महाशिवरात्रि: अंधकार से आत्मबोध तक की शिव-यात्रा

15 फरवरी महाशिवरात्रि पर्व पर विशेष

सनातन चेतना में महाशिवरात्रि केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मा के जागरण की दिव्य रात्रि है। यह वह क्षण है जब साधक बाह्य संसार की चंचलता से हटकर अंतर्मन में उतरता है और शिव-तत्त्व का अनुभव करता है। ‘शिव’ का अर्थ ही है कल्याण। जहाँ शिव हैं, वहाँ भय, द्वंद्व और अज्ञान का स्थान नहीं रहता।

आज के भौतिकतावादी और तनावग्रस्त युग में महाशिवरात्रि का महत्व और भी गहरा हो जाता है, क्योंकि यह पर्व मनुष्य को बाहरी सफलता नहीं, बल्कि आंतरिक शांति की ओर ले जाता है। महाशिवरात्रि वह रात्रि है जब प्रकृति स्थिर होती है और चेतना ऊर्ध्वगामी होती है। योगशास्त्र के अनुसार इस रात्रि पृथ्वी की ऊर्जा मानव शरीर में सहज रूप से ऊपर की ओर प्रवाहित होती है। यही कारण है कि इस रात्रि ध्यान, मौन और साधना विशेष फलदायी माने गए हैं। शिव को आदियोगी कहा गया है वे प्रथम गुरु हैं, जिन्होंने मानवता को योग, ध्यान और आत्मानुशासन का मार्ग दिखाया। आधुनिक जीवन और हलाहल विष आज का मनुष्य भी प्रतिदिन हलाहल विष का सामना कर रहा है कार्य का दबाव, प्रतिस्पर्धा, रिश्तों में खटास, अकेलापन, उपभोग की असीम चाह और भविष्य की अनिश्चितता। यह विष धीरे-धीरे मन को अशांत, शरीर को रोगी और आत्मा को थका हुआ बना देता है।

समुद्र मंथन की कथा केवल पौराणिक घटना नहीं, बल्कि जीवन का शाश्वत रूपक है। जैसे देवताओं और दानवों के प्रयास से पहले विष निकला, वैसे ही जीवन में परिवर्तन और प्रगति से पहले संघर्ष और पीड़ा आती है। भगवान शिव का विषपान यह संदेश देता है कि जो चेतना में स्थिर है, वही विष को अमृत में बदल सकती है।

शिव पूजन बाह्य नहीं, अंतःयात्रा

महाशिवरात्रि पर शिवलिंग पूजन का आध्यात्मिक अर्थ अत्यंत गूढ़ है। शिवलिंग निराकार और साकार के मिलन का प्रतीक है। जब भक्त जल अर्पित करता है, तो वह अपने चंचल विचारों को शांत करता है; दूध अर्पण कर वह अपनी कठोरता को कोमलता में बदलता है। बेलपत्र अर्पण कर वह अपने तीन दोष

काम, क्रोध और लोभ का विसर्जन करता है। आज के समय में शिव पूजन का अर्थ है अपने भीतर के अहंकार, अधैर्य और असंतोष को त्यागना। यही सच्ची आराधना है।

महाशिवरात्रि का रात्रि जागरण केवल आँखों का जागना नहीं, बल्कि चेतना का जागरण है। यह आत्मनिरीक्षण की रात्रि है , मैं कौन हूँ, मेरा लक्ष्य क्या है, और मैं किन विषों को ढो रहा हूँ? आज जब समाज अवसाद, हिंसा और असहिष्णुता से जूझ रहा है, तब शिव का मौन और वैराग्य हमें सिखाता है कि हर समस्या का उत्तर शोर में नहीं, स्थिरता में छिपा है भगवान शिव आशुतोष हैं वे शीघ्र प्रसन्न होते हैं, क्योंकि वे भाव को देखते हैं, प्रदर्शन को नहीं। आज जब आडंबर और दिखावे ने साधना को भी प्रभावित किया है, शिव हमें सरलता और सच्चाई का मार्ग दिखाते हैं। एक क्षण का सच्चा ध्यान, एक आँसू भरी प्रार्थना, एक मौन स्वीकार यह सब शिव को प्रिय है। महाशिवरात्रि हमें यह स्मरण कराती है कि शिव मंदिर में ही नहीं, हमारे भीतर भी विराजमान हैं। जब हम अपने भीतर की नकारात्मकता, क्रोध और भय को स्वीकार कर उसे चेतना के कंठ में रोक लेते हैं, तब जीवन नीलकंठ बन जाता है। विष रहते हुए भी करुणा और संतुलन से भरा। महाशिवरात्रि पर्व आत्मा को शिवमय करने का अवसर है। ये बाहरी अंधकार से नहीं, भीतरी प्रकाश से जीवन को बदलने का पर्व है।

डा. पंकज भारद्वाज 
डा. पंकज भारद्वाज 
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