लड़ते रहे अभावों से

सुविधाओं में पले-बढ़े जो, संकट सम्मुख बिखर गये।
संसाधन समिधा पाकर क्या, कौशल उनके निखर गये।
बाधाओं की भट्टी से तप, निकले जो कुंदन बन कर,
लड़ते रहे अभावों से नित, पगचिह्न बना शिखर गये।।

अंधकार से लड़ने को, नित दीप जलाना पड़ता है।
रूठे स्वजन मनाने को, मन मीत मिलाना पड़ता है।
चाहते हैं जो ढहाना रूढ़ियों के वे खंडहर सभी,
जर्जर भवन गिराने को, तन भीत हिलाना पड़ता है।।

स्वाभिमानी जन जीता सदा, जागता पल-पल संभाला।
श्रम स्वेद सिंचित शुभता भरा, चाहता है हर निवाला।
साधना से सिद्धि होती, संघर्ष बिन मिलता नहीं कुछ,
बादलों से जूझकर रवि, बांटता है जग में उजाला।।

प्रमोद दीक्षित मलय शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)
प्रमोद दीक्षित मलय
शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)

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