स्वच्छता रैंकिंग में लगातार टॉप पर आने वाले इंदौर में दूषित पेयजल की वजह से हुई मौतें कथनी और करनी की असमानता की पौल खोलती भयावह लापरवाही का नतीजा हैं। स्थानीय लोगों का यह आरोप बेहद गंभीर है कि पानी की क्वॉलिटी को लेकर लगातार शिकायत के बाद भी कार्रवाई नहीं की गई और दुर्भाग्य से इतनी बड़ी वारदात के बाद भी अदालत को दखल देकर स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था करने का आदेश देना पड़ रहा है। यह केवल एक दुर्घटना नहीं है और न ही इसे तकनीकी खामी कहकर टाला जा सकता है। यह घटना उस व्यवस्था का क्रूर और नंगा सच है, जो स्वच्छता के तमगों से सजी हुई है लेकिन भीतर से सड़ चुकी है। जिस शहर को लगातार सात वर्षों तक देश का सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया जाता रहा, वहीं दूषित पेयजल के कारण पंद्रह निर्दाेष लोगों की मौत हो जाना पूरे तंत्र पर एक गहरा प्रश्नचिह्न है। यह त्रासदी साबित करती है कि चमकदार रैंकिंग और पुरस्कार जीवन की वास्तविक सुरक्षा का विकल्प नहीं हो सकते। इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में पेयजल आपूर्ति करने वाली पाइपलाइन में सीवर का पानी मिल गया, जिससे हजारों लोगों का जीवन खतरे में पड़ गया। सौ से अधिक लोग अस्पताल में भर्ती हुए, सैकड़ों बीमार पड़े और अनेक परिवार हमेशा के लिए उजड़ गए। सभ्य समाज में यह कल्पना ही आत्मग्लानि से भर देने वाली है कि जिस पानी को जीवनदायिनी मानकर पिया गया, वही सीवर की गंदगी से मिला हुआ था।
सबसे अधिक पीड़ादायक तथ्य यह है कि यह सब अचानक नहीं हुआ। नागरिकों ने पहले ही दूषित पानी की शिकायतें की थीं। पानी के रंग, गंध और स्वाद में बदलाव की जानकारी दी गई थी, लेकिन नगर निगम, जलप्रदाय विभाग और स्वास्थ्य तंत्र कुंभकर्णी नींद में सोए रहे। प्रशासन तब हरकत में आया जब मौतें हो चुकी थीं। यह लापरवाही नहीं, बल्कि गहरी संस्थागत असंवेदनशीलता, क्रूरता एवं अमानवीयता है। यह उस प्रशासनिक संस्कृति का परिणाम है जिसमें फाइलें और औपचारिकताएं मानव जीवन से अधिक मूल्यवान हो गई हैं। सवाल यह नहीं है कि पानी में सीवर कैसे मिला, असली सवाल यह है कि चेतावनियों के बावजूद इसे रोका क्यों नहीं गया? हर बार की तरह इस बार भी जांच समितियां बनीं, मुआवजे की घोषणाएं हुईं और कुछ अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया। भले ही अपर नगर आयुक्त को इंदौर से हटा दिया है और प्रभारी अधीक्षण अभियंता से जिम्मेदारी वापस ले ली है। लेकिन, क्या इतना काफी है? इस तरह की ‘रूटीन’ कार्रवाई जिम्मेदारों को सबक नहीं देतीं, बल्कि पीड़ितों का मजाक बनाती हैं। क्या इन दिखावे की कार्रवाइयों से मृतकों का प्रायश्चित हो गया? क्या इससे भविष्य में ऐसी घटनाएं रुकेंगी? सच्चाई यह है कि जांच समितियां अब जवाबदेही तय करने का नहीं, बल्कि मामले को ठंडा करने का माध्यम बन चुकी हैं।
इस दुखद घटना के बाद राजनीतिक बयानबाजी ने लोगों के घावों को और गहरा किया। जिस क्षेत्र में यह त्रासदी घटी, उसके प्रतिनिधि और राज्य के नगरीय विकास मंत्री, जिनके अधीन पेयजल आपूर्ति का विभाग आता है, उनकी असंवेदनशील टिप्पणियों ने जनता के आक्रोश को बढ़ाया। बाद में खेद प्रकट किया गया, लेकिन सवाल यह है कि खेद से क्या उन परिवारों का भविष्य सुरक्षित हो जाएगा, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया? यह सही है कि उमा भारती जैसी वरिष्ठ नेत्री ने दोषियों से प्रायश्चित और दंड की मांग की, लेकिन देश का अनुभव बताता है कि ऐसी मांगें अक्सर समय के साथ फीकी पड़ जाती हैं। मध्य प्रदेश में डबल इंजन वाली सरकार का खूब प्रचार किया जाता है, लेकिन इंदौर की घटना ने दिखा दिया कि यदि व्यवस्था की पटरियां जर्जर हों, तो इंजन कितने भी हों, दुर्घटना तय है। नववर्ष की पूर्व संध्या पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुधार, क्रियान्वयन और रूपांतरण की बात कही थी और जीवन को सुगम बनाने के लिए प्रणालियों को अधिक अनुकूल बनाने पर जोर दिया था। लेकिन जब नागरिकों को स्वच्छ जल, स्वच्छ हवा, स्वस्थ चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाएं ही सुरक्षित रूप से उपलब्ध न हों, तो जीवनयापन को सुगम बनाने की बात खोखली लगती है। सर्वाेच्च न्यायालय बार-बार स्पष्ट कर चुका है कि स्वच्छ पर्यावरण और सुरक्षित जल का अधिकार संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा है। इंदौर की यह त्रासदी इस अधिकार का खुला उल्लंघन है। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर पानी में जहरीला पदार्थ मिलाए और उससे लोगों की मौत हो जाए, तो वह गंभीर अपराध माना जाता है। फिर जब प्रशासन की लापरवाही से जहरीला पानी घर-घर पहुंचता है और लोगों की जान जाती है, तो उसे अपराध क्यों नहीं माना जाए? यह गैर-इरादतन हत्या से कम गंभीर मामला नहीं है।

