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क्या भारतीय समाज में स्वीकार्य है ‘लिव-इन’?

भारत, जहाँ विवाह को केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं बल्कि दो परिवारों का ‘पवित्र बंधन’ और एक ‘धार्मिक संस्कार’ माना जाता है, वहाँ ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ (बिना विवाह साथ रहना) आज भी एक वैचारिक युद्ध का मैदान बना हुआ है। एक ओर सनातन परंपराओं की जड़ें हैं, तो दूसरी ओर आधुनिकता की उड़ान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता।

सनातन धर्म में विवाह को 16 संस्कारों में से एक महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है। यह केवल शारीरिक या कानूनी समझौता नहीं, बल्कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति का एक माध्यम है।पारंपरिक दृष्टिकोण के अनुसार, विवाह व्यक्ति को सामाजिक उत्तरदायित्व और अनुशासन सिखाता है।भारतीय संस्कारों में अग्नि और ईश्वरीय शक्तियों को साक्षी मानकर किए गए वादे रिश्ते को ‘पवित्रता’ और ‘मजबूती’ प्रदान करते हैं।सनातन परंपरा में परिवार को समाज की सबसे छोटी और सबसे महत्वपूर्ण इकाई माना जाता है, जिसे लिव-इन संबंधों में अक्सर गौण कर दिया जाता है।

पिछले कुछ वर्षों से महानगरों में लिव-इन रिलेशनशिप का चलन तेजी से बढ़ा है। जो भारत के संस्कारों और हिंदू विवाह के मान्यताओं को खंडित करता है, और कहीं ना कहीं भारतीय सनातन के स्थापित प्रतिमानों को चुनौती देता है। लेकिन युवा पीढ़ी इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क देती है। युवाओं का मानना है कि जीवनभर के बंधन में बंधने से पहले एक-दूसरे के स्वभाव और आदतों को समझना जरूरी है। अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त ‘जीवन जीने के अधिकार’ को आधार बनाकर इसे व्यक्तिगत चुनाव माना जाता है। विवाह टूटने की स्थिति में होने वाली लंबी कानूनी प्रक्रियाओं और सामाजिक बदनामी के डर से बचने के लिए इसे एक ‘ट्रायल’ के रूप में देखा जाता है।

भारतीय समाज में लिव-इन को लेकर आज भी गहरी असहमति है, जिसके पीछे कई कारण हैं। सामाजिक असुरक्षाः लिव-इन में अक्सर महिलाओं को वह सामाजिक सुरक्षा और सम्मान नहीं मिल पाता जो एक ‘पत्नी’ को प्राप्त होता है। बच्चों का भविष्यः सनातन धर्म में संतान का जन्म और उसका पालन-पोषण संस्कारों के बीच होता है। लिव-इन से पैदा होने वाले बच्चों के सामाजिक नाम और उनके अधिकारों पर आज भी प्रश्नचिह्न खड़े होते हैं। भावनात्मक अस्थिरताः विवाह में ‘प्रतिबद्धता’ अधिक होती है। लिव-इन में ‘आसान निकास’ का विकल्प होने के कारण रिश्तों में गंभीरता की कमी देखी जाती है, जो अक्सर अवसाद या अपराध (जैसे हालिया कुछ आपराधिक घटनाएं) का कारण बनती है।

भारतीय कानून (माननीय सर्वोच्च न्यायालय) ने लिव-इन रिलेशनशिप को अवैध नहीं माना है। घरेलू हिंसा अधिनियम और संपत्ति के अधिकारों में लिव-इन पार्टनर्स को कुछ सुरक्षाएं दी गई हैं। लेकिन, कानूनी रूप से सही होना और सामाजिक रूप से स्वीकार्य होना, भारत में दो अलग बातें हैं।

परिवर्तन प्रकृति का नियम है, लेकिन अपनी जड़ों को काटकर किया गया परिवर्तन अक्सर विनाशकारी होता है। भारतीय संस्कार हमें ‘त्याग और समर्पण’ सिखाते हैं, जबकि आधुनिक जीवनशैली ‘अधिकार और स्वतंत्रता’ पर केंद्रित है।लिव-इन रिलेशनशिप भारतीय परिप्रेक्ष्य में ‘सही’ है या ‘गलत’, यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम किसे प्राथमिकता देते हैं- क्षणिक सुख और सुविधा को या दीर्घकालिक सामाजिक स्थिरता और संस्कारों को। एक स्वस्थ समाज के लिए जरूरी है कि आधुनिकता के नाम पर हम उन मूल्यों को न खो दें जिन्होंने भारतीय सभ्यता को हजारों वर्षों से जीवित रखा है।

लिव-इन रिलेशनशिप पर भारतीय न्यायपालिका का दृष्टिकोण समय के साथ विकसित हुआ है।अदालतों ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक नैतिकता के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है। भारतीय न्यायालयों द्वारा दिए गए कुछ प्रमुख और ऐतिहासिक फैसले दिए गए हैं, जिन्होंने इस विषय की कानूनी दिशा तय कीः2013 इंद्रा सरमा बनाम वी.के.वी.सरमा प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत सुरक्षा और भरण-पोषण की हकदार है।

