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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शिक्षा विद और समाज सुधारक : गोपाल कृष्ण गोखले

9 मई गोपाल कृष्ण गोखले जयंती पर विशेष-
सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”

गोपाल कृष्ण गोखले एक महान समाज सुधारक और शिक्षाविद् थे। जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन को अनुकरणीय नेतृत्व प्रदान किया।  गोपाल कृष्ण गोखले जी का जन्म 9 मई, 1866 को वर्तमान महाराष्ट्र के कोटलुक गाँव में हुआ था।श्री गोखले ने सामाजिक सशक्तीकरण, शिक्षा के विस्तार और तीन दशकों तक भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की दिशा में कार्य किया तथा प्रतिक्रियावादी या क्रांतिकारी तरीकों के इस्तेमाल को खारिज किया। ये महात्मा गांधी से लगभग ढाई साल बड़े थे। गांधी जी ने अपनी क़िताब ‘स्वराज’ में लिखा है- ‘एक बार मैंने उन्हें घोड़ा-गाड़ी के बजाय ट्रेन (कलकत्ता में चलने वाली छोटी ट्रेन) से सफ़र करने की सलाह दी। वे आगे लिखते हैं – ‘गोखले दुखी हो गए और कहा, क्या तुम भी मुझे नहीं पहचान पाए? मैं जो भी कमाता हूं सब अपने आप पर नहीं खर्च करता। घोड़ा-गाड़ी से इसलिए चलता हूं कि कई लोग मुझे जानते हैं और अगर मैं ट्रेन में सफ़र करूं तो मेरे साथ अन्य यात्रियों को काफी दिक्कतें होंगी। जब तुम्हें काफी लोग जानने लग जायेंगे तब इसका अहसास होगा.’ और ऐसा हुआ भी।

   ‌‌    आज जब ‘मेक इन इंडिया’ और ‘मेक फ़ॉर इंडिया’ के बीच बहस जारी है, हम बात जान लें कि गोखले पहले व्यक्ति थे जिन्होंने ‘स्वदेशी’ विचार पर ज़ोर दिया। राजस्थान विश्वविद्यालय के कुलपति और इतिहासकार प्रोफेसर केएल कमल कहते हैं, ‘उन्होंने स्वदेशी को प्रोत्साहन देते हुए बताया कि यह देशभक्ति के साथ-साथ एक आर्थिक आंदोलन भी है. प्रोफेसर कमल उन्हें उदारवादियों का सिरमौर और भारत के संवैधानिक विकास का जनक मानते हैं। वे कहते हैं कि उन्होंने कोई नया सिद्धांत नहीं दिया बल्कि भारतीय परिवेश में पाश्चात्य राजनैतिक परंपरा के विलय की बात कही थी। गोपाल कृष्ण गोखले जी महात्मा गांधी के राजनैतिक गुरु, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के मार्ग दर्शकों में से एक, सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसायटी के संस्थापक होने के साथ-साथ गोपाल कृष्ण गोखले भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के मार्गदर्शकों में से एक थे। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे। गांधीजी उन्हें अपना राजनैतिक गुरु मानते थे।                     ‌‌गोखले राजनैतिक नेता होने के आलावा एक समाज सुधारक भी थे। उन्होंने एक संस्था “सर्वेन्ट्स ऑफ इंडिया सोसायटी” की स्थापना की, जो आम लोगों के हितों के लिए समर्पित थी। देश की आजादी और राष्ट्र निर्माण में गोपाल कृष्ण गोखले का योगदान अमूल्य है।

     गोपाल कृष्ण गोखले जी के पिता कृष्ण राव एक किसान थे पर चूँकि क्षेत्र की मिट्टी कृषि के लिए अनुकूल नहीं थी, इस कारण क्लर्क का काम करने पर मजबूर हो गए। उनकी माता वालूबाई एक साधारण महिला थीं। गोखले ने अपने बड़े भाई द्वारा आर्थिक सहायता से कोथापुर के राजाराम हाई स्कूल में अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। बाद में वह मुंबई चले गए और 1884 में अट्ठारह वर्ष की उम्र में मुंबई के एलफिंस्टन कॉलेज से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। गोपाल कृष्ण उस समय के किसी भी भारतीय द्वारा पहली बार कॉलेज की शिक्षा प्राप्त करने वाले चंद लोगों में से एक थे। उन्हें नवोदित भारतीय बौद्धिक समुदाय और पूरे भारत वर्ष में व्यापक रूप से सम्मानित किया गया। 

     ‌गोखले शिक्षा के महत्त्व को भली-भांति समझते थे। उनको अंग्रेजी भाषा का अच्छा ज्ञान था। जिसके कारण वो बिना किसी हिचकिचाहट और अत्यंत स्पष्टता के साथ अपने आप को अभिव्यक्त कर पाते थे। इतिहास के ज्ञान और उसकी समझ ने उन्हें स्वतंत्रता,स्नातक की पढाई के बाद वह अध्यापन की ओर बढ़े और पुणे के न्यू इंग्लिश स्कूल में सहायक शिक्षक का कार्य करने लगे। वर्ष 1885 में गोखले पुणे चले गए और डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी के अपने सहयोगियों के साथ फर्ग्यूसन कॉलेज के संस्थापक सदस्यों में शामिल हुए।

     गोपाल कृष्ण गोखले ने फर्ग्युसन कॉलेज को अपने जीवन के करीब दो दशक दिए और कॉलेज के प्रधानाचार्य बने। इस दौरान वो महादेव गोविन्द रानाडे के संपर्क में आये। रानाडे एक न्यायाधीश, विद्वान् और समाज सुधारक थे जिन्हे गोखले ने अपना गुरु बना लिया। गोखले ने पूना सार्वजनिक सभा में रानाडे के साथ काम किया और उसके सचिव बन गए। गोपाल कृष्ण गोखले ने 1886 में बीस साल की उम्र में सामाजिक जीवन में प्रवेश किया। उन्होंने ” ब्रिटिश शासन के अधीन भारत” पर एक सार्वजनिक भाषण दिया जिसकी बहुत सराहना हुई थी।

   – सुरेश सिंह बैस “शाश्वत” 

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