द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विश्व ने एक ऐसी व्यवस्था बनाने की कोशिश की थी जिसमें शक्ति को नियमों और संस्थाओं के माध्यम से नियंत्रित किया जा सके। लगभग आठ दशकों तक यह वैश्विक व्यवस्था अनेक उतार-चढ़ावों के बावजूद किसी-न-किसी रूप में कायम रही। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं, बहुपक्षीय समझौते, कूटनीतिक संवाद और साझा नियम-इन सबका उद्देश्य यही था कि दुनिया ‘मत्स्य-न्याय’ यानी शक्तिशाली द्वारा कमजोर को निगल जाने की प्रवृत्ति से बची रहे। इसी सोच के तहत युनाइटेट नेशनस्, वर्ल्ड ट्रेड ऑरगेनाइजेशन, वर्ल्ड हेल्थ ऑरगेनाइजेशन, यूनेस्को और अनेक अंतरराष्ट्रीय मंचों की स्थापना हुई। इन संस्थाओं ने विश्व राजनीति को पूरी तरह आदर्श नहीं बनाया, लेकिन उन्होंने कम-से-कम इतना अवश्य सुनिश्चित किया कि शक्ति के साथ नियम और नैतिकता का एक आवरण बना रहे। परंतु आज यह व्यवस्था अभूतपूर्व संकट के दौर से गुजर रही है।
विश्व राजनीति में एक नया रुझान तेजी से उभर रहा है जिसमें सहयोग, संवाद और बहुपक्षीयता की जगह एकपक्षीय कार्रवाई, सैन्य शक्ति और त्वरित लाभ की मानसिकता को प्राथमिकता दी जा रही है। विशेष रूप से डोनाल्ड ट्रम्प के नेतृत्व में अमेरिका की नीतियों ने इस प्रवृत्ति को और तेज कर दिया है। जो देश कभी वैश्विक नियम-आधारित व्यवस्था का प्रमुख निर्माता और संरक्षक था, वही अब अनेक अंतरराष्ट्रीय समझौतों और संस्थाओं से दूरी बनाता दिखाई देता है। ट्रंप के पहले कार्यकाल में ही यह संकेत मिल गया था जब अमेरिका ने पेरिस क्लाइमेंट अग्रीमेंटस्, इरान न्यूक्लियर डील्स्, विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनेस्को जैसी संस्थाओं से खुद को अलग करने की प्रक्रिया शुरू की। इन कदमों का संदेश यह था कि यदि किसी समझौते से तात्कालिक राष्ट्रीय हित प्रभावित होते हैं तो उसे छोड़ देना ही बेहतर है। इससे वैश्विक सहयोग की उस भावना को गहरा आघात पहुंचा, जो दशकों से अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की आधारशिला रही है।
आज स्थिति और भी जटिल हो गई है। दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध और संघर्ष सामान्य घटनाओं की तरह स्वीकार किए जाने लगे हैं। चार वर्षों से जारी रुस-यूक्रेन युद्ध और दो वर्षों से चल रहा गाजा युद्ध इसका सबसे दुखद एवं विडम्बनापूर्ण उदाहरण हैं। इन संघर्षों ने लाखों लोगों के जीवन को संकट में डाल दिया है, शहरों को खंडहर में बदल दिया है और वैश्विक अर्थव्यवस्था को अस्थिर बना दिया है। युद्ध की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह किसी स्थायी समाधान की ओर नहीं ले जाता। युद्ध में विजय का दावा करने वाले भी अंततः विनाश और पीड़ा के साथ ही जीते हैं। इतिहास गवाह है कि युद्ध ने कभी भी मानवता को गौरव नहीं दिया; उसने केवल तबाही, भय और अस्थिरता को जन्म दिया है। युद्ध के परिणामस्वरूप पर्यावरण का भारी नुकसान होता है, आर्थिक संसाधन नष्ट हो जाते हैं, महंगाई बढ़ती है, रोजगार के अवसर घटते हैं और समाज में असुरक्षा तथा अविश्वास की भावना गहरी हो जाती है।
आज विश्व के सामने सबसे बड़ी चिंता यह है कि युद्ध और हिंसा धीरे-धीरे सामान्यीकृत होते जा रहे हैं। अनेक बार युद्ध का उद्देश्य वास्तविक समाधान नहीं बल्कि घरेलू राजनीति में छवि निर्माण, शक्ति प्रदर्शन या आंतरिक संकटों से ध्यान हटाना बन जाता है। ऐसी परिस्थितियों में वैश्विक नैतिकता और अंतरराष्ट्रीय कानून दोनों कमजोर पड़ते हैं। यदि शक्तिशाली देश ही नियमों को तोड़ने लगें तो पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता खतरे में पड़ जाती है। मानवाधिकारों के प्रश्न पर भी दोहरे मानदंड दिखाई देते हैं। किसी एक देश की आलोचना की जाती है, लेकिन उसी तरह के कृत्यों पर दूसरे देशों के संदर्भ में चुप्पी साध ली जाती है। इससे मानवाधिकार एक सार्वभौमिक मूल्य के बजाय भू-राजनीतिक बहस का उपकरण बन जाते हैं। यदि विश्व समुदाय वास्तव में मानवता की रक्षा करना चाहता है तो उसे हर देश के लिए समान मानदंड अपनाने होंगे। इन परिस्थितियों में यह प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या दुनिया फिर से उस दौर की ओर बढ़ रही है जहां “जिसकी लाठी उसकी भैंस” ही अंतरराष्ट्रीय राजनीति का नियम बन जाएगा। यदि ऐसा हुआ तो यह केवल छोटे देशों के लिए ही नहीं बल्कि पूरी मानव सभ्यता के लिए गंभीर खतरा होगा।
भारत का ऐतिहासिक दृष्टिकोण इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्वतंत्रता के बाद से भारत ने संप्रभुता, गैर-हस्तक्षेप और बहुपक्षीय सहयोग की नीति का समर्थन किया है। भारत का यह विश्वास रहा है कि वैश्विक समस्याओं का समाधान केवल सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। यही कारण है कि भारत ने हमेशा शांति, संवाद और कूटनीति को प्राथमिकता दी है। आज जब विश्व व्यवस्था डगमगा रही है, तब भारत की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत न केवल एक उभरती आर्थिक शक्ति है बल्कि एक ऐसी सभ्यता का प्रतिनिधि भी है जिसने सदियों से अहिंसा, सह-अस्तित्व और मानवता के मूल्यों को महत्व दिया है। महात्मा गांधी की अहिंसा की परंपरा और भारत की आध्यात्मिक विरासत आज भी विश्व को दिशा दे सकती है।

