NEW English Version

युद्ध नहीं, शांति ही बदलती दुनिया की अनिवार्य अपेक्षा

नई बनती दुनिया का चेहरा जितनी तेजी से बदल रहा है, उतनी ही तेजी से वैश्विक असुरक्षा की भावना भी गहराती जा रही है। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता टकराव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं है, बल्कि वह एक ऐसे वैश्विक असंतुलन का संकेत है जिसमें शक्ति संतुलन की पुरानी व्यवस्थाएं टूट रही हैं और नई विश्व-व्यवस्था अभी स्थिर रूप नहीं ले सकी है। जब महाशक्तियां प्रत्यक्ष या परोक्ष युद्ध में उतरती हैं, तब उसका प्रभाव सीमाओं से परे जाकर समूची मानवता को प्रभावित करता है। ऊर्जा बाजार, आपूर्ति श्रृंखलाएं, मुद्रा विनिमय दरें, शेयर बाजार, खाद्य सुरक्षा, शांतिपूर्ण मानव जीवन और कूटनीतिक समीकरण-सब कुछ अनिश्चितता के घेरे में आ जाता है।

मध्यपूर्व में किसी भी बड़े युद्ध का पहला असर तेल आपूर्ति पर पड़ता है। होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाली वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति यदि बाधित होती है तो तेल की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। भारत जैसे ऊर्जा-आयातक देश के लिए यह स्थिति दोहरी चुनौती लेकर आती है-एक ओर आयात बिल बढ़ता है, दूसरी ओर महंगाई और राजकोषीय दबाव में वृद्धि होती है। यदि कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं तो परिवहन, उर्वरक, बिजली और विनिर्माण लागत में वृद्धि अनिवार्य है, जिसका सीधा असर आम नागरिक की जेब पर पड़ता है। वैश्विक वित्तीय बाजार पहले ही अनिश्चितता से जूझ रहे हैं, ऐसे में लंबा खिंचता युद्ध निवेश और विकास की गति को भी धीमा कर सकता है।

ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता टकराव केवल दो देशों का संघर्ष नहीं, बल्कि बदलती विश्व-व्यवस्था की परीक्षा है। ऐसे समय में युद्ध को तेज़ करने के बजाय उसे रोकने की कोशिशों को और अधिक गति देने की आवश्यकता है। दोनों पक्षों से परिपक्वता और संयम की अपेक्षा है, विशेषकर अमेरिका से, जो स्वयं को वैश्विक नेतृत्व की भूमिका में देखता है और जिसे शक्ति के साथ-साथ जिम्मेदारी का भी परिचय देना चाहिए। एक तेल उत्पादक देश के रूप में ईरान का अस्तित्व और स्थिरता विश्व अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है; वहां की अस्थिरता ऊर्जा बाजार से लेकर विकासशील देशों की वित्तीय संरचना तक को प्रभावित कर सकती है। हालिया हमलों में सैकड़ों लोगों के मारे जाने, हजारों के घायल होने और बड़ी संख्या में लोगों के फंसे होने की खबरें मानवता के लिए गहरी चिंता का विषय हैं। ईरान में शीर्ष नेतृत्व पर हमलों और उसके बाद तेहरान आदि मुस्लिम देशों की तीखी प्रतिक्रियाओं ने पश्चिम एशिया के हालात को और अधिक विस्फोटक बना दिया है। यह संघर्ष केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा; इसका प्रभाव दक्षिण एशिया की भू-राजनीति, समुद्री मार्गों की सुरक्षा, वैश्विक कूटनीतिक संतुलन और विश्व अर्थव्यवस्था पर दूरगामी होगा।

युद्ध आर्थिक संकट ही नहीं लाता, वह सामाजिक ताने-बाने को तोड़ता है, सांस्कृतिक संवाद को बाधित करता है और राष्ट्रों के बीच अविश्वास की दीवारें ऊंची करता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि बदलती दुनिया में सह-अस्तित्व, संवाद और बहुपक्षीय सहयोग की भावना को पुनर्जीवित किया जाए। शक्ति प्रदर्शन के स्थान पर समझदारी, प्रतिशोध के स्थान पर कूटनीति और वर्चस्व के स्थान पर साझी जिम्मेदारी-इन्हीं मूल्यों से विश्व को स्थिरता मिल सकती है। यह संघर्ष केवल आर्थिक नहीं, बल्कि वैचारिक और भू-राजनीतिक भी है। यूक्रेन संकट के बाद विश्व पहले ही ध्रुवीकरण की दिशा में बढ़ चुका था। अब यदि पश्चिम एशिया में स्थायी अस्थिरता पैदा होती है तो वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए संतुलन साधना कठिन हो जाएगा।

भारत एक ओर अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ा रहा है, तो दूसरी ओर ईरान के साथ उसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और ऊर्जा संबंध भी रहे हैं। इसके साथ ही इजरायल के साथ रक्षा और तकनीकी सहयोग भी मजबूत हुआ है। ऐसे में किसी एक पक्ष के साथ खुलकर खड़े होना भारत की बहुस्तरीय विदेश नीति के लिए जटिल प्रश्न बन सकता है।
भारत की विशेष चिंता यह भी है कि मध्यपूर्व में लगभग 90 लाख भारतीय कार्यरत हैं। यदि युद्ध की आग फैलती है तो न केवल उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ेगी, बल्कि भारत को मिलने वाली अरबों डॉलर की प्रेषण राशि पर भी प्रभाव पड़ेगा। इसके अतिरिक्त, लाल सागर और खाड़ी क्षेत्र में समुद्री मार्गों पर तनाव बढ़ने से व्यापारिक शिपमेंट महंगे हो सकते हैं।

