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सुभाष चंद्र बोस की सशस्त्र रणनीति; यदि परिस्थितियां साथ देतीं तो 1947 से पहले मिल सकती थी आजादी

21 अक्टूबर : आजाद हिंद सरकार स्थापना दिवस

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अनेक धाराओं, विचारों और संघर्ष-पद्धतियों का इतिहास है। महात्मा गांधी के नेतृत्व में अहिंसक जनआंदोलन ने जहां ब्रिटिश शासन की नींव को व्यापक जनप्रतिरोध से हिलाया, वहीं नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से अंग्रेजीय सत्ता को भारत से बाहर करने का एक वैकल्पिक मार्ग प्रस्तुत किया। इसी संघर्ष की राजनीतिक परिणति के रूप में 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में आजाद हिंद की अस्थायी सरकार अर्थात ‘प्रोविजनल गवर्नमेंट ऑफ फ्री इंडिया’ की स्थापना हुई। यह दिन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण है।

 सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक (तत्कालीन बंगाल प्रेसीडेंसी) में हुआ था। उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद इंग्लैंड में भारतीय सिविल सेवा (ICS) की परीक्षा उत्तीर्ण की, लेकिन ब्रिटिश शासन की नौकरी को स्वीकार करने के बजाय देश की स्वतंत्रता को अपना जीवन-लक्ष्य बनाया और 1921 में इस्तीफा दे दिया। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में तेजी से उभरे और 1938 में हरिपुरा तथा 1939 में त्रिपुरी अधिवेशन में कांग्रेस अध्यक्ष निर्वाचित हुए। कांग्रेस के भीतर स्वतंत्रता प्राप्ति के उपायों और भविष्य की राजनीतिक दिशा को लेकर बोस के विचार अधिक उग्र और निर्णायक थे। 1939 में कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटने के बाद उन्होंने फॉरवर्ड ब्लॉक का गठन किया। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार और नजरबंद किया। जनवरी 1941 में वे नजरबंदी से निकलकर गुप्त रूप से भारत से बाहर पहुंचे और अंततः जर्मनी गए। बाद में जर्मन पनडुब्बी से हिंद महासागर की जोखिमपूर्ण यात्रा करते हुए वे जापानी क्षेत्र में पहुंचे और 1943 में दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व संभाला।

आजाद हिंद फौज की पृष्ठभूमि….यह तथ्य विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि आजाद हिंद फौज का प्रारंभिक गठन सुभाष चंद्र बोस के आने से पहले हो चुका था। फरवरी 1942 में सिंगापुर के पतन के बाद बड़ी संख्या में भारतीय सैनिक जापानियों के युद्धबंदी बने। इन्हीं भारतीय युद्धबंदियों में से कैप्टन मोहन सिंह के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) के गठन की प्रक्रिया शुरू हुई। रास बिहारी बोस ने भी दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को संगठित करने और इंडियन इंडिपेंडेंस लीग को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि जापानी सैन्य नेतृत्व और मोहन सिंह के बीच मतभेदों के कारण पहली INA व्यवस्था 1942 के अंत तक संकट में पड़ गई। ऐसे समय में सुभाष चंद्र बोस का दक्षिण-पूर्व एशिया पहुंचना निर्णायक साबित हुआ। उन्होंने बिखरी हुई सैन्य शक्ति को नया नेतृत्व, राजनीतिक उद्देश्य और राष्ट्रीय प्रतीक दिए। उनके नेतृत्व में INA को व्यापक रूप से आजाद हिंद फौज के नाम से पहचान मिली। नेताजी का विश्वास था कि ब्रिटेन के विरुद्ध चल रहे द्वितीय विश्वयुद्ध की परिस्थितियों का लाभ उठाकर भारत की स्वतंत्रता के लिए निर्णायक सैन्य संघर्ष किया जा सकता है। उनका प्रसिद्ध आह्वान- “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा”- भारतीयों में असाधारण उत्साह पैदा करने वाला संदेश बन गया।

21 अक्टूबर 1943 को बनी आजाद हिंद सरकार। 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर के कैथे भवन में सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद की अस्थायी सरकार की स्थापना की घोषणा की। बोस स्वयं इस सरकार के राष्ट्राध्यक्ष, प्रधानमंत्री तथा युद्ध और विदेश मामलों के प्रमुख बने। इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन को हटाकर स्वतंत्र भारत में राष्ट्रीय सरकार की स्थापना करना था। इस सरकार को उस समय जापान सहित धुरी राष्ट्रों से जुड़े कई देशों ने मान्यता दी। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार इसे नौ सरकारों ने मान्यता दी थी। यह मान्यता व्यावहारिक रूप से सीमित थी, क्योंकि उस समय भारत का अधिकांश भूभाग ब्रिटिश शासन के नियंत्रण में था, फिर भी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के लिए यह एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक और राजनीतिक उपलब्धि थी। आजाद हिंद सरकार केवल प्रतीकात्मक घोषणा तक सीमित नहीं थी। उसके पास प्रशासनिक विभाग, मुद्रा, डाक टिकट और सैन्य संगठन जैसी संस्थागत व्यवस्थाओं की परिकल्पना थी। दिसंबर 1943 में नेताजी ने अंडमान और निकोबार द्वीपों का दौरा किया और उन्हें क्रमशः ‘शहीद’ तथा ‘स्वराज’ द्वीप नाम दिया।

महिलाओं की भी थी निर्णायक भागीदारी…सुभाष चंद्र बोस का राष्ट्रवाद महिलाओं की भागीदारी के बिना अधूरा था। आजाद हिंद फौज में रानी झांसी रेजिमेंट का गठन किया गया, जिसका नेतृत्व कैप्टन लक्ष्मी सहगल ने किया। इस महिला सैन्य इकाई ने यह संदेश दिया कि स्वतंत्रता का संघर्ष केवल पुरुषों का दायित्व नहीं, बल्कि भारतीय महिलाओं की भी समान भागीदारी का अभियान है। नेताजी ने सेना को केवल हथियारों से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय भावना से भी जोड़ा। ‘जय हिंद’ जैसे अभिवादन और राष्ट्रीय एकता, अनुशासन तथा बलिदान पर उनका जोर आज भी भारतीय राष्ट्रचेतना का हिस्सा है।

भारत की धरती पर पहुंची आजाद हिंद फौज….1944 में आजाद हिंद फौज ने जापानी सेना के साथ मिलकर भारत की उत्तर-पूर्वी सीमा की ओर सैन्य अभियान चलाया। मणिपुर के मोइरांग में 14 अप्रैल 1944 को आजाद हिंद फौज का तिरंगा फहराया गया, जो उसके भारत की धरती पर सैन्य अभियान का ऐतिहासिक प्रतीक बना। लेकिन युद्ध की परिस्थितियां तेजी से बदल रही थीं। जापानी सेना को पीछे हटना पड़ा। रसद, भोजन, हथियार और चिकित्सा सुविधाओं की भारी कमी ने INA के सैनिकों की क्षमता को प्रभावित किया। इम्फाल और कोहिमा के मोर्चों पर जापानी-INA अभियान निर्णायक सफलता हासिल नहीं कर सका और अंततः पीछे हटना पड़ा।

क्या 1947 से पहले मिल सकती थी आजादी? यह प्रश्न आज भी इतिहास के गंभीर विमर्श का विषय है कि यदि द्वितीय विश्वयुद्ध की परिस्थितियां जापान और INA के पक्ष में रहतीं, तो क्या भारत को 1947 से पहले स्वतंत्रता मिल सकती थी? इसका निश्चित उत्तर इतिहास नहीं देता। इसलिए यह कहना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा कि नेताजी की योजना के कारण निश्चित रूप से 1947 से पहले आजादी मिल जाती। लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि बोस ने ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध स्वतंत्रता संघर्ष का एक ऐसा सैन्य और अंतरराष्ट्रीय विकल्प प्रस्तुत किया, जिसने ब्रिटिश शासन को गंभीर चुनौती दी। INA के सैनिकों पर चले लाल किला मुकदमों ने देश में जबरदस्त जनभावना पैदा की। शाहनवाज खान, प्रेम कुमार सहगल और गुरबख्श सिंह ढिल्लों जैसे अधिकारियों के मुकदमों ने भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों को एकजुट किया। इन मुकदमों के प्रति देशव्यापी समर्थन ने यह स्पष्ट कर दिया कि आजाद हिंद फौज की कहानी केवल युद्ध के मैदान तक सीमित नहीं रही थी। इतिहासकारों के बीच यह भी चर्चा रही है कि INA के प्रभाव और 1945 के बाद भारतीय सशस्त्र बलों में पैदा हुए राजनीतिक-सामाजिक मनोविज्ञान ने ब्रिटिश शासन की भविष्य की स्थिरता को प्रभावित किया। इसलिए स्वतंत्रता की अंतिम परिणति को केवल एक व्यक्ति या एक आंदोलन का परिणाम मानना इतिहास को अत्यधिक सरल बना देना होगा। भारत की आजादी अनेक दशकों के जनसंघर्ष, क्रांतिकारी गतिविधियों, राजनीतिक आंदोलनों, सैनिक असंतोष और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के सम्मिलित प्रभाव का परिणाम थी।

       नेताजी की मृत्यु आज भी इतिहास का संवेदनशील अध्याय रहा है। अगस्त 1945 में जापान के आत्मसमर्पण के बाद नेताजी के विमान दुर्घटना में मारे जाने की खबर सामने आई। 18 अगस्त 1945 को ताइहोकू (वर्तमान ताइपेई) में विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु होने की आधिकारिक जांचों में पुष्टि की गई, लेकिन उनकी मृत्यु को लेकर लंबे समय तक सार्वजनिक विवाद और वैकल्पिक दावे बने रहे। इसलिए इसे केवल “विमान में थे या नहीं” जैसे निश्चित निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है।

नेताजी की मृत्यु से जुड़ी बहस से अलग उनका ऐतिहासिक योगदान निर्विवाद रूप से महत्वपूर्ण है। उन्होंने भारत की स्वतंत्रता को केवल राजनीतिक मांग नहीं माना, बल्कि उसे राष्ट्रीय सम्मान, आत्मविश्वास और सैन्य शक्ति से जोड़कर देखा। 21 अक्टूबर इसलिए केवल आजाद हिंद सरकार की स्थापना की तारीख नहीं है; यह उस अदम्य विश्वास की स्मृति है कि गुलाम भारत भी अपना शासन स्वयं चला सकता है। नेताजी की रणनीति सफल होती या नहीं, यह इतिहास का अनुमान है; लेकिन उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय स्वतंत्रता की आकांक्षा को दुनिया के सामने एक संगठित राजनीतिक और सैन्य शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। आजाद हिंद सरकार का इतिहास हमें यह संदेश देता है कि स्वतंत्रता केवल सत्ता परिवर्तन का नाम नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता, राष्ट्रीय एकता और त्याग की चेतना का नाम है। नेताजी का जीवन इसी अदम्य चेतना का प्रतीक है।

वतन की राह में जिसने, स्वयं को वार दिया,

गुलामी के अंधेरों को, चुनौती दे दिया।

वह आज भी कह रहा है- न झुको, न रुको,

तिरंगे के लिए जीओ, तिरंगे पर मिटो।।

सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’ वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस
सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस

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