-13 फरवरी सरोजनी नायडू जयंती पर विशेष-
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गिनी-चुनी महान महिला सेनानियों में भारत कोकिला सरोजनी नायडू का नाम स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। वे ऐसी वीरांगना थी जिन्होंने अंग्रेजों की गोलियां, लाठी-डण्डों की बौछारों को बड़ी बहादूरी से झेला और सीना तानकर समर में डटी रहीं। उनकी निडरता और बुलंद आवाज के साथ उनकी वाककला का लोहा ब्रिटिश हुकूमत ने भी स्वीकार किया था। उनकी इन्हीं पुरुषार्थ विशेषताओं का देखते हुए उन्हे भारत कोकिला के नाम से पुकारा गया।

सरोजनी नायडू अपनी परिवार की एक शांत और व्यवस्थित रही जिन्दगी से मुंह मोड़कर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़ी थीं। उन्हें ब्रिटिश हुकूमत की गुलामी गहरे आत्मा तक कचोटने लगी थी। वहीं महात्मा गांधी के देश भ्रमण के दौरान दिये जा रहे व्याख्यानों ने उन पर गहरा प्रभाव डाला। वे अपना घरबार छोड़कर उनके कंधे से कंधा मिलाकर स्वतंत्रता संग्राम में योद्धा की भांति शामिल हो गई। सन् 1930 के 12 मार्च को अंग्रेजों के हाथ से नमक बनाने का एकाधिकार हटाने के नमक कानून तोड़ने का शंखनाद किया गया। इस तिथि को महात्मा गांधी के नेतृत्व में सरोजनी नायडू व सतहत्तर सहयोगियों ने डांडी की पैदल यात्रा प्रारंभ की। 6 अप्रेल 1930 को निडर और सेनानी सरोजनी नायडू व गांधीजी ने नमक कानून तोड़ा। चूंकि नमक के उत्पादन पर सरकार का एकाधिकार था, इसलिये किसी के लिये भी नमक बनाना गैर कानूनी था। समुद्र के पानी के वाष्पीकरण के बाद बने नमक को उठाकर सरोजनी नायडू ने गांधी के साथ सरकारी कानून को तोड़ा। यह कानून तोड़ने पर उन्हें असंख्य लाठियों की बौछारों का सामना करना पड़ा। किन्तु ..फिर भी उन्होंने उफ् तक नहीं की।

