-13 फरवरी विश्व रेडियो दिवस-
13 फरवरी 2023 को 12वां वर्ल्ड रेडियो डे है। 13 फरवरी ही वह तारीख थी जब 1946 में अमेरिका में पहली बार रेडियो ट्रांसमिशन से संदेश भेजा गया था और संयुक्त राष्ट्र रेडियो की शुरुआत हुई थी।संचार माध्यम के तौर पर रेडियो हमेशा से चर्चा का विषय रहा है. एक समय था जब रेडियो सूचना का एक बड़ा माध्यम था।आपदा या आपातकालीन स्थिति में रेडियो का महत्व बढ़ जाता था। इसके अलावा मनोरंजन क्षेत्र में भी रेडियो ने अपनी अलग-अलग पहचान बनाई थी. बदलते दौर के साथ नए-नए संचार माध्यम आए और रेडियो का चलन कम होता चला गया।आज युवाओं को रेडियो की जरूरत और महत्व के बारे में बताने के लिए वर्ल्ड रेडियो दिवस मनाया जाता है।

आकाशवाणी दुनिया के सबसे बड़े सार्वजनिक प्रसारण संगठनों में से एक है, जो 23 भाषाओं और 179 बोलियों में प्रसारण करता है। रेडियो केवल एक मशीन नहीं, बल्कि भारत की विविधता को जोड़ने वाला एक सूत्र है। 13 फरवरी 2026 की थीम है – रेडियो और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस । स्लोगन है – ”एआई एक टूल है, आवाज नहीं”।
स्मार्टफोन और इंटरनेट के युग में भी रेडिरयो भारत का सबसे भरोसेमंद साथी बना हुआ है। चाहे वह कार में बजता एफएम हो या गाँव के चौपाल पर बजता ट्रांजिस्टर, रेडियो आज भी प्रासंगिक और लोकप्रिय है।निश्चित रूप से भारत में रेडियो का सफर एक जादुई यात्रा की तरह रहा है। मद्रास के एक छोटे से क्लब से शुरू होकर आज यह करोड़ों दिलों की धड़कन बन चुका है।
भारत में रेडियो का इतिहास लगभग एक सदी पुराना है। इसकी शुरुआत (1923) में हुई।भारत में रेडियो प्रसारण की शुरुआत जून 1923 में ‘रेडियो क्लब ऑफ बॉम्बे’ द्वारा की गई थी। विश्व रेडियो दिवस (13 फरवरी 2026) के अवसर पर, भारत में रेडियो न केवल सूचना का एक माध्यम बना हुआ है, बल्कि यह कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ मिलकर एक नए डिजिटल अवतार में प्रवेश कर रहा है।इस वर्ष की थीम “रेडियो और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक उपकरण है, आवाज नहीं” रखी गई है। भारत के लिए यह दिन इसलिए खास है क्योंकि देश में रेडियो अब पारंपरिक ट्रांजिस्टर से निकलकर स्मार्टफोन्स, स्मार्ट स्पीकर्स और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स तक अपनी पैठ बना चुका है।
भारत में रेडियो प्रसारण अब केवल एनालॉग (एएम/एफएम) तक सीमित नहीं है। वर्ष 2026 में भारत रेडियो के एक बड़े परिवर्तन का गवाह बन रहा है। दिल्ली में आयोजित ‘द रेडियो फेस्टिवल’ 2026 में इस बार “एआई और स्थानीय भाषाएं” पर जोर दिया गया। भारत जैसे बहुभाषी देश में एआई का उपयोग क्षेत्रीय बोलियों में सामग्री तैयार करने और अनुवाद के लिए किया जा रहा है।
भारत सरकार और प्रसार भारती अब एफएम के पूर्ण डिजिटलीकरण की ओर बढ़ रहे हैं, जिससे न केवल ध्वनि की गुणवत्ता बेहतर होगी, बल्कि एक ही फ्रीक्वेंसी पर कई चैनल उपलब्ध हो सकेंगे। भारत में रेडियो की प्रासंगिकता को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यक्रम ‘मन की बात’ ने एक नई ऊँचाई दी है।यह कार्यक्रम रेडियो को “अंतिम मील तक कनेक्टिविटी” का सबसे सशक्त माध्यम साबित करता है।
आज भारत में 839 एफएम स्टेशन और 530 से अधिक सामुदायिक रेडियो सक्रिय हैं, जो आपदा प्रबंधन, कृषि और शिक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।भारत के ग्रामीण इलाकों में सामुदायिक रेडियो सामाजिक बदलाव का सबसे बड़ा हथियार बना हुआ है। ये स्टेशन स्थानीय लोक कलाओं को संरक्षित करने और स्वास्थ्य-शिक्षा जैसे मुद्दों पर अपनी बोली में बात करने का अवसर देते हैं।
