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विश्व पटल पर बालिकाओं का नवयुगः बदली सोच, उभरी शक्ति

एक समय था जब दुनिया के बड़े हिस्से में बेटी का जन्म बोझ समझा जाता था। गर्भ में ही उसके जीवन का अंत कर दिया जाता, या जन्म के बाद भेदभाव, उपेक्षा और वंचना उसका भाग्य बनती। सदियों तक चली इस दकियानूसी एवं पुरानपंथी सोच ने समाज, सभ्यता और प्रकृति-तीनों को गहरे घाव दिए। किंतु आज उसी दुनिया में सोच के स्तर पर एक निर्णायक मोड़ दिखाई दे रहा है, एक नयी सोच का उदय हो रहा है।

विश्व पटल पर बालिकाओं का नवयुगः बदली सोच, उभरी शक्ति

गैलप इंटरनेशनल जैसे वैश्विक सर्वे यह संकेत देते हैं कि 44 देशों में माता-पिता की बड़ी संख्या अब संतान के लिंग को लेकर उदासीन हो रही है, उन्हें फर्क नहीं पड़ता कि बच्चा लड़का है या लड़की। यह बदलाव केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि मानव चेतना में घटित एक ऐतिहासिक परिवर्तन है। बालिकाओं को लेकर बदल रही यह सोच मानवीयता का दर्शन करा रही है। यह सच है कि तस्वीर का एक पक्ष उजला है तो दूसरा अब भी चिंताजनक। पिछले 25 वर्षों में दुनिया ने लगभग 70 लाख बच्चियों को बचाया है, यह मानवीय प्रगति का बड़ा प्रमाण है। परंतु यह भी उतना ही कड़वा सत्य है कि आज भी हर साल दस लाख से अधिक बच्चियां गर्भ में ही खत्म कर दी जाती हैं और बीते 45 वर्षों में यह संख्या पाँच करोड़ से अधिक रही है। यानी लड़का-लड़की के भेद का राक्षस अभी पूरी तरह पराजित नहीं हुआ है। इसके बावजूद, उम्मीद की किरण इसलिए प्रबल है क्योंकि अब यह भेद सामाजिक स्वीकृति खो रहा है, और यही किसी भी क्रांति की सबसे ठोस बुनियाद होती है।

भारत में यह संघर्ष और भी जटिल रहा है। कम शिक्षा, रूढ़िवादी पितृसत्तात्मक सोच, अंधविश्वास और सामाजिक भ्रांतियों ने लंबे समय तक बालिकाओं के अस्तित्व पर संकट बनाए रखा। लेकिन हाल के वर्षों में स्थिति में उल्लेखनीय सुधार दिखता है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के अनुसार, भारत में बेटों की चाहत 1999 के 33 प्रतिशत से घटकर अब 15 प्रतिशत रह गई है। यह गिरावट केवल सांख्यिकीय नहीं, बल्कि मानसिकता में आए बदलाव का संकेत है। फिर भी, 15 प्रतिशत भी कम नहीं क्योंकि इसका सीधा असर लिंगानुपात पर पड़ता है। आज देश में लिंगानुपात 1000 लड़कों पर 943 लड़कियों का है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार जन्म के समय लड़के-लड़कियों का प्राकृतिक अनुपात लगभग 105: 100 होता है, जो पाँच वर्ष की आयु तक बराबर हो जाना चाहिए।

यदि पाँच साल के बाद भी 1000 लड़कों पर 57 लड़कियाँ कम हैं, तो स्पष्ट है कि प्रकृति नहीं, समाज हस्तक्षेप कर रहा है। 57 बड़ा अंतर है। सुधार की जो गति चल रही है, उस हिसाब से इस अंतर को पाटने में पच्चीस साल से ज्यादा लग जाएंगे। ये बच्चियां दुनिया में कदम रखें और अच्छी तरह से खुशगवार जिंदगी जिएं, इसके लिए उन्हें बचाने के उपाय, उनकी व्यापकता और गति सब बढ़ाने होंगे। सृष्टि के संतुलन के लिए भी यह जरूरी है। समाज की विडम्बनापूर्ण सोच ही वह “बाहरी शक्ति” है-भेदभाव, उपेक्षा, असमान पोषण, स्वास्थ्य और अवसर जो संतुलन को बिगाड़ रही है। मौजूदा सुधार की गति से इस अंतर को पाटने में पच्चीस वर्ष से अधिक लग सकते हैं। इसलिए उपायों की व्यापकता और गति दोनों को बढ़ाना अनिवार्य है।

इस बदलाव के पीछे शिक्षा सबसे बड़ा कारक बनकर उभरी है। जब-जब लड़कियों को शिक्षा के समान अवसर मिले, उन्होंने न केवल अपनी क्षमताएँ सिद्ध कीं, बल्कि समाज की दिशा भी बदली। भारत सहित कई देशों में बालिका शिक्षा, छात्रवृत्ति, डिजिटल साक्षरता, कौशल विकास और स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं ने लड़कियों के जीवन-पथ को नया आयाम दिया है। आज ग्रामीण क्षेत्रों तक स्कूल नामांकन में बालिकाओं की भागीदारी बढ़ी है, उच्च शिक्षा में उनकी उपस्थिति मजबूत हुई है और विज्ञान, तकनीक, खेल, प्रशासन तथा उद्यमिता-हर क्षेत्र में वे अपनी पहचान बना रही हैं। महत्वपूर्ण यह भी है कि अब नीतियाँ केवल संरक्षण तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि सशक्तिकरण की ओर बढ़ी हैं। शिक्षा के साथ-साथ पोषण, मातृत्व स्वास्थ्य, सुरक्षित परिवहन, डिजिटल पहुँच और नेतृत्व प्रशिक्षण, इन सभी ने मिलकर बालिकाओं के आत्मविश्वास को पंख दिए हैं। यह समग्र दृष्टि ही भविष्य की महिलाओं को “सहायता पाने वाली” नहीं, बल्कि “निर्णय लेने वाली” बनाती है।