यह परिस्थिति भारत के विकास पथ पर दबाव डाल सकती है, जो अभी विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिना जा रहा है। ऐसे समय में भारत की भूमिका केवल एक प्रभावित राष्ट्र की नहीं, बल्कि एक संभावित मध्यस्थ और संतुलनकर्ता की भी हो सकती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पिछले वर्षों में बहुध्रुवीय कूटनीति की जो नीति अपनाई है, वह इसी प्रकार की जटिल परिस्थितियों में उपयोगी सिद्ध हो सकती है। भारत ने एक ओर अमेरिका के साथ सामरिक साझेदारी को सुदृढ़ किया है, वहीं रूस से ऊर्जा सहयोग बनाए रखा है और पश्चिम एशिया के देशों के साथ भी संतुलित संबंध कायम रखे हैं। यह ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति भारत को किसी एक खेमे में बंधने से बचाती है। भारत का यह दृष्टिकोण उसे संवाद और शांति प्रयासों के लिए विश्वसनीय मंच प्रदान कर सकता है।

भारत इस समय ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है, जिसमें ईरान भी सदस्य बन चुका है। यह मंच वैश्विक दक्षिण की आवाज को सशक्त करने का अवसर देता है। यदि भारत इस मंच के माध्यम से युद्धविराम, संवाद और बहुपक्षीय समाधान की पहल करता है, तो वह न केवल अपनी कूटनीतिक विश्वसनीयता बढ़ा सकता है, बल्कि वैश्विक स्थिरता में भी योगदान दे सकता है। संयुक्त राष्ट्र की निष्क्रियता या सीमित प्रभाव के बीच मध्यम शक्तियों की भूमिका बढ़ना स्वाभाविक है। भारत, जो स्वयं उपनिवेशवाद और शीत युद्ध की राजनीति से सीख लेकर उभरा है, शांति-आधारित बहुपक्षवाद का पक्षधर बन सकता है। दूसरी ओर, दक्षिण एशिया में भी चुनौतियां कम नहीं हैं। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ते तनाव और आंतरिक अस्थिरता का प्रभाव भारत की सुरक्षा और क्षेत्रीय संतुलन पर पड़ सकता है। यदि पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ती है और साथ ही दक्षिण एशिया में भी उथल-पुथल होती है, तो भारत को दो मोर्चों पर रणनीतिक सतर्कता रखनी होगी। आतंकवाद, कट्टरता और अवैध हथियारों का प्रसार ऐसे वातावरण में बढ़ सकता है। अतः भारत के लिए यह समय केवल आर्थिक प्रबंधन का नहीं, बल्कि सुरक्षा और कूटनीतिक संयम का भी है।

समाधान क्या हो सकता है? प्रथम, युद्धविराम और संवाद की बहुपक्षीय पहल को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। वैश्विक शक्तियों को यह समझना होगा कि स्थायी शांति केवल सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि राजनीतिक समझौते और पारस्परिक सम्मान से आती है। द्वितीय, ऊर्जा आपूर्ति के वैकल्पिक स्रोतों और नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश को तेज करना होगा, ताकि तेल-निर्भरता कम हो और भू-राजनीतिक संकटों का असर सीमित किया जा सके। तृतीय, वैश्विक संस्थाओं का पुनर्गठन आवश्यक है, ताकि वे केवल महाशक्तियों के प्रभाव का साधन न बनकर न्यायपूर्ण और प्रभावी मंच बन सकें। चतुर्थ, क्षेत्रीय संवाद मंचों-जैसे ब्रिक्स, जी-20 और शंघाई सहयोग संगठन को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। भारत के लिए भी यह अवसर है कि वह ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अपनी परंपरा को व्यवहार में उतारे। शांति, सहअस्तित्व और संवाद का संदेश केवल भाषणों तक सीमित न रहकर ठोस कूटनीतिक पहलों में दिखना चाहिए। यदि भारत ऊर्जा विविधीकरण, रक्षा आत्मनिर्भरता, डिजिटल और हरित अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाता है, तो वह वैश्विक संकटों के बीच भी स्थिरता बनाए रख सकता है। प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति की सक्रियता-चाहे वह बहुपक्षीय मंचों पर भागीदारी हो या क्षेत्रीय देशों के साथ प्रत्यक्ष संवाद-भारत की अस्मिता और हितों की रक्षा के प्रयास का संकेत देती है।

निश्चित तौर पर युद्ध किसी भी देश के लिए स्थायी लाभ का माध्यम नहीं बन सकता। इतिहास गवाह है कि शक्ति-प्रदर्शन से अस्थायी विजय मिल सकती है, किंतु स्थायी शांति केवल न्याय, संवाद और सहयोग से ही आती है। नई बनती दुनिया को यदि स्थिर और मानवीय बनाना है, तो उसे हथियारों की दौड़ से आगे बढ़कर सहअस्तित्व की संस्कृति अपनानी होगी। भारत, जो स्वयं विविधता और सहिष्णुता का प्रतीक है, इस परिवर्तन का अग्रदूत बन सकता है। चुनौती बड़ी है, किंतु अवसर भी उतना ही व्यापक है-शर्त यह है कि विश्व नेतृत्व युद्ध की भाषा छोड़कर शांति की भाषा सीखे और भारत अपने संतुलित, स्वायत्त और दूरदर्शी दृष्टिकोण से इस वैश्विक उथल-पुथल में स्थिरता का स्तंभ बने।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
Book Showcase

Best Selling Books

Shri Durgasaptashati Sachitra

By Gorakhpur Gita Press

₹100

Book 2 Cover

Stop Letting Everything Affect You

By Daniel Chidiac

₹190

Truth without apology

By Acharya Prashant

₹240

30 Days to Better English

By Norman Lewis

₹199

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »