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युद्ध विराम समझौते का ईमानदारी से पालन जरूरी


-ः ललित गर्ग:-

यह शांतिपूर्ण विश्व संरचना के लिये सुखद ही है कि करीब डेढ़ वर्ष से जारी इस्राइल-हमास संघर्ष खत्म करने के लिये युद्धविराम पर सहमति बन गई है। लेकिन इस एवं ऐसे युद्धों ने ऐसे अनेक ज्वलंत प्रश्न खड़े किये हैं कि जब युद्ध की अन्तिम निष्पत्ति टेबल पर बैठकर समझौता करना ही है तो यह युद्ध के प्रारंभ में ही क्यों नहीं हो जाता? युद्ध भीषणतम तबाही, असंख्य लोगों की जनहानि एवं सर्वनाश का कारण बनता है तो ऐसी तबाही होने ही क्यों दी जाये? खेर देर आये दुरस्त आये, इजराइल और हमास ने बुधवार को युद्ध विराम समझौते के पहले मसौदे पर सहमति जताई, जो संघर्ष को समाप्त करने की दिशा में अब तक का सबसे बड़ा एवं अहम कदम है। अन्य बातों के अलावा, 60-दिवसीय युद्ध विराम प्रक्रिया में दोनों पक्षों के बंधकों को रिहा करना, सहायता बढ़ाना, नष्ट हो चुके फिलिस्तीन का पुनर्निर्माण करना और हमलों को रोकना शामिल होगा। डेढ़ साल से अधिक समय के युद्ध के बाद, युद्ध विराम फिलिस्तीन के लोगों तथा हमास द्वारा बंधक बनाए गए लोगों के लिए बहुत जरूरी राहत है। इसी तरह रूस एवं यूक्रेन के बीच लम्बे समय से चल रहा युद्ध भी समाप्त हो, यह शांतिपूर्ण उन्नत विश्व संरचना के लिये नितांत अपेक्षित है। क्योंकि ऐसे युद्धों से युद्धरत देश ही नहीं, समूची दुनिया पीड़ित, परेशान एवं प्रभावित होती है। इस तरह युद्धरत बने रहना खुद में एक असाधारण और अति-संवेदनशील मामला है, जो समूची दुनिया को विनाश एवं विध्वंस की ओर धकेलने देता है। ऐसे युद्धों में वैसे तो जीत किसी की भी नहीं होती, फिर भी इन युद्धों का होना विजेता एवं विजित दोनों ही राष्ट्रों को सदियों तक पीछे धकेल देता, इससे भौतिक हानि के अतिरिक्त मानवता के अपाहिज और विकलांग होने के साथ बड़ी जनहानि का भी बड़ा कारण बनता है।
इस्राइल-हमास में पिछले डेढ़ साल से चल रहे युद्ध के विराम को एक अहम कामयाबी माना जा रहा है। भले ही इस समझौते के लिये अमेरिका में सत्ता परिवर्तन के बीच संघर्ष समाप्ति का श्रेय लेने की होड़ हो, लेकिन गाजा के लोग जिस मानवीय त्रासदी से जूझ रहे थे, उन्हें जरूर इससे बड़ी राहत मिलेगी। संयुक्त राष्ट्र के तमाम प्रयासों व मध्यपूर्व के इस्लामिक देशों एवं भारत की बार-बार की गई पहल के बावजूद अब तक शांति वार्ता सिरे न चढ़ सकी थी। जिसकी कीमत करीब पचास हजार लोगों ने अपनी जान देकर चुकायी। इस युद्ध से गाजा के विभिन्न क्षेत्रों में जो तबाही हुई है, उससे उबरने में दशकों लग सकते हैं। निस्संदेह, इस्राइल व हमास के बीच युद्ध विराम पर सहमति होना महत्वपूर्ण है, लेकिन जब तक समझौता यथार्थ में लागू होता न नजर आए, तब कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। संघर्ष में वास्तव में हमास के कितने लड़ाके मारे गए यह कहना कठिन है, लेकिन बड़ी संख्या में बच्चों-महिलाओं ने युद्ध में जान गवांई। एक अनुमान के अनुसार गाजा संघर्ष में उपजी मानवीय त्रासदी में करीब बीस लाख लोग विस्थापित हुए हैं। इस्राइली हमलों में अस्पताल-स्कूल भी निशाना बने, जिन्हें शरणार्थियों की सुरक्षित पनाहगाह माना जाता है। इस्राइल पर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में युद्ध अपराध तक के आरोप लगाए गए। बहरहाल, जब लंबे समय के बाद शांति की स्थितियां बन रही हैं तो विश्व समुदाय, शक्तिशाली राष्ट्रों व संयुक्त राष्ट्र का दायित्व बनता है कि समझौते की शर्तों को साफ नियत एवं नीति से क्रियान्वित किया जाये। ताकि मध्यपूर्व में स्थायी शांति एवं अमनचैन की राह मजबूत हो सके। निश्चित रूप से युद्ध शांति का विकल्प नहीं हो सकता। इस संघर्ष की शुरुआत भले हमास ने की हो, लेकिन इसकी सबसे बड़ी कीमत उन लोगों ने चुकाई, जो इसके लिये जिम्मेदार नहीं थे।

