मोबाइल की लत बच्चों को बना रही मोबाइल एडिक्ट

बच्चों के फोन के इस्तेमाल के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। मात्र डेढ़ साल का बच्चा पांच घंटे तक मोबाइल में खोया रहता है। माता-पिता को बच्चे के फोन ज्ञान पर गर्व होता है। लेकिन बच्चे के रोने या किसी तरह की ज़िद करने पर बहलाने के लिए फोन देना उसे इस नई लत का गुलाम बनाने का पहला क़दम है। आविष्कार वरदान और अभिशाप दोनों हो सकता है, यह हमने बचपन से ही पढ़ा है। यही बात मोबाइल पर भी लागू होती है। मोबाइल का सदुपयोग करके आप अपनी दुनिया बदल सकते हैं तो दुरुपयोग करके स्वयं को या दूसरों को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं।

ज्यादा समय मोबाइल में बिताना बच्चों के लिए नुकसानदेह

चौबीस घंटे की इंटरनेट सेवा वाला स्मार्ट मोबाइल छोटे बच्चों के लिए एक बड़ा खतरा बनता जा रहा है। मोबाइल पे ज्यादा समय लगे रहना बच्चों के मनोमस्तिष्क और स्वास्थ्य दोनो पर गहरा दुष्प्रभाव डाल रहा है। पिछले दिनों ऐसी ही एक दिल दहला देने वाली घटना बिलासपुर में घटित हुई है जिसमें शहर के ही बारह वर्षीय एक बालक द्वारा पांच वर्ष की बच्ची के साथ दुष्कर्म का प्रयास और हत्या की घटना ने समाज को झकझोर कर रख दिया है। इस घटना ने एक बार फिर बच्चों के हाथों में मोबाइल इस घटना के मद्देनजर हमें और इंटरनेट के दुरुपयोग के गंभीर परिणामों को उजागर किया है। यह घटना दर्शाती है कैसे  मोबाइल और इंटरनेट के अश्लील वीडियो और  हिंसक सामग्री बच्चों के कोमल मन में कितना घातक दुष्प्रभाव डाल रहे हैं। यह महत्वपूर्ण है कि माता पिता अपने बच्चों के मोबाइल के आनलाइन खतरों से बचाने और इंटरनेट उपयोग पर कड़ी के लिए कदम उठाने चाहिए। निगरानी रख उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके बच्चे केवल आयु-उपयुक्त सामग्री ही देखें।

बच्चों को यौन शिक्षा आवश्यक

बच्चों को यौन शोषण और हिंसा के बारे में शिक्षित करना भी आवश्यक है। उन्हें यह जानना चाहिए कि वे किसी भी अनुचित व्यवहार के बारे में अपने माता-पिता या किसी परिचित को बता सकते हैं। सरकार, स्कूल और समाज को बच्चों को आनलाइन खतरों से बचाने के लिए कदम उठाने चाहिए। याद रखना होगा कि यह घटना सिर्फ एक त्रासदी नहीं है, बल्कि यह एक चेतावनी भी है। यह हमें बच्चों की भलाई और सुरक्षा के लिए अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से लेने के लिए आगाह करती है। बच्चों को प्यार, समर्थन और मार्गदर्शन प्रदान करना चाहिए, ताकि वे स्वस्थ और जिम्मेदार नागरिक बन सकें। मोबाइल के दुष्परिणाम से बचने के लिए अभिभावकों को सजग होना पड़ेगा।

बचाव के लिए क्या करें पेरेंट्स

  • आंकड़ों के मुताबिक 12 से 18 महीने की उम्र के बच्चों में स्मार्टफोन के इस्तेमाल की बढ़ोतरी देखी गई है। ये स्क्रीन को आंखों के करीब ले जाते हैं और जिससे आंखों को नुकसान पहुंचता है।
  • आंखें सीधे प्रभावित होने से बच्चों को जल्दी चश्मा लगने, आंखों में जलन और सूखापन, थकान जैसी दिक्कते हो रही हैं।
  • स्मार्टफोन चलाने के दौरान पलके कम झपकाते है। इसे कंप्यूटर विजन सिंड्रोम कहते हैं। माता-पिता ध्यान दें कि स्क्रीन का सामना आधा घंटे से अधिक न हो।
  • कम उम्र में स्मार्टफोन की लत की वजह बच्चे सामाजिक तौर पर विकसित नहीं हो पाते हैं। बाहर खेलने न जाने की वजह से उनके व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पाता।
  • मनोविशेषज्ञों के पास ऐसे केस भी आते हैं कि बच्चे पसंदीदा कार्टून कैरेक्टर की तरह ही हरकतें करने लगते हैं। इस कारण उनके दिमागी विकास में बाधा पहुंचती है।
  • बच्चे मोबाइल का इस्तेमाल अधिकतर गेम्स खेलने के लिए करते हैं। वे भावनात्मक रूप से कमज़ोर होते जाते हैं ऐसे में हिंसक गेम्स बच्चों में आक्रामकता को बढ़ावा देते हैं।
  • बच्चे अक्सर फोन में गेम खेलते या कार्टून देखते हुए खाना खाते हैं। इसलिए वे जरूरत से अधिक या कम भोजन करते हैं। अधिक समय तक ऐसा करने से उनमें मोटापे की आशंका बढ़ जाती है।
  • फोन के अधिक इस्तेमाल से वे बाहरी दुनिया से संपर्क करने में कतराते हैं। जब उनकी यह आदत बदलने की कोशिश की जाती है तो वो चिड़चिड़े, आक्रामक और कुंठाग्रस्त हो जाते हैं।
  • माता-पिता एक राय रखें। यदि मोबाइल या किसी और चीज़ के लिए मां ने मना किया है तो पिता भी मना करें। वरना बच्चे यह जान जाते हैं कि किससे परमिशन मिल सकती है।
  • बच्चों का इमोशनल ड्रामा सहन न करें। अपने जवाब या राय में निरंतरता रखें। एक दिन ‘न’ और दूसरे दिन ‘हां’ न कहें। रोने लगें तो ध्यान न दें। बाद में प्यार से समझाएं।
  • इंटरनेट पर कुछ अच्छा और ज्ञानवर्धक है तो उसे दिखाने के लिए समय तय निर्धारित करें और साथ बैठकर देखें। स्मार्ट टीवी का इस्तेमाल कर सकते हैं इससे आंखों और स्क्रीन के बीच दूरी भी बनी रहेगी।

बच्चों के हाथ में मोबाइल खतरनाक

मोबाइल से जहां बच्चे देश और दुनिया की जानकारी लेकर अपने करियर को आगे बढ़ा रहे हैं। वहीं, इसके गंभीर परिणाम भी सामने आ रहे हैं। शहर ही नहीं देश में भी कई घटनाएं बच्चों द्वारा इसके दुष्प्रभाव में आकर की जा रही है। मोबाइल के दुष्परिणाम से बचने के लिए अभिभावकों को सतर्क और सजग होना पड़ेगा। साथ ही बच्चे मोबाइल पर क्या देखते हैं इस ओर भी ध्यान देना होगा। इसके अलावा अपने बच्चों को समय देने के साथ ही उनकी समस्याओं को समझाने की कोशिश करनी होगी।

-डा. गामिनी शर्मा, मनोवैज्ञानिक, जिला अस्पताल बिलासपुर

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”

               

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