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संस्कारों की धरोहर: बच्चों का नहीं, हमारी परवरिश का आईना

आज अक्सर सुनने को मिलता है “आजकल के बच्चों में संस्कार नहीं रहे।” यह वाक्य हम बड़े सहज भाव से कह देते हैं, मानो सारी जिम्मेदारी बच्चों की ही हो। किंतु यदि गंभीरता से विचार करें तो पाएँगे कि बच्चे तो कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं; उन्हें जिस सांचे में ढाल दिया जाए, वे वैसा ही रूप धारण कर लेते हैं। ऐसे में प्रश्न यह नहीं कि बच्चों में संस्कार क्यों नहीं हैं, बल्कि यह है कि हमने उन्हें क्या सिखाया और कैसे सिखाया?

संस्कार किसी पाठ्यपुस्तक का अध्याय नहीं होते, जिन्हें रटकर सीखा जा सके। वे परिवार के वातावरण से, माता-पिता के व्यवहार से और घर की परंपराओं से आत्मसात होते हैं। यदि घर में बड़ों का सम्मान होता है, सच्चाई को महत्व दिया जाता है और अनुशासन का पालन होता है, तो बच्चा स्वतः ही इन्हें अपने जीवन का हिस्सा बना लेता है। परंतु यदि घर में कटुता, असहिष्णुता, दिखावा और स्वार्थ का वातावरण हो, तो वही भावनाएँ बच्चों के व्यक्तित्व में उतर जाती हैं।

आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली ने परिवारों को समयहीन बना दिया है। माता-पिता अपनी जिम्मेदारियों में इतने व्यस्त हो गए हैं कि बच्चों के साथ संवाद के लिए समय नहीं निकाल पाते। परिणामस्वरूप बच्चे संस्कारों की शिक्षा घर से कम और बाहरी दुनिया से अधिक ग्रहण कर रहे हैं। मोबाइल, इंटरनेट और सामाजिक माध्यमों का प्रभाव इतना प्रबल है कि वे बच्चों के विचारों और व्यवहार को प्रभावित कर रहे हैं। यदि उन पर उचित निगरानी और मार्गदर्शन न हो, तो वे भ्रमित भी हो सकते हैं।

दूसरा बड़ा कारण यह है कि हम स्वयं अपने आचरण में वह अनुशासन और मर्यादा नहीं रखते, जिसकी अपेक्षा बच्चों से करते हैं। हम बच्चों से सत्य बोलने को कहते हैं, परंतु स्वयं छोटी-छोटी बातों में असत्य का सहारा लेते हैं। हम उनसे बड़ों का सम्मान करने की अपेक्षा करते हैं, परंतु स्वयं अपने बुजुर्गों की उपेक्षा कर बैठते हैं। ऐसे में बच्चे दोहरे मानदंडों को देखकर भ्रमित हो जाते हैं और उनके भीतर विरोधाभास जन्म लेने लगता है।

संस्कारों का ह्रास केवल पारिवारिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक चिंता का विषय है। जब एक पीढ़ी मूल्यों से दूर हो जाती है, तो उसका प्रभाव समाज के प्रत्येक क्षेत्र पर पड़ता है। इसलिए आवश्यक है कि हम आत्ममंथन करें और बच्चों को दोष देने के स्थान पर अपनी भूमिका को समझें।  हमें चाहिए कि हम बच्चों के साथ समय बिताएँ, उनसे संवाद करें, उनकी जिज्ञासाओं को शांत करें और अपने आचरण से उन्हें सही-गलत का भेद सिखाएँ। त्योहारों, पारिवारिक परंपराओं और सामाजिक दायित्वों में उनकी सहभागिता सुनिश्चित करें। उन्हें केवल सफलता की दौड़ में आगे बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उन्हें संवेदनशील, सहृदय और नैतिक बनाना भी उतना ही आवश्यक है।

बच्चे हमारे भविष्य की नींव हैं। यदि नींव मजबूत होगी तो समाज भी सुदृढ़ होगा। अतः आइए, हम स्वयं को आदर्श बनाकर बच्चों को संस्कारों की अमूल्य धरोहर सौंपें। याद रखिए बच्चे वही बनते हैं, जो वे देखते हैं। यदि हम उन्हें सांचे में ढालने की जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाएँगे, तो आने वाली पीढ़ी निश्चित ही मूल्यों और मर्यादाओं से परिपूर्ण होगी।

डा. पंकज भारद्वाज 
डा. पंकज भारद्वाज 
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