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“तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा” — नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अमर पुकार

-23 जनवरी सुभाष चंद्र बोस जयंती पर-

भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई में सुभाष चंद्र बोस तथा आजाद हिंद फौज का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। 1857 ई. की असफल स्वतंत्रता क्रांति के पच्चासी वर्ष पश्चात मोहन सिंह तथा सुभाष चंद्र बोस ने आजाद, हिंद फौज के नाम से एक सैनिक संगठन स्थापित किया। सुभाष चन्द्र बोस भारत में “नेताजी” के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनका जन्म 23 जनवरी 1897 ई. को कलकत्ता में हुआ था। बाद में इन्होने लंदन से आई.सी.एस. की परीक्षा पास की। तत्पश्चात नेताजी सुभाष चन्द्र बोस कांग्रेस में शामिल हो गये, क्योकि एक बड़ा अफसर बनने के बजाय देश सेवा उन्हें अधिक प्रिय थी, ये कांग्रेस के गर्मदल  के नेता थे। 1930 ई. तथा 1938 में ये क्रमशः कलकत्ता कार्पोरेशन के प्रधान तथा कांग्रेस के प्रधान चुने गये।

महात्मा गांधी से नैतिक मतभेद हो जाने के कारण उन्होंने कांग्रेस के उच्चपद से त्यागपत्र दे दिया। 1941 में अंग्रेजी सरकार ने उन्हें घर में ही नजरबंद को दिया, पर वे बड़ी चतुराई से निकल गये तथा जर्मनी पहुंच गये। नेताजी जर्मनी से जापान आ गये। वह दूसरे विश्वयुद्ध का समय था। जर्मनी तथा जापान अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ रहे थे। उसी समय नेताजी ने आजाद हिंद फौज का नेतृत्व किया, ताकि अंग्रेजों से युद्ध करके भारत को स्वतंत्र कराया जाय। उनके अफसर बड़े उत्साह से उनकी आज्ञाओं का पालन करते थे।

तथाकथित तौर पर 1945 मे नेताजी हवाई जहाज की दुर्घटना से स्वर्ग सिधार गए, वैसे वे उड़े थे तो जो हवाई जहाज दुर्घटनाग्रस्त हुआ था उसमें वे थे या नहीं, या फिर वे इसके पूर्व ही किसी हवाई अड्डे में उतर गये थे, यह भी एक विवाद का विषय बना हुआ है,कि जो हवाई जहाज दुर्घटना ग्रस्त होकर गिरा था, उसके मलबे में सब कुछ मिला लेकिन अनथक प्रयास के बाद भी नेताजी का पार्थिव शरीर नहीं प्राप्त हो पाया था।

आजाद हिंद फौज का निर्माण- दूसरे विश्वयुद्ध में जर्मनी तथा जापान विजयी हुए और अंग्रेज हार गये। 15 फरवरी 1942 को जापानियों ने सिगापुर पर अधिकार कर लिया। इस. विश्वयुद्ध में साठ हजार भारतीय सैनिकों को जापानियों ने बंदी बना लिया। 17 फरवरी 1942 को जापानी सेनापति मेजर क्यूजिवारा ने प्रमुख भारतीय कैदी अफसरों से कहा कि वे जापानियों की सहायता करें। प्रस्ताव भारतीयों ने मान लिया। पर उन्हें डर था कि कहीं अंग्रेजों को निकालकर जापान स्वयं न भारत पर अधिकार कर ले, इसलिये भारतीय अफसरों ने जापानी सेनापति से सोच-विचार करने के लिये समय मांगा।         

जापान की राजधानी टोकियो में जापान के बंदी भारतीय अफसरों तथा दक्षिण पूर्वी एशिया के अन्य भारतीयों का एक सम्मेलन हुआ। श्री रास बिहारी बोस इस सम्मेलन के अध्यक्ष थे। वहां पर आजाद हिंद फौज के निर्माण के लिये निम्नलिखित प्रस्ताव स्वीकृत “हिंदुस्तान पर सैनिक आक्रमण करने वाली सभी सैनिक टुकड़ियों का संचालन भारतीय अफसरों के हाथ में रहे। जापान से हवाई और समुद्री हमलों के लिये सहायता ली जाये परंतु सारा काम आजाद हिंद फौज के सुपुर्द हो ,तथा जब भारत अंग्रेजों के हाथ से मुक्त हो जाय तब आजाद हिंद का शासन विधान भारतीय जनता के प्रतिनिधि तैयार करें।

जून 1942 में बैंकांक में आजाद हिंद संघ नामक एक संस्था कायम की गई जिनके अध्यक्ष श्री रास बिहारी बोस थे। इस संस्था का मुख्य कार्य था आजाद हिंद फौज की भर्ती तथा उसकी व्यवस्था करना । संघ की रीति नीति एवं कार्यप्रणाली अखिल भारतीय कांग्रेस के समान ही थी।    

तिरंगा झंडा संघ की राजपताका बनाई गई। इस संघ के मुख्य उद्देश्य थे। “विश्वास, एकता और बलिदान तथा भारत अविभाज्य है ,आजाद हिंद संघ तथा आजाद हिंद फौज सिंगापुर में बनाया गया। अपने व्यक्तित्व के कारण सुभाष चंद्र बोस ने जापान सरकार को आजाद हिंद फौज की कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप न करने के लिये विवश कर दिया। अप्रैल 1943 में सुभाषचंद्र बोस ने सिंगापुर में आजाद हिंद फौज क नेताओं को बुलाकर उन्हें परामर्श दिया कि वे सब दिल्ली में चलकर वायसराय भवन पर तिरंगा झंडा फहरायें और लाल किले पर विजय परेड करें। जयहिंद के नारे का चलन इसी समय से प्रारंभ हुआ।    

सुभाष चंद्र की सेना में पुरुष सैनिकों के अतिरिक्त स्त्रियां भी थी। स्त्रियों की सेना का नेतृत्व डाक्टर कुमारी लक्ष्मी स्वामी नाथन ने किया।

 21 अक्टूबर1943 को नेताजी ने सिंगापुर मे आजाद हिंद सरकार की स्थापना की। जर्मनी, जापान, इटली, ब्रम्हा, मलाया, फिलिपाइन, इंडोनेशिया हिंदचीन मंचूरिया और कोरिया आदि देशों ने तुरंत इसे स्वतंत्र भारत की वैध सरकार के रूप में स्वीकार कर लिया और कुछ देशों के साथ परस्पर राजदूतों का आदान-प्रदान भी होने लगा।

   24 अक्टूबर 1943 को स्वतंत्र भारत की इस वैध, सरकार ने अमरीका और इंग्लैंड के विरुद्ध यद्ध की घोषणा कर दी। 4 फरवरी 1943 को आजाद हिंद फौज ने आसाम आक्रमण किया। गांधी नेहरु तथा आजाद रेजिमेंटों ने 18 मार्च 1943 को भारत भूमि पर पांव रखा और प्रगति करती हुई इन्फाल तक आ पहुँची। आजाद हिंद फौज को युद्ध सामग्र की सहायता जापान सरकार से प्राप्त होनी थी। धीरे-धीरे जापानियों की हार होने लगी। आजाद हिंद फौज मे भी खाद्य सामग्री तथा युद्ध सामग्री का अभाव हो गया, जिससे उनकी प्रगति में रूकावट आ गई। 

23 अप्रैल 1944 को जापानी रंगून छोड़कर भाग गये, और ब्रम्हा पर पुनः अंग्रेजों का अधिकार हो गया। नेताजी टोकियों जाते समय मार्ग में हवाई जहाज की दुर्घटना का शिकार हो गये और आजाद हिंद फौज ने विवश होकर हथियार डाल दिये। भारत की अंग्रेज सरकार ने प्रेमकृष्ण सहगल, गुरुबख्स सिंह ढिल्लो और शाहनवाज खाँ आदि भारतीय अफसरों पर मुकदमे चलाए पर भारतीयों के अनुरोध कर सरकार ने सबको रिहा कर दिया। आजाद हिंद फौज के संस्थापक सदस्य सुभाष चन्द्र बोस ने भारत को स्वतंत्र कराने के लिये अपना तन मन धन सब कुछ  न्यौछावर कर दिया। 

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