NEW English Version

सीएसआईआर–एनआईएससीपीआर ने ‘पारंपरिक चिकित्सा: प्रलेखन, प्रमाणीकरण और संप्रेषण’ पर राष्ट्रीय क्षमता विकास कार्यशाला आयोजित की

बेलगावी: वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद के अंतर्गत सीएसआईआर-राष्ट्रीय विज्ञान संचार एवं नीति अनुसंधान संस्थान (एनआईएससीपीआर) ने भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय पारंपरिक चिकित्सा संस्थान (आईसीएमआर–एनआईटीएम) के सहयोग से 06 मार्च 2026 को बेलगावी स्थित राष्ट्रीय पारंपरिक चिकित्सा संस्थान में “ट्रेडिशनल मेडिसिन: डॉक्यूमेंटेशन, वैलिडेशन एंड कम्युनिकेशन” विषय पर राष्ट्रीय क्षमता विकास कार्यशाला का आयोजन किया। यह कार्यक्रम राष्ट्रीय पहल ‘स्वास्तिक’ (वैज्ञानिक रूप से सत्यापित सामाजिक पारंपरिक ज्ञान) के अंतर्गत आयोजित किया गया।

इस कार्यशाला का उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा संबंधी ज्ञान के वैज्ञानिक प्रलेखन, प्रमाणिकता और प्रभावी संप्रेषण की दिशा में शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की क्षमता को सुदृढ़ करना था। कार्यक्रम में बेलगावी तथा उसके आसपास स्थित 10 विभिन्न संस्थानों से 60 से अधिक प्रतिभागियों ने पंजीकरण कराया और कार्यशाला में सक्रिय रूप से भाग लिया।

कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में कई प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की उपस्थिति रही। पद्म श्री से सम्मानित और राष्ट्रीय सोवा रिग्पा संस्थान (एनआईएसआर) की निदेशक डॉ. पद्मा गुरमेट ने पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के संरक्षण और वैज्ञानिक सत्यापन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियां भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और इन्हें वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ दस्तावेजीकृत करना समय की आवश्यकता है।

सीएसआईआर की उत्कृष्ट वैज्ञानिक और सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर की पूर्व निदेशक प्रो. रंजना अग्रवाल ने विज्ञान संचार के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पारंपरिक ज्ञान को केवल संरक्षित करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित कर समाज तक प्रभावी ढंग से पहुंचाना भी उतना ही आवश्यक है।

आईसीएमआर-राष्ट्रीय पारंपरिक चिकित्सा संस्थान (एनआईटीएम) की निदेशक डॉ. सुबर्णा रॉय ने पारंपरिक चिकित्सा के वैज्ञानिक अध्ययन और उसके वैश्विक परिप्रेक्ष्य पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि भारत में उपलब्ध पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान को आधुनिक अनुसंधान पद्धतियों के माध्यम से प्रमाणित कर वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली में महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है।

सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर की निदेशक डॉ. गीता वाणी रायसम ने कार्यक्रम में ऑनलाइन माध्यम से सहभागिता करते हुए पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में वैज्ञानिक संवाद और सहयोग को बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की क्षमता विकास कार्यशालाएं शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों को एक साझा मंच प्रदान करती हैं, जिससे पारंपरिक ज्ञान के वैज्ञानिक सत्यापन और प्रसार को नई दिशा मिलती है।

कार्यशाला के दौरान विशेषज्ञों ने पारंपरिक चिकित्सा से संबंधित ज्ञान के व्यवस्थित प्रलेखन, वैज्ञानिक प्रमाणीकरण और प्रभावी संचार के विभिन्न आयामों पर विस्तृत चर्चा की। प्रतिभागियों को इस क्षेत्र में अनुसंधान और संचार की आधुनिक पद्धतियों से भी अवगत कराया गया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »