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पर्यावरण से आगे भारत के विकास का बड़ा अवसर ‘कार्बन क्रेडिट’: डॉ. अतुल मलिकराम, राजनीतिक रणनीतिकार

आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन की चुनौती से जूझ रही है। मौसम का असंतुलन, बढ़ती गर्मी, अनियमित बारिश और प्राकृतिक आपदाएँ अब सामान्य बात बनती जा रही हैं। ऐसे समय में ‘कार्बन क्रेडिट’ शब्द अक्सर सुनने को मिलता है। लेकिन आम नागरिक के मन में सवाल होता है आखिर यह है क्या? और इसका हमसे क्या संबंध है? सरल शब्दों में समझें तो कार्बन क्रेडिट एक तरह का प्रमाण-पत्र है। जब कोई देश, कंपनी या परियोजना वातावरण में जाने वाले कार्बन डाइऑक्साइड जैसे प्रदूषण को एक टन कम करती है, तो उसे एक कार्बन क्रेडिट मिलता है। इस व्यवस्था की शुरुआत 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल से हुई और 2015 के पेरिस समझौते के बाद यह और व्यापक हो गई। इसका मूल सिद्धांत सीधा है जो प्रदूषण कम करे, उसे आर्थिक लाभ मिले; जो ज्यादा प्रदूषण करे, उसे इसकी कीमत चुकानी पड़े।

आज यह केवल पर्यावरण की चर्चा नहीं रह गई है, बल्कि एक वैश्विक बाजार बन चुका है। दुनिया के कई देश अपने व्यापार नियमों में बदलाव कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, यूरोपीय संघ ने ‘कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट’ जैसी व्यवस्था लागू करनी शुरू की है। इसका अर्थ यह है कि यदि किसी देश में उत्पादन के दौरान अधिक प्रदूषण होता है, तो उसके उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सकता है। आने वाले समय में भारतीय उद्योगों को भी यह साबित करना होगा कि उनका उत्पादन पर्यावरण के अनुकूल है।

यहाँ से कार्बन क्रेडिट का आर्थिक और राजनीतिक महत्व शुरू होता है। भारत लंबे समय से यह कहता आया है कि ऐतिहासिक रूप से विकसित देशों ने सबसे अधिक प्रदूषण किया है, इसलिए विकासशील देशों पर समान बोझ डालना न्यायसंगत नहीं है। लेकिन साथ ही यह भी सच है कि भविष्य की अर्थव्यवस्था ‘ग्रीन’ यानी पर्यावरण-अनुकूल दिशा में आगे बढ़ रही है। ऐसे में भारत के लिए कार्बन क्रेडिट को अवसर के रूप में देखना अधिक व्यावहारिक और रणनीतिक दृष्टिकोण है।

सबसे पहले बात करें किसानों की। खेती जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित होती है, लेकिन यही क्षेत्र नई आय का स्रोत भी बन सकता है। यदि किसान ड्रिप सिंचाई अपनाते हैं, फसल अवशेष नहीं जलाते, जैविक खाद का उपयोग बढ़ाते हैं, मिट्टी में कार्बन सुरक्षित रखने वाली पद्धतियाँ अपनाते हैं या सोलर पंप लगाते हैं तो वे कार्बन क्रेडिट अर्जित कर सकते हैं। इससे उनकी आय केवल फसल तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के बदले अतिरिक्त कमाई भी होगी। सही नीति और पारदर्शी व्यवस्था हो तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई मजबूती मिल सकती है।