युद्ध के आघात से युद्धरत देशों के साथ समूची दुनिया प्रभावित हुई है। युद्ध के आघात से तात्पर्य युद्ध के दौरान होने वाली दर्दनाक घटनाओं के परिणामस्वरूप व्यक्तियों द्वारा अनुभव किए जाने वाले मनोवैज्ञानिक संकट और शारीरिक-भावनात्मक पीड़ा से है, जैसे कि हिंसा का शिकार होना, दूसरों को नुकसान पहुंचाना, या संघर्ष के कारण प्रियजनों को खोना। युद्ध सामाजिक विश्वास को तोड़ता है, सामाजिक सामंजस्य को कम करता है और सामाजिक एवं राष्ट्रीय पूंजी को नुकसान पहुंचाता है। सशस्त्र संघर्ष के बाद, समाज उपसमूहों में गहराई से विभाजित हो जाता है जो युद्ध विराम के समझौते के बावजूद बाद के दौर में एक दूसरे से डरते हैं और नफरत करते हैं और लड़ाई जारी रखने के लिए तैयार रहते हैं। युद्ध के आघात से पीड़ित लोगों में अक्सर दूसरे पक्ष के साथ मेल-मिलाप करने और शांतिपूर्ण समाधान खोजने की इच्छा कम हो जाती है। कमजोर नागरिक समाज और कम सरकारी क्षमताएं लोगों को बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ बना सकती हैं और राज्य के बिगाड़ने वालों या राजनीतिक विरोधियों द्वारा आसानी से हेरफेर किया जा सकता है। यह स्थिति अक्सर हिंसा के निरंतर चक्रों के लिए मंच तैयार करती है।

हालांकि, अक्तूबर, 2023 में हमास के हमले से आहत इस्राइल कई मोर्चों पर लगातार युद्ध से थक चुका है, लेकिन अभी भी अरब जगत उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहा है। ऐसी आशंका इसीलिए भी है कि कई बार बातचीत अंतिम दौर पर पहुंचते-पहुंचते पटरी से उतरती गई है। बात और घात लगातार चलते रहे हैं। अब भविष्य में देखना होगा कि दोनों पक्ष समझौते के अमल के प्रति कितनी ईमानदारी से प्रतिबद्ध नजर आते हैं। हालांकि, अपने बंधकों की जल्द रिहाई को लेकर इस्राइल के विपक्षी राजनीतिक दलों व मंत्रिमंडल में भी मतभेद उभर रहे हैं, लेकिन इतनी लंबी लड़ाई के बाद थक चुकी इस्राइली सेना को भी राहत देने की मांग की जाती रही है। बहरहाल, युद्ध विराम के प्रश्न पर इस्राइल व हमास के बीच सहमति से शांति की उम्मीदें प्रबल हुई हैं। जहां एक ओर अमेरिका में वर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडेन व नव निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप समझौते के लिए श्रेय ले रहे हैं, वहीं ईरान इसे फलस्तीनी प्रतिरोध की जीत बता रहा है।

अभी गाजा में मानवीय सहायता पहुंचाने के मार्ग में आने वाली बाधाओं को भी दूर किया जाना है। दरअसल, सात अक्तूबर 2023 को हमास के क्रूर हमलों में इस्राइल के बारह सौ लोग मारे गए थे और करीब ढाई सौ लोगों को हमास के लड़ाके सौदेबाजी के लिये बंधक बनाकर ले गए थे। साफ था कि इस अपमानजक घटना का इस्राइल प्रतिशोध लेगा, लेकिन संघर्ष करीब डेढ़ वर्ष तक चलेगा, इसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। हालांकि, कुछ इस्राइली बंधक रिहा किए गए, कुछ युद्ध के बीच मारे गए, लेकिन बचे बंधकों की रिहाई का भारी दबाव नेतन्याहू सरकार पर लगातार बना रहा। संघर्ष में वास्तव में हमास के कितने लड़ाके मारे गए यह कहना कठिन है, लेकिन बड़ी संख्या में बच्चों-महिलाओं ने युद्ध में जान गवांई। एक अनुमान के अनुसार गाजा संघर्ष में उपजी मानवीय त्रासदी में करीब बीस लाख लोग विस्थापित हुए हैं। इस्राइली हमलों में अस्पताल-स्कूल भी निशाना बने, जिन्हें शरणार्थियों की सुरक्षित पनाहगाह माना जाता है। इस्राइल पर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में युद्ध अपराध तक के आरोप लगाए गए। निश्चित रूप से युद्ध शांति का विकल्प नहीं हो सकता। हालांकि, इस बात को लेकर शंकाएं व्यक्त की जा रही हैं कि इस समझौते से फिलस्तीनी संकट का स्थायी समाधान हो सकेगा। इस युद्ध मसले का हल कूटनीति और आपसी बातचीत से ही निकालने के प्रयास किये जाने की आवश्यकता भारत लगातार व्यक्त करता रहा है। युद्ध का अंधेरा मिटाने, शांति का उजला करने एवं अहिंसा-सहजीवन की कामना ही भारत का लक्ष्य रहा है। इसीलिये भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लगातार युद्ध विराम की कोशिश करते हुए दोनों ही देशों को दिशा-दर्शन देते रहे हैं। इसी तरह रूस एवं यूक्रेन में भी युद्ध-विराम की अपेक्षा है। बड़े शक्तिसम्पन्न राष्ट्रों को इस युद्ध को विराम देने के प्रयास करने चाहिए। जब तक रूस के अहंकार का विसर्जन नहीं होता तब तक युद्ध की संभावनाएं मैदानों में, समुद्रों में, आकाश में तैरती रहेगी, इसलिये आवश्यकता इस बात की भी है कि जंग अब विश्व में नहीं, हथियारों में लगे।

ललित गर्ग
ललित गर्ग
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