऐसे ही कृपा हम सब पर बनाए रखें।
छेरछेरा मांगने सुबह से निकलती है बच्चों की टोली
इस अवसर पर बच्चों की टोली नए कपड़े, झोला और दोस्तों के साथ टोलियां बनाकर घर-घर जाना उनके लिए रोमांच से भरा होता है।छेरछेरा केवल बच्चों तक सीमित नहीं है। बिलासपुर में कई मोहल्लों में बड़े भी टोलियां बनाकर डंडा नाच करते हुए छेरछेरा मांगने निकलते हैं।बच्चे और बड़ो का भी समूह बनाकर छेरछेरा मांगते नजर आएं। व्यापारी वर्ग भी इस लोकपर्व में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता है और बच्चों को दान देकर उनके चेहरों की मुस्कान का साक्षी बनता है। दान में मिला धान, चावल या पैसे उनकी मेहनत का पुरस्कार होता है। बच्चों के चेहरों पर दिखने वाली मुस्कान इस लोकपर्व की बड़ी पहचान बन जाती है।ढोलक, झांझ और मजीरे की थाप पर लोकगीत गूंजते हैं। दान में मिले धान को सभी मिलकर उपयोग करते हैं, जिससे सामूहिक आनंद और गहरा होता है।कई स्थानों पर मां अन्नपूर्णा की पूजा होती है। घरों में मीठा चीला,गुलगुला, ठेठरी-खुरमी जैसे पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं। दान में मिले धान को बेचकर कुछ टोलियां सामूहिक भोज या पिकनिक का आयोजन भी करती हैं, जिससे सामूहिकता और भाईचारा और मजबूत होता है।