भारत-यूरोपीय संघ के बीच हुई इस ऐतिहासिक ‘मदर ऑफ ऑल ट्रेड डील्स’ ने वैश्विक भू-राजनीति के शांत समुद्र में एक बड़ी लहर पैदा कर दी है। जहाँ भारत और यूरोप इसे अपनी बड़ी जीत मान रहे हैं, वहीं वाशिंगटन, बीजिंग और इस्लामाबाद में इसकी प्रतिक्रियाएँ अलग-अलग और काफी दिलचस्प हैं।

अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेन्ट ने इस डील पर कड़ी आपत्ति जताई है। अमेरिका का तर्क है कि भारत रूस से कच्चा तेल खरीद रहा है। और उसे रिफाइन करके यूरोप को बेच रहा है। अमेरिका के अनुसार, इस डील से यूरोप अनजाने में रूस-यूक्रेन युद्ध के लिए ‘फंडिंग’ कर रहा है।अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने के लिए भारत पर 25% का दंडात्मक टैरिफ लगा रखा है। अब जब ईयू ने भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौता कर लिया है, तो अमेरिका इसे अपनी नीतियों के खिलाफ एक बड़ी चुनौती के रूप में देख रहा है।
चीन इस डील को सीधे तौर पर अपने ‘ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब’ के वर्चस्व के लिए खतरा मान रहा है। चीन के सोशल मीडिया पर इस डील का मजाक उड़ाया जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि बीजिंग अंदरूनी तौर पर डरा हुआ है। यूरोपीय कंपनियां अब अपनी सप्लाई चेन के लिए चीन पर निर्भरता कम करके भारत को प्राथमिकता देंगी। वहीं चीन इसे ईयू और भारत के बीच एक नए भू-राजनीतिक गठबंधन के रूप में देख रहा है, जिसका उद्देश्य इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करना है।
अब तक पाकिस्तान को ईयू के ‘जीएसपी प्लस’ स्टेटस के कारण यूरोपीय बाजारों में भारत पर बढ़त हासिल थी। लेकिन अब, भारत को जीरो-ड्यूटी पहुंच मिलने से पाकिस्तान का नौ अरब डॉलर का कपड़ा निर्यात सीधे तौर पर खतरे में है। पाकिस्तान के कपड़ा उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि वे भारत की गुणवत्ता और कम लागत का मुकाबला नहीं कर पाएंगे। पाकिस्तानी मीडिया इसे एक “वेक-अप कॉल” मान रहा है, क्योंकि उनका देश पहले से ही आर्थिक संकट और आईएमएफ की शर्तों से जूझ रहा है।यह डील दर्शाती है कि भारत अब किसी एक शक्ति (अमेरिका या चीन) के खेमे में बंधने के बजाय अपनी ‘सामरिक स्वायत्तता’ का उपयोग कर रहा है।
वहीं अमेरिका की नाराजगी के बावजूद यूरोप का भारत के साथ आना यह साबित करता है कि वैश्विक भारत और यूरोपीय संघ के बीच संपन्न हुआ मुक्त व्यापार समझौता जिसे ‘मदर ऑफ ऑल ट्रेड डील्स’ कहा जा रहा है, न केवल दोनों क्षेत्रों के आर्थिक भविष्य को नई दिशा देगा, बल्कि वैश्विक व्यापार के शक्ति संतुलन को भी पुनर्व्यवस्थित करेगा। जनवरी 2026 में संपन्न यह ऐतिहासिक समझौता लगभग दो दशकों की लंबी प्रतीक्षा और गहन वार्ताओं का परिणाम है।
वैश्विक भू-राजनीति में जब संरक्षणवाद और ट्रेड वॉर की चर्चा गरम है, तब दुनिया की सबसे बड़ी उभरती अर्थव्यवस्था ‘भारत’ और 27 देशों के शक्तिशाली समूह ‘यूरोपीय संघ’ ने हाथ मिलाकर एक नई मिसाल पेश की है। यह समझौता महज वस्तुओं के आयात-निर्यात तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दो स्वाभाविक साझेदारों के बीच साझा समृद्धि का एक ‘ब्लूप्रिंट’ है।
भारत के लिए यह डील “मेक इन इंडिया” को वैश्विक मंच पर स्थापित करने का सबसे बड़ा अवसर है। टेक्सटाइल, चमड़ा, रत्न-आभूषण और इंजीनियरिंग सामान जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को यूरोपीय बाजारों में ‘जीरो ड्यूटी’ की पहुंच मिलेगी। अनुमान है कि अगले तीन वर्षों में केवल गारमेंट निर्यात दोगुना हो सकता है। भारत के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों के लिए 45 करोड़ यूरोपीय उपभोक्ताओं का बाजार खुल जाएगा। चार्टर्ड अकाउंटेंट्स और स्वास्थ्य पेशेवरों के लिए यूरोप में काम करना सुगम होगा, जिससे रेमिटेंस और सेवा निर्यात में भारी वृद्धि होगी।
यूरोप के लिए भारत एक ऐसा विकल्प है जिसे वे चीन के विकल्प के रूप में देख रहे हैं। लग्जरी कारों (25 लाख से ऊपर), वाइन, स्पिरिट्स और डेयरी उत्पादों पर टैरिफ कम होने से यूरोपीय कंपनियों को भारत के बढ़ते मध्यवर्ग तक सीधी पहुंच मिलेगी।भारत के स्थिर कानूनी ढांचे और इस समझौते के तहत मिलने वाली सुरक्षा से यूरोपीय निवेश एफडीआई की बाढ़ आने की संभावना है। यूरोपीय कंपनियां भारत के सस्ते श्रम और बेहतर संसाधनों का उपयोग कर अपने
उत्पादों को वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी बना सकेंगी।चार्टर्ड अकाउंटेंट्स और स्वास्थ्य पेशेवरों के लिए यूरोप में काम करना सुगम होगा, जिससे रेमिटेंस और सेवा निर्यात में भारी वृद्धि होगी।
इस डील से यूरोपीय संघ के लिए कई लाभ हासिल होंगे। उन्हें भारत के रूप में एक विशाल बाजार और सुरक्षित आपूर्ति श्रृंखला का आधार मिलेगा।यूरोप के लिए भारत एक ऐसा विकल्प है जिसे वे चीन के विकल्प के रूप में देख रहे हैं। लग्जरी कारों (25 लाख से ऊपर), वाइन, स्पिरिट्स और डेयरी उत्पादों पर टैरिफ कम होने से यूरोपीय कंपनियों को भारत के बढ़ते मध्यवर्ग तक सीधी पहुंच मिलेगी। भारत के स्थिर कानूनी ढांचे और इस समझौते के तहत मिलने वाली सुरक्षा से यूरोपीय निवेश (एफडीआई) की बाढ़ आने की संभावना है। यूरोपीय कंपनियां भारत के सस्ते श्रम और बेहतर संसाधनों का उपयोग कर अपने उत्पादों को वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी बना सकेंगी।
यह समझौता केवल दो पक्षों तक सीमित नहीं है, इसके वैश्विक प्रभाव दूरगामी हैं। ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीतियों और चीन की दबदबे वाली व्यापार नीतियों के बीच, भारत-ईयू डील ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दुनिया अब ‘विकल्प’ तलाश रही है। इससे वैश्विक सप्लाई चेन की निर्भरता चीन से हटकर भारत की ओर मुड़ेगी। भारत-ईयू समझौते के बाद वियतनाम, बांग्लादेश और तुर्की जैसे देशों के लिए यूरोपीय बाजार में प्रतिस्पर्धा और कड़ी हो जाएगी, क्योंकि भारत को मिलने वाली शुल्क छूट उसे एक बड़ा लाभ प्रदान करेगी। यह डील पर्यावरण और श्रम मानकों पर आधारित है, जो भविष्य में अन्य विकासशील देशों के लिए वैश्विक व्यापार के नए मानक तय करेगी।
सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि भारतीय डेयरी और कृषि क्षेत्र को यूरोपीय गुणवत्ता मानकों के साथ तालमेल बैठाना होगा। साथ ही, घरेलू उद्योगों को यूरोपीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार रहना होगा।भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता ’21वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक घटनाओं’ में से एक है। यह भारत को 2047 तक ‘विकसित भारत’ बनाने के लक्ष्य में मील का पत्थर साबित होगा। यदि इसे प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो यह न केवल करोड़ों नौकरियां पैदा करेगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के केंद्र को भी पश्चिम से पूर्व की ओर मजबूती से स्थानांतरित करेगा।
