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रत्नाकर डाकू से ऋषि बनने की लोककथा से परे, वाल्मीकि हैं आदि काव्य के अमर रचयिता

26 अक्टूबर : वाल्मीकि जयंती

भारतीय साहित्य और संस्कृति के इतिहास में महर्षि वाल्मीकि का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। उन्हें परंपरा में ‘आदिकवि’ कहा गया है और उनके नाम से संबद्ध वाल्मीकि रामायण को संस्कृत साहित्य का आदि काव्य माना जाता है। रामायण केवल भगवान श्रीराम के जीवन और उनके आदर्शों का आख्यान नहीं, बल्कि भारतीय चिंतन में धर्म, मर्यादा, कर्तव्य, त्याग, करुणा और लोकमंगल की अवधारणाओं का महत्वपूर्ण साहित्यिक दस्तावेज भी है। वाल्मीकि जयंती उनके इसी विराट साहित्यिक और सांस्कृतिक योगदान के स्मरण का अवसर है। सामान्य जनमानस में वाल्मीकि को रत्नाकर नामक डाकू से तपस्वी ऋषि बनने वाली कथा से जोड़ा जाता है। यह कथा अत्यंत लोकप्रिय और प्रेरणादायी है, लेकिन तथ्यपरक दृष्टि से यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि वाल्मीकि रामायण के मूल पाठ में रत्नाकर नामक डाकू के रूप में वाल्मीकि के पूर्व जीवन का वर्णन नहीं मिलता। यह प्रसंग बाद की रामकथा-परंपराओं में विकसित हुआ माना जाता है। अतः इसे ऐतिहासिक तथ्य के बजाय लोक-धार्मिक आख्यान के रूप में देखना अधिक उचित है।

‘आदिकवि’ बनने की कथा

वाल्मीकि रामायण के बालकांड के प्रारंभ में महर्षि वाल्मीकि द्वारा देवर्षि नारद से प्रश्न करने का अत्यंत प्रसिद्ध प्रसंग मिलता है। वाल्मीकि पूछते हैं कि इस संसार में ऐसा कौन पुरुष है जो गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ, सत्यवादी, दृढ़प्रतिज्ञ, सदाचारी, विद्वान, सामर्थ्यवान और सभी प्राणियों का हित चाहने वाला हो? नारद उनके प्रश्न के उत्तर में इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न श्रीराम का परिचय देते हैं और राम के जीवन की प्रमुख घटनाओं का संक्षिप्त वर्णन करते हैं। इसके बाद वाल्मीकि रामकथा को काव्य का रूप देते हैं। स्वयं वाल्मीकि रामायण के बालकांड में वाल्मीकि द्वारा राम के चरित को काव्यबद्ध करने का उल्लेख मिलता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि रामायण की रचना के संदर्भ में नारद-वाल्मीकि संवाद स्वयं रामायण की कथा-परंपरा का महत्वपूर्ण अंग है।

करुणा से निकला पहला श्लोक

वाल्मीकि के आदिकवि बनने से जुड़ा सबसे प्रसिद्ध प्रसंग क्रौंच पक्षी का है। परंपरा के अनुसार एक शिकारी ने प्रेमरत क्रौंच पक्षी के जोड़े में से नर पक्षी को मार दिया। मादा पक्षी के विलाप से वाल्मीकि के हृदय में करुणा उत्पन्न हुई और उनके मुख से स्वतः एक छंदबद्ध वाक्य निकला…..!

“मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥”

इसी प्रसंग को संस्कृत काव्य की प्रथम श्लोकात्मक अभिव्यक्ति के रूप में परंपरा में प्रतिष्ठित किया गया है। आधुनिक विद्वत्-अध्ययन भी रामायण के इस प्रसंग को वाल्मीकि की काव्य-रचना और श्लोक-परंपरा के महत्वपूर्ण आरंभिक आख्यान के रूप में देखता है। यही कारण है कि वाल्मीकि को आदिकवि और रामायण को आदिकाव्य कहा जाता है।

रत्नाकर की कथा : आस्था और इतिहास के बीच

वाल्मीकि के संबंध में सबसे लोकप्रिय कथा यह है कि उनका पूर्व नाम रत्नाकर था और वे वन में राहगीरों को लूटने वाले डाकू थे। एक दिन उनकी भेंट नारद अथवा सप्तर्षियों से हुई। ऋषियों ने उनसे पूछा कि जिन लोगों के लिए वे पाप कर रहे हैं, क्या वे उनके पाप में भी भागीदार होंगे? परिवार से उत्तर मिलने के बाद रत्नाकर को आत्मबोध हुआ और उन्होंने तपस्या आरंभ की। उनके शरीर पर चींटियों ने बांबी बना ली, जिसके कारण वे ‘वाल्मीकि’ कहलाए। ‘मरा-मरा’ का जाप करते-करते ‘राम-राम’ का जाप होने की कथा भी इसी आख्यान का हिस्सा है। यह कथा भारतीय लोकमानस में अत्यंत लोकप्रिय है और परिवर्तन तथा आत्मशुद्धि का प्रेरक प्रतीक भी है। लेकिन इसे वाल्मीकि के जीवन का समकालीन ऐतिहासिक प्रमाण मानना उचित नहीं है। शोधपरंपरा में इसे बाद में विकसित हुई कथा माना गया है। रत्नाकर-डाकू वाला प्रसंग वाल्मीकि रामायण में नहीं मिलता; बाद की रामकथा परंपराओं, विशेषकर अध्यात्म रामायण आदि में इसका स्वरूप विकसित हुआ। अध्यात्म रामायण स्वयं वाल्मीकि रामायण से बहुत बाद का ग्रंथ माना जाता है।इसलिए यह कहना अधिक तथ्यसम्मत होगा कि रत्नाकर से वाल्मीकि बनने की कथा धार्मिक-लोक परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण है, जबकि वाल्मीकि रामायण स्वयं वाल्मीकि की पूर्व डाकू पहचान का प्रमाण नहीं देती।

वाल्मीकि का वंश और ऐतिहासिक स्वरूप

वाल्मीकि के ऐतिहासिक जीवन के संबंध में आधुनिक इतिहासकारों के पास निश्चित और सर्वसम्मत प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। रामायण के उत्तरकांड में वाल्मीकि अपने संबंध में ‘प्रचेता’ से जुड़ी परंपरा का उल्लेख करते हैं तथा उन्हें भार्गव परंपरा से जोड़ने वाले संदर्भ भी मिलते हैं। संस्कृत साहित्य के अध्ययनों में उन्हें भार्गव अथवा प्राचेतस कहे जाने की परंपरा मिलती है। इसीलिए उनके जन्मस्थान, जन्मकाल, परिवार और प्रारंभिक जीवन के बारे में अनेक परंपराएं प्रचलित हैं, लेकिन उन्हें निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

रामायण का रचनाकाल

वाल्मीकि रामायण के रचनाकाल को लेकर विद्वानों में मतैक्य नहीं है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों की तरह इसकी रचना और विकास भी एक लंबे कालखंड में हुआ माना जाता है। आधुनिक अध्ययनों में रामायण के प्रारंभिक रूप को सामान्यतः ईसा पूर्व की पहली सहस्राब्दी के मध्य के आसपास रखने से लेकर विभिन्न अन्य काल-निर्धारण तक मत मिलते हैं। वर्तमान पाठ में समय के साथ कुछ परिवर्तन और परिवर्धन हुए होने की संभावना भी विद्वानों ने व्यक्त की है। इसलिए ‘रामायण ठीक 500 ईसा पूर्व में ही लिखी गई’ कहना अत्यधिक निश्चित दावा होगा। इसके बजाय यह कहना अधिक उपयुक्त है कि रामायण का मूल काव्य अत्यंत प्राचीन है और उसके वर्तमान पाठ का निर्माण दीर्घकालीन मौखिक तथा साहित्यिक परंपरा के विकास से जुड़ा है।

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24 हजार श्लोकों का विराट काव्य

परंपरागत रूप से वाल्मीकि रामायण में 24,000 श्लोक माने जाते हैं और इसे सात कांडों बालकांड, अयोध्याकांड, अरण्यकांड, किष्किंधाकांड, सुंदरकांड, युद्धकांड और उत्तरकांड में विभाजित किया गया है। संस्कृत विभाग की जानकारी और आई आई टी कानपुर के वाल्मीकि रामायण प्रकल्प में भी यही पारंपरिक संरचना दी गई है। रामायण के श्लोकों में केवल कथा नहीं है। इसमें परिवार, राज्य, शासन, नैतिकता, मित्रता, त्याग, प्रकृति, युद्ध, सामाजिक संबंध और मानवीय कर्तव्य जैसे अनेक विषयों का व्यापक चित्रण मिलता है। यही कारण है कि इसकी लोकप्रियता भारत की सीमाओं से बाहर भी पहुंची और दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व एशिया की अनेक संस्कृतियों में रामकथा के विविध रूप विकसित हुए।