स्मार्टफोन और इंटरनेट के युग में भी रेडियो भारत का सबसे भरोसेमंद साथी बना हुआ है। चाहे वह कार में बजता एफएम हो या गाँव के चौपाल पर बजता ट्रांजिस्टर, रेडियो आज भी ‘सूचना के लोकतंत्र’ का सबसे बड़ा प्रहरी है।”रेडियो खत्म नहीं हो रहा, बल्कि यह पॉडकास्ट और डिजिटल स्ट्रीमिंग के साथ मिलकर रेडियो 2.0 बन रहा है।
सर्वप्रथम सरकार ने 1930 में प्रसारण को अपने हाथ में लिया और ‘भारतीय राज्य प्रसारण सेवा’की स्थापना की।आकाशवाणी (1936-1957) 8 जून 1936 को इसका नाम बदलकर ‘ऑल इंडिया रेडियो’ कर दिया गया। 1957 में इसे आधिकारिक तौर पर ‘आकाशवाणी’ नाम दिया गया।विविध भारती (1957): फिल्मी गानों और मनोरंजन के लिए ‘विविध भारती’ सेवा शुरू की गई, जो आज भी भारत की सबसे लोकप्रिय रेडियो सेवाओं में से एक है।एफएम का उदय (1993): भारत में निजी रेडियो चैनलों के आने से एफएम की क्रांति हुई, जिसने रेडियो को युवाओं और शहरी आबादी के बीच फिर से लोकप्रिय बना दिया। फिर सामुदायिक रेडियो ने क्रांति ला दिया।सामुदायिक रेडियो का उद्देश्य “जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा” संचार है।
भारत में 2004 में ‘अन्ना एफएम’ पहला सामुदायिक रेडियो स्टेशन बना था। फिर तो संगम रेडियो तेलंगाना, यह दलित महिलाओं द्वारा संचालित, कृषि और अधिकारों पर केंद्रित है।रेडियो बुंदेलखंड,मध्य प्रदेश ।ये बुंदेली भाषा में जल संरक्षण और स्थानीय संस्कृति का प्रचार कार्य करती है। कुमाऊं वाणी, उत्तराखंड जो हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण और आपदा प्रबंधन की जानकारी देते है। रेडियो मेवात हरियाणा, यह शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और स्वास्थ्य जागरूकता मैं महती कार्य करता है। रेडियो मधुबन, राजस्थान जो आध्यात्मिक विकास और मूल्य-आधारित शिक्षा का प्रचार प्रसार करती है।कुल मिलाकर वर्तमान में भारत में 500 से अधिक सामुदायिक रेडियो स्टेशन काम कर रहे हैं। सरकार का लक्ष्य आने वाले समय में हर जिले में कम से कम एक सामुदायिक रेडियो स्थापित करने का है।
छत्तीसगढ़ के प्रमुख शहर बिलासपुर में भी आकाशवाणी का एक महत्वपूर्ण केंद्र स्थित है, जो दशकों से न्यायधानी (बिलासपुर) और आसपास के क्षेत्रों के लिए सूचना और मनोरंजन का मुख्य स्रोत रहा है।यह केंद्र अपनी सांस्कृतिक विरासत और क्षेत्रीय बोलियों (जैसे छत्तीसगढ़ी और बघेली) के संरक्षण के लिए जाना जाता है। आकाशवाणी बिलासपुर का मुख्य कार्यालय और स्टेशन सरकंडा क्षेत्र (नूतन कॉलोनी, इंदिरा विहार कॉलोनी के पास) में स्थित है।बिलासपुर केंद्र मुख्य रूप से मध्यम तरंग और स्थानीय एफएम आवृत्तियों पर प्रसारित होता है। यह केंद्र प्रतिदिन सुबह 5:00 बजे से रात 11:00 बजे तक सक्रिय रहता है। यहाँ से कृषि जगत, लोक संगीत, स्थानीय समाचार और बच्चों के कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं।इस केंद्र की रेटिंग है 4.3 (उपयोगकर्ताओं के अनुसार) प्रसारण की मुख्य भाषा है हिंदी और छत्तीसगढ़ी।
आकाशवाणी के अलावा, बिलासपुर में निजी एफएम चैनल भी काफी लोकप्रिय हैं, जो मनोरंजन और संगीत प्रदान करते हैं।94.3 माई एफएम यह बिलासपुर का एक प्रमुख निजी रेडियो स्टेशन है। विविध भारती रेडियो चैनल आकाशवाणी के माध्यम से विविध भारती की राष्ट्रीय सेवा भी यहाँ उपलब्ध है।बिलासपुर आकाशवाणी केंद्र ने छत्तीसगढ़ी लोक कलाकारों को एक बड़ा मंच दिया है। यहाँ के रिकॉर्डिंग स्टूडियो में स्थानीय लोकगीतों (जैसे पंडवानी, भरथरी और सुआ गीत) का एक समृद्ध संग्रह मौजूद है।
हवा के झोंकों पर सवार, यह अनकही एक कहानी है,
पुरानी यादों की महक, और नए दौर की रवानी है।
शहर की चकाचौंध हो या दूर गाँव की कोई पगडंडी,
हर कान तक पहुँचती, इसकी गूँज बड़ी ही रूहानी है।
एआई के इस युग में भी, इसका अपना ही एक ठाठ है,
रेडियो सिर्फ यंत्र नहीं, यह दिलों को जोड़ने वाला घाट है।।
