कल ज्ञान की खोज
में भटकता रहा,
हर चेहरे में कोई
उत्तर पढ़ता रहा।
कल भी यात्री था,
आज भी यात्री हूँ,
बस मंजिल बदली है,
मैं वही याचक हूँ।
कभी दुनिया को
समझने का भ्रम पाला,
हर सच के पीछे
झूठ का चेहरा निराला।
जिनको समझा था
ज्ञान के उजियारे,
वे ही निकले
अंधकार के रखवारे।
पुस्तकें खूब पढ़ीं,
उपदेशों को जाना,
पर खुद को पढ़ना
कभी न आया।
औरों की कमियां
गिनता रहा उम्र भर,
अपनी ही खामोशी
से रहा बेखबर।
अब आईना पूछता है,
बता तेरी पहचान,
कितना सच है तुझमें,
कितना झूठा अभिमान?
दुनिया को जीतकर
भी क्या हासिल किया,
जब अपने ही भीतर
खुद को खो दिया।
अब न कोई गुरु,
न भीड़ का सहारा,
खुद से ही पूछता
हूँ हर सवाल दोबारा।
कल ज्ञान खोजता था,
आज स्वयं की तलाश है,
यात्री तो वही हूं,
बस खुद से मिलने
की ही आस है।।

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस