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बिलासपुर में निजी स्कूलों की बढ़ती फीस और “मॉल संस्कृति”

बिलासपुर। शहर में निजी स्कूलों की बढ़ती फीस और उनसे जुड़े अतिरिक्त खर्चों को लेकर अभिभावकों में असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है। कई अभिभावकों का आरोप है कि अब स्कूल शिक्षा का केंद्र न रहकर “मॉल” की तरह कार्य करने लगे हैं, जहाँ किताबों से लेकर यूनिफॉर्म, जूते-मोजे और यहां तक कि कोचिंग तक, सब कुछ ऊंचे दामों पर उपलब्ध कराया जा रहा है।

बढ़ती फीस से परेशान अभिभावक

बिलासपुर के निजी स्कूलों में वार्षिक फीस ₹30 हजार से लेकर ₹2 लाख तक पहुंच चुकी है। इसके अलावा बस शुल्क, वार्षिक गतिविधि शुल्क और अन्य मदों को जोड़ दिया जाए तो एक छात्र पर सालाना खर्च ₹1 से ₹3 लाख तक हो रहा है। मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए यह बोझ लगातार असहनीय होता जा रहा है।

शहर के एक अभिभावक ने बताया, “स्कूल में दाखिला लेने के बाद हमें किताबें और यूनिफॉर्म केवल स्कूल द्वारा तय दुकानों से ही खरीदनी पड़ती हैं, जहाँ कीमत बाजार से कई गुना अधिक होती है।”

“बंधी हुई खरीद” पर उठ रहे सवाल

अभिभावकों का आरोप है कि कई स्कूल अप्रत्यक्ष रूप से निर्धारित दुकानों से खरीदारी के लिए दबाव बनाते हैं। किताबों, कॉपियों और यूनिफॉर्म पर मनमाना मुनाफा वसूला जाता है। इससे शिक्षा का खर्च और अधिक बढ़ जाता है।

ट्यूशन और कोचिंग का बढ़ता चलन

शहर में निजी ट्यूशन और कोचिंग का दायरा भी तेजी से बढ़ा है। कई अभिभावकों का कहना है कि स्कूल में पढ़ाई पर्याप्त नहीं होने के कारण उन्हें अतिरिक्त कोचिंग का सहारा लेना पड़ता है, जिससे खर्च दोगुना हो जाता है।

सरकारी नियम और उनकी सीमाएं

छत्तीसगढ़ सरकार ने निजी स्कूलों की फीस नियंत्रित करने के लिए “शुल्क विनियमन अधिनियम 2020” लागू किया है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर इसका प्रभाव सीमित नजर आता है।वहीं, शिक्षा के अधिकार (आरटीई) के तहत गरीब वर्ग के बच्चों को 25% सीटें देने का प्रावधान है, लेकिन निजी स्कूलों का कहना है कि सरकार द्वारा दिया जाने वाला मुआवजा वास्तविक खर्च से काफी कम है।

शिक्षा विशेषज्ञों की राय

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि निजी स्कूलों का बढ़ता व्यवसायीकरण शिक्षा के मूल उद्देश्य को प्रभावित कर रहा है। उनका कहना है कि“विद्यालयों का लक्ष्य ज्ञान और संस्कार देना होना चाहिए, न कि लाभ कमाना।”

सामाजिक प्रभाव

# – मध्यम वर्ग पर आर्थिक दबाव बढ़ा।

#-शिक्षा में असमानता गहराई  सरकारी और निजी स्कूलों  के बीच खाई बढ़ी।

#- प्रशासन की भूमिका पर सवाल।

#- अभिभावकों ने जिला  प्रशासन से मांग की है कि फीस संरचना और  अतिरिक्त शुल्कों की पारदर्शी जांच की जाए तथा किताबों और यूनिफॉर्म की खुली बाजार से खरीद की अनुमति दी जाए।

कुलमिलाकर बिलासपुर में निजी स्कूलों की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहे सवाल केवल एक शहर की समस्या नहीं, बल्कि पूरे देश में शिक्षा के व्यवसायीकरण की ओर संकेत करते हैं। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो शिक्षा आम लोगों की पहुंच से और दूर होती जाएगी।

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