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हृदय में बस गई दतिया की वह सुबह

          दतिया नाम आते ही आंखों के सम्मुख सर्वप्रथम जो दृश्य उभरता है, वह है ऊर्जा, प्रेरणा एवं आध्यात्मिकता से ओतप्रोत स्थल श्री पीताम्बरा माई का शक्तिपीठ। ऐतिहासिक दृष्टि से भी दतिया एक समृद्ध नगर है जिसने इतिहास की धरोहर किले, महल, तालाब और गढ़ संभाल लेंगे हैं। इसलिए जब वहां से किसी साहित्यिक समारोह का आमंत्रण मिले, तो खुशी स्वाभाविक है। अगस्त में हिंदी महोत्सव समिति की ओर से 6 सितम्बर, 2026 को आयोज्य अखिल भारतीय साहित्यकार सम्मेलन में सहभागिता हेतु साहित्यकार जगत शर्मा जगत  एवं भानु शर्मा का आमंत्रण मिला। मन आनंदित हुआ कि मां पीताम्बरा के दर्शन-पूजन का सौभाग्य मिलेगा, ऐसा लगा कि मानो माई स्वयं ही बुला रही हों। शिक्षक साथी दुर्गेश्वर राय, गोरखपुर ने  अतर्रा से दतिया जाने-आने का ट्रेन टिकट आरक्षित कर दिया तो राह आसान हो गई।

समय सिर पर पांव धर भाग रहा था। 5 सितम्बर को बुंदेलखंड एक्सप्रेस से 12.30 पर प्रस्थान था, किंतु एक सप्ताह पूर्व से ही भयंकर बारिश से नदी-नाले उफनाए हुए थे। अतर्रा की गली-गली पानी में डूबी हुई थी। पावन तीर्थ चित्रकूट में तो मां मंदाकिनी का जल रामघाट की दूकानों के ऊपर से बहता हुआ सड़क तक पहुंच गया था, जिस पर नावें चल रही थीं। 5 सितम्बर को दिन में बारिश कम हुई थी। मैं रात 11.20 पर घर से निकला। रात को रिक्शा मिलता नहीं, पैदल ही स्टेशन जाना था। आसमान से पानी फुहारे बन बरस रहा था। बीस कदम ही चला तो लगा कि भींग जाऊंगा। बैग से तौलिया निकाल सिर पर ओढ़ लिया तो बचाव हो गया। घर पर प्रतिदिन भोजन करने वाले लाली और उसके बच्चे भैरू, कालू, चुन्नू मिल गये। मुझे पहचान आगे-पीछे उछलते-कूदते चलने लगे। मना किया तो चुन्नू और कालू तो रुक गये किंतु लाली और भैरू लगातार पीछा करते रहे, जैसे मुझे सुरक्षित पहुंचाना चाह रहे हों। मुझे डर था कि  सड़क पर कहीं कुत्तों का झुंड मिल गया तो मुश्किल होगी। तब बहुत डांटकर भगाया तब लौट गये। मैं बहुत दूर तक पीछे पलट कर देखता रहा कि कहीं दौड़कर आ न जायें।     

स्टेशन पहुंचने तक तौलिया तो पूरा भींग गया पर उसने मुझे बचा लिया। प्लेटफार्म एक पर 10 मिनट विलम्ब से ट्रेन आई। किंतु इसी बीच इतनी घनघोर बारिश शुरू हुई कि चार कदम चलने पर ही आदमी तर हो जाये। एस-4 में 40 नम्बर अपर साइड की सीट थी। टीन शेड के नीचे एस-3 कोच लगा, उसी से चढ़कर मैं अपनी बर्थ पर पहुंच लेट गया।‌ कोच पर सन्नाटा पसरा था। जल्दी ही  आंख लग गई। चाय-चाय की आवाज से झांसी जंक्शन पर आंख खुली। आगे दतिया ही था तो सामान समेट बैठ गया। दतिया स्टेशन बिलकुल खुला  है, ठंढी हवा बह रही थी। ट्रेन से उतर हाथ-पैर सीधे किए। बाहर रिक्शा कर होटल ब्लू स्टार पहुंच गया। अपने लिए निर्धारित कक्ष पर पहुंचा तो दिल्ली से पधारे रचनाकार साथी अभिषेक मिश्र मिले, जो कम्बल ताने सो रहे थे। थोडी ही देर में प्रतापगढ़ से भोपाल प्रसाद वर्मा भी सपत्नीक पहुंच गये, वह मुझे पूर्व से जानते थे। स्नान कर मां पीताम्बरा के दर्शन की योजना बनी। माई के द्वार पर पहुंच मोबाइल फोन जमा कर प्रसाद और पुष्प मालाएं लिया। शनिवार को दर्शनार्थियों की संख्या अत्यधिक होती है, किंतु रविवार होने से मंदिर के प्रांगण में दर्शनार्थियों की अधिक भीड़ न थी, हम लोग पंक्ति में लग गये और थोड़ी ही देर में मां के सम्मुख थे। आकर्षक श्वेत संगमरमर मूरत की छवि उर में अंकित हो गई। दर्शन कर श्रद्धा से शीश झुकाया। स्वयं में ऊर्जा की लहर दौड़ती अनुभव हुई, लगा यह पल यहीं ठहर जाए। आगे मां धूमावती के मंदिर पहुंचे, कपाट बंद मिले। वहीं थाल में रखा प्रसाद स्वरूप बेसन के सेव लिया। फिर ध्यान कक्ष, यज्ञ मंडप, सरोवर आदि घूमकर हृदय में दतिया की मनोहारी सुबह बसाए बाहर निकल मोबाइल उठाया।‌ चौक पर स्थापित राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त की प्रतिमा पर भाव पुष्पांजलि अर्पित कर फोटो लिए गये।  आगे बढ़े तो एक दूकान पर बहुत भीड़ दिखी, ऐसा लगा कि मानो पूरा शहर उमड़ आया हो। पता चला कि कचौड़ी-पूड़ी की मशहूर दुकान है। बीस रुपए में एक दोना में दो कचौड़ी-सब्जी। सभी ने एक-एक दोना लिया। सब्जी बहुत तीखी थी, मेरा तो पेट जलने लगा। वहां से चले तो रास्ते में हनुमान जी का दिव्य मंदिर दिखा। मैं, भोपाल जी और उनकी धर्मपत्नी निशा कटियार ने हनुमान जी का दर्शन किया और रिक्शा कर होटल पहुंच कमरे में विश्राम किया। कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र 9 बजे के पूर्व जलपान में साहित्यकारों के साथ पोहा, समोसा और चाय का आनंद लिया।

भानु शर्मा के अनुरोध पर मैंने पंजीकरण और सामग्री वितरण की जिम्मेदारी संभाल ली। कार्यक्रम हेतु सभागार में  मंच के दायें ओर मेज पर  मां सरस्वती की प्रतिमा और सद्ग्रंथ सजे थे। दीप प्रज्ज्वलित कर परिचय सत्र आरंभ हुआ तो पता चला कि 14 राज्यों से साहित्यकार पधारे हैं। भोजन के पहले सत्र का मुख्य विषय ‘साहित्य, संस्कार, संस्कृति, संयम और जेन जी’ पर केंद्रित था।‌ मुझे इस चर्चा सत्र की अध्यक्षता करने का सौभाग्य मिला, साथ में थे ‘धुरंधर’ फिल्म के अभिनेता संजय मेहता जी, गीत गागर पत्रिका के संपादक दिनेश प्रभात जी, बाल साहित्य शोध संस्थान की डॉ. मीनू पांडेय और कुछ अन्य साथी। मैंने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि अवांछनीय तत्वों को जीवन से बाहर करना संस्कार है। भाषा, साहित्य, रीति-रिवाज, खान-पान, पहनावा, प्रकृति आदि के मेल से संस्कृति रूप ग्रहण करती है। जेन जी हर युग और पीढ़ी में होते हैं, भले ही उनके नाम अलग हों। खुदीराम बोस, भगत सिंह, बिस्मिल, आजाद आदि क्रांतिकारी, बाजीराव पेशवा, आचार्य आदि शंकराचार्य, अष्टावक्र, नचिकेता, स्वामी विवेकानंद आदि युवा समकालीन चुनौतियों से जूझते हुए समाधान दिए, वे अपने युग के जेन जी थे। सत्र पश्चात् भोजन में पूड़ी, रोटी, पुलाव, दाल, सब्जी, सलाद, रायता, रसगुल्ला आदि खा-पीकर तृप्त हुए और सम्मान सत्र हेतु सभागार में उपस्थित हुए, जहां सभी साहित्यकारों को मुख्य अतिथि संजय मेहता जी द्वारा शॉल ओढ़ाकर सम्मान पत्र भेंट कर सम्मानित किया गया।  सायंकाल कवि सम्मेलन में काव्य सरिता में अवगाहन करते हुए रात्रि भोजन लेकर 10.30 बजे अपनी ट्रेन पकड़ी और मध्य रात्रि 3 बजे घर पहुंच स्नान कर सो गया।

इस एक दिन की छोटी सी यात्रा ने सिखा दिया कि आपाधापी के दौर में शांतिमय आनंदपूर्वक जीवन यापन के लिए मित्रों से मिलना-जुलना, मन की बातें साझा करना आवश्यक है और आध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण-पर्यटन भी, ताकि अपनी संस्कृति, सभ्यता एवं लोक को समझने का अवसर मिलता रहे, जिनसे हम सतत समृद्ध होते रहते हैं।

प्रमोद दीक्षित मलय शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)
प्रमोद दीक्षित मलय
शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)

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