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महत्वपूर्ण खनिजों में आत्मनिर्भरता की ओर भारत, 2030 तक दुर्लभ पृथ्वी स्थायी चुंबक उत्पादन क्षमता 5,000 टन का लक्ष्य

भारत ने महत्वपूर्ण खनिजों विशेषकर दुर्लभ पृथ्वी तत्वों और लिथियम की खोज तथा उत्पादन क्षमता बढ़ाने की दिशा में अपने प्रयासों को तेज कर दिया है। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान और प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में जानकारी देते हुए कहा कि देश वर्ष 2030 तक दुर्लभ पृथ्वी स्थायी चुंबकों की घरेलू उत्पादन क्षमता को 5,000 टन तक पहुंचाने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है।

प्रश्नकाल के दौरान सांसदों के सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने बताया कि वर्तमान में देश में दुर्लभ पृथ्वी स्थायी चुंबकों की मांग लगभग 4,000 टन है, जो वर्ष 2030 तक बढ़कर 8,000 टन तक पहुंचने का अनुमान है। इस बढ़ती मांग को देखते हुए घरेलू उत्पादन क्षमता का विस्तार अनिवार्य हो गया है, ताकि आयात पर निर्भरता कम की जा सके और रणनीतिक क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता सुनिश्चित हो।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया कि नियोडिमियम-आयरन-बोरॉन आधारित स्थायी चुंबकों के लिए एक प्रायोगिक परियोजना शुरू की गई है। इसके साथ ही विशाखापत्तनम में समैरियम-कोबाल्ट चुम्बक संयंत्र को 500 टन प्रति वर्ष की प्रारंभिक क्षमता के साथ चालू कर दिया गया है। आगामी चरणों में इस उत्पादन क्षमता को क्रमशः 2,000 टन और फिर 5,000 टन तक बढ़ाने की योजना है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार एक समन्वित और बहु-विभागीय दृष्टिकोण के तहत महत्वपूर्ण खनिजों की खोज और विकास को गति दे रही है। इसमें विभिन्न मंत्रालयों और एजेंसियों के बीच सहयोग सुनिश्चित किया जा रहा है, ताकि संसाधनों का प्रभावी उपयोग हो सके और परियोजनाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा किया जा सके।

राजस्थान के देगाना क्षेत्र में लिथियम भंडार की संभावनाओं का उल्लेख करते हुए मंत्री ने कहा कि वहां प्रारंभिक सर्वेक्षण कार्य जारी है और आगे की खोज प्रक्रिया शीघ्र ही शुरू होने की उम्मीद है। इसके अतिरिक्त जम्मू-कश्मीर के रियासी जिले में भी इसी प्रकार के प्रयास जारी हैं, जो देश में लिथियम संसाधनों के विकास के लिए महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने यह भी रेखांकित किया कि लिथियम और दुर्लभ पृथ्वी तत्व आधुनिक तकनीकी विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनका उपयोग इलेक्ट्रिक वाहनों, नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा, एयरोस्पेस और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में व्यापक रूप से होता है। स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण और उन्नत प्रौद्योगिकियों के विस्तार के साथ इन खनिजों की मांग लगातार बढ़ रही है।

नीतिगत सुधारों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में किए गए कदमों के तहत महत्वपूर्ण खनिजों की खोज को निजी क्षेत्र के लिए भी खोला गया है। परमाणु ऊर्जा से संबंधित संशोधित ढांचे के अंतर्गत सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित करते हुए यूरेनियम जैसे रणनीतिक संसाधनों के लिए संतुलित नीति अपनाई गई है।

देश में प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन के लिए एक मजबूत औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने के उद्देश्य से तमिलनाडु, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और केरल में दुर्लभ पृथ्वी गलियारे की स्थापना की घोषणा की गई है। यह पहल न केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाएगी, बल्कि रोजगार सृजन और क्षेत्रीय विकास को भी गति देगी।

मंत्री ने बताया कि दुर्लभ पृथ्वी तत्व समुद्री तट की रेत और चट्टानों दोनों में पाए जाते हैं, जिनकी खोज और निष्कर्षण के लिए भिन्न तकनीकी दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। राजस्थान, गुजरात और झारखंड जैसे राज्यों में चट्टानों में इन खनिजों के महत्वपूर्ण भंडार मौजूद हैं, जिनकी खोज अपेक्षाकृत अधिक जटिल प्रक्रिया है।

खनन क्षेत्र में सुरक्षा और नियमन पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि अवैध खनन पर रोक लगाना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए खान मंत्रालय और संबंधित नियामक संस्थाओं द्वारा सख्त निगरानी और प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित की जा रही है।

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