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स्वास्थ्य: सभ्यता की स्थिरता, समाज की शक्ति और व्यक्ति की सबसे बड़ी पूँजी

7 अप्रैल–विश्व स्वास्थ्य दिवस

मानव जीवन की समस्त उपलब्धियों चाहे वे विज्ञान की ऊँचाइयाँ हों, अर्थव्यवस्था की प्रगति हो या सामाजिक विकास की संरचनाएँ इन सबका मूल यदि किसी एक तत्व पर टिका है, तो वह है “स्वास्थ्य”। 7 अप्रैल को मनाया जाने वाला विश्व स्वास्थ्य दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि एक गहन आत्ममंथन का अवसर है, जहाँ व्यक्ति, समाज और शासन ये तीनों को अपने-अपने दायित्वों की पुनर्समीक्षा करनी होती है।वर्तमान समय को यदि “तेज गति का युग” कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।      

तकनीक ने जीवन को सरल और सुविधाजनक बनाया है, लेकिन इसी सुविधा ने हमारी दिनचर्या को असंतुलित भी कर दिया है। पहले जहाँ श्रम जीवन का स्वाभाविक हिस्सा था, वहीं आज मशीनों ने उस स्थान को ले लिया है। परिणामस्वरूप, शारीरिक निष्क्रियता एक वैश्विक समस्या बनती जा रही है। यह निष्क्रियता धीरे-धीरे मधुमेह, मोटापा, हृदय रोग और उच्च रक्तचाप जैसी जीवनशैली जनित बीमारियों को जन्म दे रही है।

स्वास्थ्य का वास्तविक अर्थ केवल रोगों का अभाव नहीं है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के अनुसार स्वास्थ्य शारीरिक, मानसिक और सामाजिक, तीनों स्तरों पर पूर्ण कुशलता की अवस्था है। यदि किसी व्यक्ति का शरीर स्वस्थ है, लेकिन वह मानसिक रूप से तनावग्रस्त है या सामाजिक रूप से असुरक्षित महसूस करता है, तो वह पूर्णतः स्वस्थ नहीं कहा जा सकता।     

इस दृष्टि से स्वास्थ्य एक बहुआयामी अवधारणा है, जिसे केवल दवाइयों या अस्पतालों के माध्यम से नहीं, बल्कि जीवनशैली, परिवेश और सामाजिक संरचना के माध्यम से समझा जाना चाहिए। आज मानसिक स्वास्थ्य एक गंभीर और मौन संकट के रूप में उभर रहा है। प्रतिस्पर्धा, करियर का दबाव, पारिवारिक अपेक्षाएँ, और सोशल मीडिया की आभासी दुनिया ने व्यक्ति को भीतर से अकेला और असंतुलित बना दिया है।      

अवसाद, चिंता और अनिद्रा जैसी समस्याएँ अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी तेजी से फैल रही हैं। यह स्थिति इस बात का संकेत है कि हमने बाहरी विकास तो कर लिया है, परंतु आंतरिक शांति कहीं पीछे छूट गई है।

इसके साथ ही, पर्यावरणीय कारक भी स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डाल रहे हैं। वायु प्रदूषण, जल की गुणवत्ता में गिरावट, रासायनिक खाद्य पदार्थ और शहरीकरण के कारण घटती हरियाली ये सभी ऐसे तत्व हैं जो सीधे हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहे हैं। जब हम स्वच्छ हवा में सांस नहीं ले सकते और शुद्ध जल उपलब्ध नहीं होता, तो स्वास्थ्य केवल एक कल्पना बनकर रह जाता है। इसीलिए स्वास्थ्य और पर्यावरण को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता; दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।

स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और समानता भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। शहरों में अत्याधुनिक अस्पताल और सुविधाएँ उपलब्ध हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव है। यह असमानता न केवल सामाजिक न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध है, बल्कि राष्ट्रीय विकास में भी बाधक है। “सभी के लिए स्वास्थ्य” का लक्ष्य तभी साकार होगा जब हर व्यक्ति चाहे वह किसी भी वर्ग, क्षेत्र या आर्थिक स्थिति से जुड़ा हो—उसे समान और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएँ प्राप्त हों।

इस संदर्भ में “निवारक स्वास्थ्य” की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि हम अपने दैनिक जीवन में कुछ सरल आदतों को शामिल कर लें- जैसे संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद, योग और ध्यान- तो हम कई गंभीर बीमारियों से स्वयं को बचा सकते हैं। यह एक सच्चाई है कि बीमारी का इलाज करने से कहीं अधिक आसान और प्रभावी है उसे होने से रोकना।

पारंपरिक भारतीय ज्ञान भी स्वास्थ्य के इस समग्र दृष्टिकोण को पुष्ट करता है। योग, आयुर्वेद और ध्यान केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे मन और आत्मा के संतुलन की भी बात करते हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के साथ इन परंपरागत पद्धतियों का समन्वय एक ऐसा मॉडल प्रस्तुत कर सकता है, जो न केवल उपचारात्मक हो, बल्कि जीवन को संतुलित और समृद्ध बनाने वाला भी हो।

हम कह सकते हैं कि विश्व स्वास्थ्य दिवस हमें एक गहरी सीख देता है—कि स्वास्थ्य कोई बाहरी वस्तु नहीं, जिसे हम कहीं से प्राप्त कर लें; यह हमारे जीवन जीने के तरीके का परिणाम है। यदि हम अपने शरीर की उपेक्षा करेंगे, अपने मन को अनदेखा करेंगे और अपने परिवेश को प्रदूषित करेंगे, तो कोई भी चिकित्सा प्रणाली हमें पूर्ण स्वास्थ्य नहीं दे सकती।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम “व्यस्त जीवन” से “स्वस्थ जीवन” की ओर अग्रसर हों। हम अपनी प्राथमिकताओं को पुनः निर्धारित करें, अपने शरीर और मन की सुनें, और एक ऐसा जीवन जिएँ जो संतुलित, जागरूक और जिम्मेदार हो। स्वास्थ्य ही वह नींव है, जिस पर एक सशक्त व्यक्ति, एक सुदृढ़ समाज और एक समृद्ध राष्ट्र का निर्माण होता है। इसे संजोना केवल व्यक्तिगत दायित्व नहीं, बल्कि एक सामूहिक संकल्प है।

स्वास्थ्य ही जीवन का आधार, इसे यूँ न खोने दे
थोड़ी सजगता, थोड़ा संयम,अपनी सांसों को संजोने ले।
तन-मन की यह अमूल्य निधि, सबसे बड़ा उपहार है,
संभल जा आज ही मानव, यही जीवन का सार है।।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
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