दुनिया के कई देशों में महिलाएँ अब राजनीति, प्रशासन और कॉरपोरेट नेतृत्व में अग्रिम पंक्ति में हैं। वे राष्ट्राध्यक्ष हैं, सेनाओं का नेतृत्व कर रही हैं, वैज्ञानिक खोजों की अगुआई कर रही हैं और वैश्विक संस्थानों में नीति-निर्धारण का हिस्सा हैं। यह परिवर्तन इस बात का प्रमाण है कि अवसर मिलने पर प्रतिभा लिंग नहीं देखती। गैलप इंटरनेशनल के सर्वे में उभरी उदासीनता कि संतान का लिंग मायने नहीं रखता, दरअसल इसी विश्वास का सामाजिक विस्तार है कि लड़कियाँ भी उतनी ही सक्षम हैं। पहली बार दुनिया के स्तर पर बालिकाओं को लेकर एक सकारात्मक परिदृश्य उभरा है, इन बालिकाओं को लेकर बदली सोच एवं उभरी शक्ति के परिदृश्यों के बीच यह समय बालिकाओं-महिलाओं पर हो रहेे अपराध, शोषण, बलात्कार, भेदभाव के त्रासद एवं क्रूर स्थितियों पर आत्म-मंथन करने का है, क्योंकि बालिकाओं एवं महिलाओं के समावेश, न्याय व सुरक्षा की स्थिति को बताने वाले वैश्विक शांति व सुरक्षा सूचकांक के 177 देशों में भारत का 128वां स्थान है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं के विरूद्ध अपराध में राष्ट्रीय औसत 66.4 है। राजधानी दिल्ली का स्थान 144.4 अंकों के साथ सर्वाेच्च है।

माना जाता है कि 90 प्रतिशत यौन उत्पीड़न जान-पहचान के व्यक्ति ही करते हैं। यानी बालिकाएं अपने ही घर या परिचितों के बीच सबसे ज्यादा असुरक्षित है। कानून और योजनाएँ आवश्यक हैं, पर पर्याप्त नहीं। असली परिवर्तन संस्कृति में होता है-घर के भीतर, भाषा में, परंपराओं में। जब परिवार बेटी के जन्म को उत्सव मानता है, उसकी शिक्षा में निवेश करता है, उसे निर्णयों में भागीदार बनाता है-तभी लिंगानुपात के आँकड़े स्थायी रूप से सुधरते हैं। मीडिया, साहित्य और सिनेमा की भूमिका भी यहाँ निर्णायक है; वे या तो रूढ़ियों को पोषित करते हैं या नई दृष्टि गढ़ते हैं। आज सकारात्मक प्रस्तुतियाँ बढ़ रही हैं, जो लड़कियों को आत्मनिर्भर, साहसी और नेतृत्वकारी रूप में दिखाती हैं यह सांस्कृतिक परिवर्तन का संकेत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की शुरुआत का लक्ष्य भी बालिका लिंग अनुपात में गिरावट के मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करना है।

भविष्य की दिशा स्पष्ट है-समानता केवल अधिकारों की सूची नहीं, बल्कि अवसरों की वास्तविक उपलब्धता है। बालिकाओं को बचाना पहला कदम था; अब उन्हें बढ़ने, उड़ने और नेतृत्व करने देना अगला चरण है। स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा के साथ-साथ रोजगार, संपत्ति अधिकार, डिजिटल अवसर और निर्णय-निर्माण में हिस्सेदारी-ये सभी समानता के स्तंभ हैं। यदि इन पर निरंतर और समन्वित कार्य हुआ, तो आने वाले वर्षों में लिंगानुपात केवल सुधरेगा ही नहीं, बल्कि समाज अधिक संतुलित, संवेदनशील और उत्पादक बनेगा। एक समय था जब बालिका को कोख में ही समाप्त कर दिया जाता था; आज वही दुनिया उसके जन्म पर प्रसन्नता व्यक्त कर रही है। यह बदलाव अधूरा है, पर निर्णायक है। भारत में बेटों की चाहत का घटता ग्राफ, दुनिया भर में लिंग-उदासीनता की बढ़ती प्रवृत्ति और महिलाओं के लिए विस्तृत होती शिक्षा-सशक्तिकरण योजनाएँ-सब मिलकर संकेत देते हैं कि आने वाला समय वास्तव में महिलाओं का समय है। यदि यह गति बनी रही, तो देश की बालिकाएँ न केवल अपना परचम फहराएँगी, बल्कि मानव सभ्यता को अधिक न्यायपूर्ण और संतुलित दिशा भी देंगी। यही सृष्टि का स्वाभाविक और आवश्यक संतुलन है।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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