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गंगा के मैदानी क्षेत्रों में कृषि इतिहास की नई परतें उजागर: परागकण विश्लेषण से मिला सटीक वैज्ञानिक आधार

भारत के मध्य गंगा मैदान में कृषि की उत्पत्ति और विकास को समझने की दिशा में वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। घासों के परागकणों के सूक्ष्म विश्लेषण के आधार पर विकसित एक नई पद्धति ने यह स्पष्ट करने का मार्ग प्रशस्त किया है कि हजारों वर्षों में मानव समाजों ने किस प्रकार प्राकृतिक भूदृश्य को कृषि प्रधान क्षेत्र में परिवर्तित किया।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान Birbal Sahni Institute of Palaeosciences के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस अध्ययन में पहली बार भारत के संदर्भ में क्षेत्र-विशिष्ट बायोमेट्रिक मानदंड स्थापित किए गए हैं, जिनकी सहायता से खेती की जाने वाली घासों और जंगली घासों के परागकणों के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सकता है। यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका The Holocene में प्रकाशित हुआ है।

गैर-अनाज परागकणों की सूक्ष्म-आकृति विज्ञान

भारत, जो विश्व में गेहूं और चावल जैसे प्रमुख खाद्यान्नों का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, उसके कृषि इतिहास की वैज्ञानिक समझ लंबे समय से चुनौतीपूर्ण रही है। इसका प्रमुख कारण यह था कि गेहूं, चावल, जौ और बाजरा जैसी फसलें पोएसी (घास) परिवार से संबंधित हैं, जिनके परागकण जंगली घासों से अत्यधिक मिलते-जुलते हैं। पारंपरिक सूक्ष्मदर्शी तकनीकों से इनका भेद करना कठिन रहा है।

इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने लाइट माइक्रोस्कोपी, कॉन्फोकल लेजर स्कैनिंग माइक्रोस्कोपी और फील्ड एमिशन स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग करते हुए 22 विभिन्न प्रजातियों के परागकणों का विस्तृत विश्लेषण किया। इससे एक “युग्मित बायोमेट्रिक सीमा” (paired biometric threshold) स्थापित की गई, जिसके अनुसार अनाज फसलों के परागकण सामान्यतः 46 माइक्रोमीटर से बड़े तथा उनके वलय (annulus) का व्यास 9 माइक्रोमीटर से अधिक पाया गया, जबकि जंगली घासों के परागकण अपेक्षाकृत छोटे होते हैं।

इस वैज्ञानिक मानकीकरण से अब यह संभव हो सकेगा कि तलछटों में संरक्षित परागकणों के आधार पर होलोसीन काल—अर्थात पिछले लगभग 11,700 वर्षों—के दौरान कृषि गतिविधियों, वनों की कटाई और मानव बस्तियों के विस्तार का अधिक सटीक पुनर्निर्माण किया जा सके। यह पद्धति विशेष रूप से मध्य गंगा मैदान जैसे क्षेत्रों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी, जहां प्राचीन काल से कृषि का गहन विकास हुआ है।

अनाज के परागकणों की सूक्ष्म-आकृति विज्ञान

अध्ययन का नेतृत्व संस्थान की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. स्वाति त्रिपाठी ने किया, जिसमें Botanical Survey of India, Indian Institute of Geomagnetism तथा University of Lucknow के शोधकर्ताओं का भी महत्वपूर्ण सहयोग रहा।

इस अनुसंधान की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें यूरोपीय पराग डेटाबेस पर निर्भर रहने के बजाय गंगा के मैदानी क्षेत्रों से प्राप्त स्वदेशी आंकड़ों के आधार पर मॉडल विकसित किया गया है। इससे भारतीय उपमहाद्वीप के कृषि इतिहास को स्थानीय संदर्भ में अधिक विश्वसनीयता के साथ समझा जा सकेगा।

वैज्ञानिकों के अनुसार, यह पद्धति केवल कृषि इतिहास तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे प्राचीन पारिस्थितिकी तंत्र, वनस्पति विविधता और मानव द्वारा पर्यावरण पर डाले गए प्रभावों का भी गहन विश्लेषण संभव होगा। पुरातत्वविदों और पर्यावरण इतिहासकारों के लिए यह एक सशक्त उपकरण के रूप में उभरेगा, जिससे यह समझने में मदद मिलेगी कि किस प्रकार मानव समुदायों ने धीरे-धीरे गंगा के उपजाऊ मैदानों को एक संगठित कृषि प्रणाली में परिवर्तित किया।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के क्षेत्र-विशिष्ट वैज्ञानिक मॉडल भविष्य में अन्य भौगोलिक क्षेत्रों के अध्ययन के लिए भी मार्गदर्शक सिद्ध होंगे। यह न केवल अतीत को समझने में सहायक है, बल्कि वर्तमान और भविष्य की कृषि नीतियों तथा पर्यावरणीय प्रबंधन के लिए भी महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है।

Source: PIB

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