
वरिष्ठ पत्रकार अमलेश राजू की पुस्तक “नीतीश कुमार का मरीन ड्राइव” बिहार के समकालीन राजनीतिक और विकासात्मक इतिहास को एक प्रतीकात्मक परियोजना के माध्यम से समझने का प्रयास है। यह कृति परंपरागत जीवनी नहीं है, बल्कि शासन, नीतियों और सार्वजनिक प्रभावों का एक विश्लेषणात्मक दस्तावेज है, जिसमें पटना के जेपी गंगापथ—लोकप्रिय नाम “मरीन ड्राइव”—को केंद्र में रखकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दो दशकों के शासनकाल की दिशा और दशा को परखा गया है।
लेखक स्वयं लंबे समय से सक्रिय पत्रकार रहे हैं और बिहार की राजनीति तथा प्रशासनिक संरचना को करीब से देखने का अनुभव रखते हैं। यही कारण है कि पुस्तक में घटनाओं और निर्णयों का उल्लेख मात्र नहीं, बल्कि उनके सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का विश्लेषण भी मिलता है। पुस्तक की प्रेरणा उस सार्वजनिक विमर्श से जुड़ी है जिसमें बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान विकास का प्रश्न केंद्रीय विषय बनकर उभरा। लेखक के मन में यह प्रश्न उठा कि यदि विकास को किसी ठोस उदाहरण से समझाया जाए तो वह क्या होगा? इसी प्रश्न का उत्तर उन्हें गंगा तट पर निर्मित मरीन ड्राइव के रूप में दिखाई देता है।
जेपी गंगापथ को पुस्तक में केवल एक सड़क परियोजना नहीं, बल्कि मानसिकता के परिवर्तन का प्रतीक बताया गया है। लेखक का तर्क है कि जिस राज्य को कभी “बीमारू” कहा जाता था, जहाँ शाम ढलते ही सन्नाटा और असुरक्षा का भाव व्याप्त हो जाता था, वहाँ आज गंगा किनारे देर रात तक परिवारों, युवाओं और पर्यटकों की चहल-पहल दिखाई देती है। यह परिवर्तन केवल भौतिक ढांचे का नहीं, बल्कि सामाजिक आत्मविश्वास का भी संकेतक है। पुस्तक में विस्तार से बताया गया है कि किस प्रकार दीघा से गांधी मैदान और आगे गायघाट तक विस्तारित इस मार्ग ने राजधानी के यातायात तंत्र को नया आयाम दिया है।

लेखक विशेष रूप से इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि मरीन ड्राइव ने स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच को आसान बनाया है। पहले जाम में फँसी एंबुलेंसों की समस्या आम थी, लेकिन अब प्रमुख अस्पतालों तक पहुँचने में समय की बचत हो रही है। इसी प्रकार पर्यटन और धार्मिक स्थलों की कनेक्टिविटी में भी सुधार का उल्लेख मिलता है। पटना साहिब, गोलघर, गांधी मैदान और अन्य ऐतिहासिक स्थलों तक पहुँच सुगम होने से स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति मिली है। पुस्तक यह स्थापित करने का प्रयास करती है कि आधारभूत संरचना में निवेश दीर्घकालिक सामाजिक परिवर्तन का आधार बन सकता है।
राजनीतिक दृष्टि से पुस्तक नीतीश कुमार के उतार-चढ़ाव भरे सफर को भी समेटती है। तीन दशकों से अधिक समय तक बिहार की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने वाले नेता के रूप में उनका चित्रण किया गया है। समता पार्टी के गठन से लेकर एनडीए और महागठबंधन के बीच बदलते समीकरणों तक की यात्रा को लेखक ने तथ्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। यह भी उल्लेखनीय है कि पुस्तक में व्यक्तिगत जीवन के बजाय सार्वजनिक कार्यों पर अधिक बल दिया गया है। लेखक स्वयं स्वीकार करते हैं कि उन्होंने जीवनीपरक विवरणों की बजाय नीतिगत निर्णयों और प्रशासनिक दृष्टिकोण को केंद्र में रखा है।
पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष महिला सशक्तिकरण पर केंद्रित वर्णन है। गंगा किनारे छोटे व्यवसाय चलाती महिलाओं, सुरक्षित वातावरण में सैर करती युवतियों और परिवारों की उपस्थिति को लेखक सामाजिक परिवर्तन के संकेतक के रूप में देखते हैं। उनके अनुसार विकास तभी सार्थक है जब वह समाज के वंचित वर्गों को अवसर और सुरक्षा का भाव प्रदान करे। मरीन ड्राइव के संदर्भ में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी को इसी दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है।
आर्थिक प्रभावों का उल्लेख करते हुए पुस्तक बताती है कि परियोजना के आसपास की भूमि और संपत्तियों के मूल्य में वृद्धि हुई है। व्यापारिक गतिविधियों को नया विस्तार मिला है और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़े हैं। हालांकि इस पक्ष पर लेखक सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हैं, परंतु भूमि मूल्य वृद्धि के सामाजिक प्रभावों—जैसे विस्थापन या असमानता—पर अपेक्षाकृत कम चर्चा मिलती है। यह वह बिंदु है जहाँ पाठक अधिक गहन विश्लेषण की अपेक्षा कर सकते हैं।
लेखन शैली पत्रकारिता की सादगी और स्पष्टता लिए हुए है। घटनाओं का वर्णन सीधा और प्रवाहपूर्ण है, जिससे पुस्तक सामान्य पाठकों के लिए भी सहज पठनीय बन जाती है। साथ ही, राजनीतिक संदर्भों का समावेश इसे शोधार्थियों और विश्लेषकों के लिए भी उपयोगी बनाता है। लेखक ने विभिन्न बुद्धिजीवियों और समकालीनों के विचारों को भी शामिल किया है, जिससे विमर्श का दायरा व्यापक होता है।
फिर भी आलोचनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो पुस्तक में विपक्षी दृष्टिकोण या विकास की सीमाओं पर अपेक्षाकृत कम स्थान दिया गया है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विकास परियोजनाओं का मूल्यांकन बहुआयामी होना चाहिए—आर्थिक, सामाजिक, पर्यावरणीय और राजनीतिक सभी पहलुओं से। मरीन ड्राइव की पर्यावरणीय चुनौतियों या संभावित नीतिगत विवादों पर यदि अधिक विश्लेषण होता तो पुस्तक और संतुलित प्रतीत होती।
इसके बावजूद, यह कृति बिहार के हालिया इतिहास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। यह बताती है कि किस प्रकार एक प्रतीकात्मक परियोजना व्यापक राजनीतिक विमर्श का आधार बन सकती है। नीतीश कुमार की राजनीतिक स्थिरता, बार-बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने की उपलब्धि और प्रशासनिक निरंतरता को लेखक विकास की निरंतरता से जोड़ते हैं। यह तर्क दिया गया है कि दीर्घकालिक नेतृत्व से योजनाओं को पूर्णता तक पहुँचाने में सहूलियत मिलती है।
डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित पुस्तक “नीतीश कुमार का मरीन ड्राइव” विकास, राजनीति और सामाजिक परिवर्तन के अंतर्संबंधों को समझने का प्रयास है। यह पुस्तक बिहार के बदलते परिदृश्य को एक सड़क परियोजना के प्रतीक के माध्यम से रेखांकित करती है और यह संदेश देती है कि बुनियादी ढांचे में सुधार केवल यातायात सुगमता तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह सामाजिक आत्मविश्वास और आर्थिक संभावनाओं को भी प्रभावित करता है।
यह पुस्तक न तो अंध-प्रशंसा है और न ही तीखी आलोचना, बल्कि एक दृष्टिकोण है—जिससे सहमति या असहमति दोनों संभव हैं। बिहार के विकास मॉडल पर जारी बहस के बीच यह कृति एक प्रासंगिक संदर्भ प्रदान करती है और यह प्रश्न छोड़ती है कि क्या एक “मरीन ड्राइव” किसी राज्य की समग्र प्रगति का पर्याप्त मानदंड हो सकता है, या यह केवल उस व्यापक परिवर्तन की झलक है जिसकी प्रक्रिया अभी जारी है।
पुस्तक: नीतीश कुमार का मरीन ड्राइव
लेखक: अमलेश राजू
प्रकाशक: डायमंड पॉकेट बुक्स