दूसरा बड़ा क्षेत्र एमएसएमई यानी सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग है। यह क्षेत्र देश के रोजगार और निर्यात की रीढ़ है। यदि छोटे उद्योग ऊर्जा-कुशल मशीनें अपनाएँ, सौर या पवन ऊर्जा का उपयोग करें और उत्पादन प्रक्रिया में प्रदूषण कम करें, तो उन्हें दोहरा लाभ मिलेगा, एक तरफ ऊर्जा लागत घटेगी, दूसरी तरफ कार्बन क्रेडिट के रूप में अतिरिक्त आय का अवसर मिलेगा। आज वैश्विक खरीदार भी ‘ग्रीन सप्लाई चेन’ को प्राथमिकता दे रहे हैं। ऐसे में भारतीय उद्योगों के लिए यह प्रतिस्पर्धा बढ़ाने का व्यावहारिक मार्ग है।

तीसरे स्तर पर सरकारों की भूमिका अहम है। भारत के विभिन्न राज्यों के पास अलग-अलग प्राकृतिक संसाधन हैं, कहीं घने जंगल, कहीं तेज हवाएँ तो कहीं सौर ऊर्जा की अपार संभावनाएं हैं। यदि राज्य अपने संसाधनों के आधार पर कार्बन परियोजनाएँ विकसित करें, तो वे राजस्व का नया स्रोत बना सकते हैं। केंद्र सरकार के लिए एक पारदर्शी और मजबूत राष्ट्रीय कार्बन बाजार विकसित करना रणनीतिक रूप से आवश्यक है। इससे भारत अपने जलवायु लक्ष्यों को पूरा करते हुए वैश्विक कार्बन फाइनेंस में महत्वपूर्ण स्थान बना सकता है।

कॉर्पोरेट क्षेत्र और निवेशकों के लिए भी यह एक बड़ा अवसर है। दुनिया भर में ईएसजी (पर्यावरण, सामाजिक जिम्मेदारी और सुशासन) आधारित निवेश तेजी से बढ़ रहा है। जो कंपनियाँ अपने उत्सर्जन कम करती हैं और कार्बन क्रेडिट उत्पन्न करती हैं, वे निवेशकों की पहली पसंद बन रही हैं। यह केवल छवि सुधारने का साधन नहीं, बल्कि दीर्घकालिक व्यावसायिक स्थिरता की रणनीति है। युवा पीढ़ी के लिए भी यह क्षेत्र नए अवसर खोल रहा है। कार्बन अकाउंटिंग, पर्यावरण ऑडिट, सस्टेनेबिलिटी सलाहकार, कार्बन बाजार विश्लेषण जैसे पेशे आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ेंगे। टेक्नोलॉजी आधारित स्टार्टअप भी इस क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

भारत की स्थिति इस संदर्भ में मजबूत है। हमारा प्रति व्यक्ति उत्सर्जन विकसित देशों की तुलना में कम है। हमारे पास सौर ऊर्जा की अपार क्षमता, विस्तृत वन क्षेत्र और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था है। यदि इन संसाधनों का सही उपयोग किया जाए, तो कार्बन क्रेडिट के माध्यम से गांवों में वृक्षारोपण, स्वच्छ ऊर्जा और टिकाऊ खेती को बढ़ावा दिया जा सकता है। इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ रोजगार और आय के नए अवसर पैदा होंगे।

पेरिस समझौते के तहत भारत ने 2030 तक गैर-जीवाश्म स्रोतों से 500 गीगावाट ऊर्जा क्षमता और उत्सर्जन तीव्रता में 45 प्रतिशत कमी का लक्ष्य तय किया है। यह लक्ष्य केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं होगा। इसके लिए उद्योग, किसान, निवेशक और आम नागरिक, सभी की भागीदारी आवश्यक है। स्पष्ट है कि कार्बन क्रेडिट केवल पर्यावरण का विषय नहीं है। यह भविष्य की अर्थव्यवस्था, व्यापार नीति और राष्ट्रीय रणनीति से जुड़ा हुआ प्रश्न है। यदि भारत इसे दूरदर्शिता, पारदर्शिता और संतुलित नीति के साथ अपनाता है, तो यह हमारे लिए बाध्यता नहीं बल्कि विकास का नया अध्याय बन सकता है।

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