महंगाई की पिचकारी से फीकी होली के रंग!

होली आई होली आई।
भर के पिचकारी में महंगाई।

अब कैसे खेलें हम रंग-रंग
अब कैसे खाएं पूरी-मिठाई।
होली आई होली आई।
भर के पिचकारी में महंगाई।

बोली लाई हूं तेरे लिए एक सुन्दर सा उपहार।
पर कर दी चुपके से हमपे क़ीमतों की बौछार।
कुछ कर ना सके उसके संग
तरक़ीब ना कोई काम आई।
होली आई होली आई।
भर के पिचकारी में महंगाई।

सोचे थे इस होली में रहने ना देंगे कोई मलाल।
नाचेंगे-गाएंगे झूम के उड़ाएंगे गुलाल।
पर हो गया सारा उमंग भंग।
देख के उसकी दर्द-ए बेवफ़ाई।
होली आई होली आई।
भर के पिचकारी में महंगाई।

अब कैसे खेलें हम रंग-रंग
अब कैसे खायें पूरी मिठाई।
होली आई होली आई।
भर के पिचकारी में महंगाई।

रौनक द्विवेदी (करथ, आरा)

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