 वहीं 2015 के धन्नू लाल बनाम गणेशराम प्रकरण में कोर्ट ने फैसला सुनाया कि यदि कोई पुरुष और महिला लंबे समय तक साथ रहते हैं, तो कानून उन्हें पति-पत्नी के रूप में स्वीकार करेगा और उनकी संतान को वैध माना जाएगा। न्यायालयों ने लिव-इन में रहने वाले जोड़ों के लिए कुछ सुरक्षात्मक उपाय भी सुनिश्चित किए हैं: बच्चों की वैधताः लिव-इन संबंधों से पैदा हुए बच्चों को माता-पिता की संपत्ति में पूरा अधिकार है। कानून उन्हें ‘अवैध’ नहीं मानता। भरण-पोषण: यदि रिश्ता टूटता है, तो महिला सीआरपीसी की धारा 125 (अब नई संहिता के तहत) या घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत गुजारा भत्ता मांग सकती है। संपत्ति में अधिकारः केवल साथ रहने मात्र से महिला को पुरुष की पैतृक संपत्ति में अधिकार नहीं मिलता, लेकिन पुरुष द्वारा अर्जित संपत्ति और वसीयत के आधार पर दावे किए जा सकते हैं।

हाल ही में उत्तराखंड सरकार ने यूसीसी लागू कर लिव-इन रिलेशनशिप के लिए पंजीकरण  अनिवार्य कर दिया है। ऐसा न करने पर सजा का प्रावधान है। यह इस दिशा में एक बड़ा मोड़ है, जहाँ राज्य अब सुरक्षा के नाम पर निजी रिश्तों में पारदर्शिता चाहता है। हालांकि कानून लिव-इन को मान्यता देता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कई बार दोहराया है कि लिव-इन पार्टनर को ‘पत्नी’ का पूर्ण कानूनी दर्जा प्राप्त नहीं है, जब तक कि वे औपचारिक विवाह न कर लें।

स्पष्टता और पारदर्शिता किसी भी रिश्ते की शुरुआत ‘ट्रेंड’ को देखकर नहीं, बल्कि आपसी समझ से होनी चाहिए। यदि आप लिव-इन में रहने का विचार कर रहे हैं, तो अपने साथी के साथ भविष्य के लक्ष्यों, वित्तीय जिम्मेदारी और उम्मीदों पर खुलकर बात करें। अस्पष्टता बाद में मानसिक तनाव का कारण बनती है। एक जागरूक युवा के रूप में आपको देश के कानूनों का ज्ञान होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों को समझें ताकि आप और आपके साथी के अधिकारों की रक्षा हो सके। कानून का ज्ञान आपको असुरक्षा की भावना से बचाता है।अक्सर रिश्तों के शुरुआती उत्साह में युवा अपने करियर और व्यक्तिगत विकास को पीछे छोड़ देते हैं। याद रखें, आप पहले एक व्यक्ति हैं और फिर किसी के साथी। अपनी पढ़ाई, करियर और जुनून को प्राथमिकता दें। एक सफल और आत्मनिर्भर व्यक्ति ही एक स्वस्थ रिश्ता निभा सकता है। 

भारतीय संस्कार हमें ‘सम्मान’ और ‘संयम’ सिखाते हैं। भले ही आप एक आधुनिक जीवनशैली चुन रहे हों, लेकिन अपने साथी के प्रति वफादारी, सम्मान और गरिमा बनाए रखना अनिवार्य है। रिश्ते को केवल अपनी सुविधा का साधन न समझें, बल्कि उसे परिपक्वता से निभाएं।हो सकता है कि आपके माता-पिता या परिवार इस विचार से सहमत न हों। उनसे विद्रोह करने के बजाय, धैर्यपूर्वक संवाद करने का प्रयास करें। उन्हें अपनी स्थिति और सुरक्षा के प्रति आश्वस्त करें। परिवार का समर्थन जीवन की बड़ी चुनौतियों में ढाल का काम करता है।

रिश्ते का आधार प्रेम होना चाहिए, दबाव या असुरक्षा नहीं। यदि रिश्ता आपकी मानसिक शांति भंग कर रहा है या हिंसा की ओर बढ़ रहा है, तो साहस के साथ उससे बाहर निकलना ही सही निर्णय है। अपनी ‘सेल्फ-वर्थ’ (आत्म-मूल्य) को कभी कम न होने दें। वास्तविक स्वतंत्रता वह है जहाँ आप अपने निर्णयों की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार हों। रिश्तों को केवल शारीरिक आकर्षण के नजरिए से न देखें; उनमें भावनात्मक गहराई और एक-दूसरे के प्रति विकास की भावना तलाशें। आधुनिकता का अर्थ अंधानुकरण नहीं है। अपनी बुद्धि और विवेक का प्रयोग करें कि आपके लिए क्या सही है।

 लिव-इन हो या विवाह, किसी भी रिश्ते की सफलता उसकी नींव-अर्थात ‘विश्वास और सम्मान’- पर टिकी होती है। भारतीय युवा होने के नाते, आपमें वह क्षमता है कि आप अपनी संस्कृति के गौरव और आधुनिकता की प्रगतिशीलता के बीच एक सुंदर सेतु बना सकें। “रिश्ता वह है जो आपको एक बेहतर इंसान बनाए, न कि वह जो आपको आपकी पहचान भुला दे। आप केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि भारत का भविष्य हैं। आपका हर छोटा सकारात्मक कार्य – चाहे वह स्वच्छता हो, ईमानदारी से कर  भरना हो या किसी की मदद करना- देश को आगे बढ़ाता है।

दुनिया आप पर तब विश्वास करेगी जब आप स्वयं पर विश्वास करेंगे। अपनी क्षमताओं को पहचानें और अपनी विशिष्टता पर गर्व करें।”उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।” – स्वामी विवेकानंद। आपकी ऊर्जा और सही दिशा ही भारत को ‘विश्व गुरु’ के पद पर पुनः स्थापित करेगी। सदैव सकारात्मक रहें और बड़े सपने देखें !

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