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कस्तूरबा गांधी ने मोहन चंद को महात्मा गांधी बनाया

-22 फरवरी कस्तूरबा गांधी पुण्यतिथि के अवसर पर विशेष-

महात्मा गांधी की जीवन संगिनी श्रीमती कस्तूरबा गांधी ताउम्र गांधीजी का साथ निभाकर चलीं, बड़े से बड़े मुसीबत में भी वे गांधीजी का संबल बनकर उन्हें महान बना गईं। कहते हैं न कि हर सफल आदमी के पीछे स्त्री का हाथ होता है। उसकी सफलता और उन्नति के लिए जिम्मेदार स्त्री होती है। ठीक इस कहावत को चरितार्य करती हुई श्रीमती कस्तूरबा गांधी भी मोहन चंद करम चंद के महात्मा गांधी जैसा वैश्विक और विराट व्यक्तित्व धारण करने के पीछे पूर्ण रूप से जिम्मेदार रही है। स्वयं महात्मा गांधी ने भी एक अवसर पर कहा है कि “मेरे जीवन में मेरी पत्नी का मुझे बहुत सहयोग और समर्पण मिला, जो न मिलता तो शायद आज जो मैं हूं वह न होता।”

सन् 1882 में महज बाल्यावस्था में ही कस्तूरबा का विवाह मोहन चंद से हो गया था। मोहन चंद की ही उम्र उस समय मात्र तेरह वर्ष की थी। कस्तूरबा मोहनचंद के पिता काबा गांधी के मित्र की लड़की थी। अतः एक ही उम्र व पूर्व परिचित होने के कारण वे दोनों हमजोली की भांति साथ-साथ खेलते थे। परिवार के धार्मिक वातावरण में मोहन और कस्तूरबा के महान संस्कारों का निर्माण हो रहा था। धीरे-धीरे दोनों बड़े होते गए और दोनों के. व्यवहार में परिपक्वता भी आती गई। , मोहन चंद के विलायत में कानून की पढ़ाई करने का समय आया। एक पत्नी ने अपने पति की शिक्षा और संस्कार के लिए अपनी इच्छाओं को हंसते-हंसते

दमित कर दिया। जब मोहन उनके पास विदाई लेने आए थे तो उन्होंने मौन रहकर ही बहुत कुछ निःशब्द कहकर उन्हें जानें की स्वीकृति दे दी।

 गांधी जब अफ्रीका की दुबारा यात्रा पर गए तो उनके साथ श्रीमती कस्तूरबा व उनके दो पुत्र भी साथ गए थे। उन दिनों वे यूरोपीय पोशाक में रहते थे। उन्होंने कस्तूरबा और बच्चों को भी विशेष पोशाक पहनने का आदेश दिया, जिससे वे गोरों द्वारा अपमानित न हो पाएं। इतना ही नहीं उन्होंने कस्तूरबा को छुरी-कांटे से खाना भी सिखलाया। इसमें कस्तूरबा को बड़ा अटपटा लगा। परंतु जिद्दी पति के आगे पत्नी विवश थी। समर्पण में ही उन्हें सुख मिलता था।

भारत में एक बार गांधी पेचिस से बहुत बीमार पड़ गए। उनकी रुग्णावस्था को देखते हुए डाक्टरों ने सलाह दिया कि आपको दूध लेना होगा। तभी आपमें शक्ति आएगी। तब उन्होंने कहा कि मैं तो दूध न लेने का प्रण कर चुका हूं। इसी समय चतुर कस्तूरबा ने तत्काल टोककर कहा- “आपने बकरी के दूध की कसम नहीं खाई है”। गांधी यह सुनकर कस्तूरबा की ओर ताकने लगे और उनसें कहा कि बात तो ठीक हैं, प्रण करते समय मेरे मन में गाय माता और भैंस के दूध का ध्यान था। डाक्टर ने भी बकरी के दूध के पक्ष में राय दे दी। इस प्रकार प्रत्युत्पन्नमति से कस्तूरबा ने विकट स्थिति को अपने कौशल से सम्हाला था।

अफ्रीका में ज़ब कस्तूरबा गांधी जी के साथ थी। तब केपटाउन की सुप्रीम कोर्ट ने एक अजीब फैसला दे दिया। जिसमें ईसाई रीति से किए गए विवाहों को ही वैध माना गया। इसका परिणाम यह हुआ कि गैर ईसाई विवाह अवैध हो गए। भारतीय समाज में तहलका मच गया, स्त्रियां रोष में भर गईं। क्योंकि अब उनकी स्थिति वैवाहिक पत्नी की न होकर रखैल की हो गई। गांधी जी को इस सामाजिक अन्याय को दूर कराने के लिए पुनः सत्याग्रह की तैयारी करनी पड़ी। इस कानून से कस्तूरबा भी काफी व्यथित थीं। वह भी इस सत्याग्रह में गांधी के कंधे से कंधा मिलाकर शामिल होकर महिलाओं को प्रेरित करने लगीं। फिनिक्स बस्ती में सत्याग्रह के लिए कस्तूरबा ने महिलाओं को संगठित किया और एक बड़ा समूह बनाकर नैटाल से बिना अनुमति पत्र लिए ट्रांसवाल में प्रविष्ट होने के लिए रवाना हुई। इसके पूर्व यह तय हो चुका था कि यदि सरकार उन्हें गिरफ्तार न करे तो वे कोयले की खान पर जाएं। और महिलाओं को गिरफ्तार नहीं किया तब वे पूर्व निर्णय के अनुसार कोयले की खानों में पहुंची और मजदूरों की हड़ताल कराने में सफल हो हो गई। धीरे-धीरे आंदोलन बढ़ता ही गया। उधर गांधी जी और उनके अनुयायियों  ने अपने आप को गिरफ्तार करवा कर वहां की जेलों को ठसाठस भर दिया। आखिर कार सरकार को झुकना पड़ा और गांधी के साथ एक समझौता कर गैर ईसाई विवाह भी वैध ठहराए गए। इस आंदोलन की सफलता में कस्तूरबा का भी बहुत बड़ा हाथ रहा था।

भारत में अहमदाबाद के पास साबरमती नदी के तट पर 15 मई 1915 को गांधी जी ने आश्रम की स्थापना की। कुछ दिनों बाद उन्होंने हरिजनोद्वार, के कार्य के तहत एक हरिजन परिवार को आश्रम में रख लिया, गांधी जी के इस प्रकार अछूतों को आश्रम में रखने से कस्तूरबा बहुत झल्लाईं, बहुत बिगड़ी, मगर गांधी जी भी अपने सिद्धांत से डिगने वाले नहीं थे। कस्तूरबा के संस्कार और विचार उन्हें हरिजनों के साथ रहने पर रोक रहे थे। पर पति परायण महिल ने पति की इच्छा के आगे अपने विचारों एवं संस्कारों को कठोरता से बदला और गांधी की इच्छा का पालन करते हुए हरिजन परिवार के साथ रहने लगी।

कस्तूरबाजी गांधीजी की तरह बहुत सादगी से रहती थीं। वे गहना जेवर नहीं पहनती थी। कपड़े के नाम पर वे सूती की सफेद धोती, ब्लाउज पहनती थी। अपने संतानों को भी उन्होंने खर्चीले विद्यालयों में नहीं पढ़ाया और न उन्हें मंहगे वस्त्र ही पहनाए। 22 फरवरी, 1944 को कस्तूरबा ने गांधी जी की गोद में अंतिम सांस ली। उन्होंने मृत्यु के कुछ क्षण पूर्व यह इच्छा प्रगट की कि मेरा दाह कर्म गांधी जी द्वारा तैयार की गई खादी की साड़ी के साथ किया जाए।

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