वाल्मीकि और लव-कुश

वाल्मीकि रामायण में लव और कुश को रामकथा का गायन करने वाले बालक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। बालकांड में वर्णित परंपरा के अनुसार वाल्मीकि ने रामायण की रचना के बाद उसे लव-कुश को सिखाया और उन्होंने इसे राम के समक्ष भी गाया। आईआईटी कानपुर के वाल्मीकि रामायण प्रकल्प में बालकांड के इसी प्रसंग को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है। यह प्रसंग भारतीय साहित्य की मौखिक परंपरा के महत्व को भी दर्शाता है। एक महाकाव्य केवल लिखा ही नहीं गया, बल्कि उसका पाठ, गायन और श्रवण भी उसकी सांस्कृतिक यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा।

‘सौ करोड़ श्लोक’ की मान्यता

बाद की धार्मिक-साहित्यिक परंपराओं में रामकथा की विशालता को व्यक्त करने के लिए ‘सौ करोड़ श्लोकों’ जैसी मान्यताएं भी मिलती हैं। तुलसीदास ने भी रामकथा की अनंतता को व्यक्त करते हुए “रामायण सत कोटि अपारा” कहा है। लेकिन इसे वाल्मीकि रामायण के ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित श्लोकों की संख्या नहीं माना जाना चाहिए। वाल्मीकि रामायण की परंपरागत संख्या 24,000 श्लोक है, जबकि ‘सौ करोड़’ का उल्लेख रामकथा की अनंत महिमा और व्यापकता का काव्यात्मक-धार्मिक प्रतीक है।

वाल्मीकि का सबसे बड़ा संदेश : मनुष्य बदल सकता है

वाल्मीकि से जुड़ी रत्नाकर की कथा ऐतिहासिक हो या लोकपरंपरा का विकसित रूप, उसका संदेश आज भी अत्यंत प्रासंगिक है।मनुष्य अपने कर्म, विचार और संकल्प से स्वयं को बदल सकता है। और यदि वाल्मीकि रामायण के मूल पाठ को केंद्र में रखें, तो उनका सबसे बड़ा योगदान एक महान साहित्यिक कृति की रचना है, जिसने भारतीय सभ्यता के नैतिक और सांस्कृतिक मानस को हजारों वर्षों तक प्रभावित किया। उन्होंने राम को केवल एक शक्तिशाली योद्धा के रूप में नहीं, बल्कि मर्यादा, सत्य, कर्तव्य और लोकहित से जुड़े आदर्श पुरुष के रूप में प्रस्तुत किया। इसी कारण रामायण की कथा युगों को पार करती हुई आज भी भारतीय समाज की चेतना का हिस्सा बनी हुई है।

महर्षि वाल्मीकि का व्यक्तित्व भारतीय साहित्य में केवल इसलिए महान नहीं है कि उन्होंने रामायण की रचना की, बल्कि इसलिए भी कि उन्होंने काव्य को मानवीय संवेदना, नैतिकता और जीवन-मूल्यों से जोड़ा। क्रौंच-वध के प्रसंग में करुणा से जन्मा श्लोक हो अथवा राम के चरित्र का विराट आख्यान…वाल्मीकि की रचनात्मक दृष्टि में मनुष्य और उसके आचरण का प्रश्न सदैव केंद्रीय दिखाई देता है। रत्नाकर से वाल्मीकि बनने की लोकप्रिय कथा हमें आत्मपरिवर्तन की प्रेरणा देती है, जबकि वाल्मीकि रामायण हमें साहित्य की शक्ति और मानवीय मर्यादा का बोध कराती है। इसलिए वाल्मीकि जयंती केवल किसी ऋषि या कवि की जयंती नहीं, बल्कि भारतीय काव्य परंपरा, मानवीय संवेदना और आत्मपरिष्कार की चेतना का पर्व है। आज आवश्यकता है कि हम वाल्मीकि को केवल एक धार्मिक आख्यान के पात्र के रूप में न देखें, बल्कि उन्हें भारतीय साहित्य के उस महान रचनाकार के रूप में भी समझें, जिसने रामकथा को ऐसा काव्यात्मक स्वर दिया जो सहस्राब्दियों बाद भी भारतीय जनमानस को प्रभावित कर रहा है।

करुणा से काव्य जन्मा, शब्दों ने इतिहास रचा,
वाल्मीकि ने रामकथा में मानवता का दीप रचा।
युग बदले, पर अमर रही उनकी लेखनी की पहचान,
आदिकवि के चरणों में शत-शत नमन, शत-शत सम्मान।।

सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’ वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस
सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस

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