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बुजुर्गों के भरण-पोषण के लिये एक सराहनीय पहल

भारतीय संस्कृति में माता-पिता को देवतुल्य माना गया है-“मातृदेवो भव, पितृदेवो भव” केवल शास्त्रों की पंक्ति नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक संरचना की आत्मा रही है। इसलिए यह किसी भी सभ्य समाज के लिए अत्यंत शर्मनाक स्थिति है कि जन्म देने और पालन-पोषण करने वाले माता-पिता को जीवन की सांझ में उपेक्षा, अपमान और आर्थिक असुरक्षा का सामना करना पड़े, और उन्हें अपने ही बच्चों से गुजारा भत्ता पाने के लिए कानून और प्रशासन का सहारा लेना पड़े। दुर्भाग्य से यह आज के समय की कठोर वास्तविकता बनती जा रही है। बुढ़ापा अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। उम्र बढ़ने के साथ शरीर की क्षमताएं कम होने लगती हैं, बीमारियां बढ़ने लगती हैं और आय के स्रोत लगभग समाप्त हो जाते हैं। सेवानिवृत्ति के समय जो थोड़ी बहुत जमा-पूंजी होती है, वह बच्चों की पढ़ाई, शादी-ब्याह और मकान बनाने में खर्च हो जाती है। सरकारी नौकरी करने वालों को पेंशन मिल भी जाती है, लेकिन निजी क्षेत्र या छोटे व्यवसाय से जुड़े लोगों की स्थिति अधिक कठिन हो जाती है। ऐसे समय में यदि बच्चे ही माता-पिता की देखभाल न करें तो यह केवल पारिवारिक विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक अपराध की श्रेणी में आता है।


इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए तेलंगाना विधानसभा द्वारा पारित “तेलंगाना कर्मचारी जवाबदेही और माता-पिता सहायता निगरानी विधेयक 2026” एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पहल के रूप में सामने आया है। इस विधेयक का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि बच्चे अपने माता-पिता की देखभाल नहीं करते, तो उनके वेतन से एक निश्चित राशि काटकर माता-पिता को दी जाए। यह कानून सरकारी कर्मचारियों के साथ-साथ निजी क्षेत्र के कर्मचारियों, सांसदों, विधायकों और स्थानीय निकायों के जनप्रतिनिधियों पर भी लागू होगा। इस प्रकार यह कानून केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी को कानूनी रूप देने का प्रयास है। हालांकि भारत में पहले से “माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007” मौजूद है, लेकिन तेलंगाना का यह नया विधेयक अधिक व्यापक, संवेदनात्मक और प्रभावी माना जा रहा है। इसमें प्रावधान है कि यदि बच्चे माता-पिता की देखभाल नहीं करते, तो शिकायत मिलने पर उनके वेतन से पंद्रह प्रतिशत या दस हजार रुपये (जो भी कम हो) काटकर माता-पिता के खाते में जमा किए जाएंगे। शिकायत का निस्तारण जिला कलेक्टर द्वारा साठ दिनों के भीतर किया जाएगा और इसके लिए वरिष्ठ नागरिक आयोग का गठन भी किया जाएगा। इस कानून का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि इसमें केवल जैविक माता-पिता ही नहीं, बल्कि सौतेले माता-पिता भी शिकायत कर सकते हैं।
यह कानून इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज भारतीय परिवार व्यवस्था तेजी से बदल रही है। संयुक्त परिवार टूटकर एकल परिवार में बदल चुके हैं और अब तो एक व्यक्ति परिवार की अवधारणा भी विकसित हो रही है। करियर की दौड़, आर्थिक दबाव, शहरी जीवनशैली, सुविधावाद और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बढ़ती भावना ने परिवार की पारंपरिक संरचना को कमजोर किया है। कई बार माता-पिता को घर से निकालकर वृद्धाश्रम भेज दिया जाता है, और यदि घर में रख भी लिया जाए तो उन्हें उपेक्षा, तिरस्कार और मानसिक पीड़ा सहनी पड़ती है। उनकी दवाइयों, भोजन और देखभाल तक में लापरवाही बरती जाती है। ऐसी परिस्थितियों में यह प्रश्न उठता है कि क्या माता-पिता की सेवा केवल संस्कारों से सुनिश्चित की जा सकती है या इसके लिए कानून की भी आवश्यकता है? आदर्श स्थिति में तो संस्कार ही पर्याप्त होने चाहिए। भारतीय इतिहास और परंपरा में माता-पिता की सेवा के अनेक प्रेरक उदाहरण मिलते हैं। श्रवण कुमार का उदाहरण तो भारतीय संस्कृति में आदर्श पुत्र का प्रतीक बन चुका है, जिसने अपने अंधे माता-पिता को कंधे पर बैठाकर तीर्थ यात्रा करवाई। इसी प्रकार भगवान श्रीराम ने पिता के वचन को निभाने के लिए राजपाट छोड़कर वनवास स्वीकार किया। यह केवल धार्मिक कथाएं नहीं, बल्कि भारतीय समाज की नैतिक संरचना के आदर्श हैं।
इतिहास में छत्रपति शिवाजी, महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद जैसे अनेक व्यक्तित्वों के जीवन में भी माता-पिता के प्रति गहरी श्रद्धा और सम्मान देखने को मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि माता-पिता के प्रति सम्मान और सेवा भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा रही है। लेकिन आज जब संस्कार कमजोर हो रहे हैं, तब समाज को कानून का सहारा लेना पड़ रहा है। लेकिन इस पूरे विषय को केवल एकतरफा दृष्टि से देखना भी उचित नहीं होगा। यह भी एक सच्चाई है कि कई बार माता-पिता भी बच्चों के प्रति अत्यधिक अनुशासन, नियंत्रण और अपेक्षाओं का दबाव बनाते हैं। वे चाहते हैं कि बच्चे हमेशा उनकी इच्छाओं के अनुसार ही जीवन जिएं, अपने निर्णय स्वयं न लें, विवाह, करियर, जीवनशैली हर चीज में माता-पिता की इच्छा सर्वाेपरि रहे। कई बार माता-पिता बच्चों की निजी जिंदगी में अत्यधिक हस्तक्षेप करते हैं, जिससे परिवार में तनाव उत्पन्न होता है। ऐसी परिस्थितियों में बच्चों और माता-पिता के बीच दूरी बढ़ जाती है और पारिवारिक वातावरण तनावपूर्ण हो जाता है।

इसलिए समस्या का समाधान केवल कानून नहीं है, बल्कि परिवार के भीतर संतुलन, संवाद और समझ भी उतनी ही आवश्यक है। बच्चों को यह समझना चाहिए कि माता-पिता ने उनके लिए अपना पूरा जीवन समर्पित किया है, इसलिए बुढ़ापे में उनकी सेवा और सम्मान उनका नैतिक कर्तव्य है। वहीं माता-पिता को भी यह समझना चाहिए कि समय बदल गया है, नई पीढ़ी की जीवनशैली और सोच अलग है, इसलिए उन्हें बच्चों को समझने और उन्हें स्वतंत्रता देने की आवश्यकता है। वास्तव में परिवार एक संस्था है, जो प्रेम, त्याग, सम्मान और संवाद पर चलती है, न कि केवल अधिकार और अनुशासन पर। जहां केवल अधिकार होंगे, वहां टकराव होगा; जहां केवल त्याग होगा, वहां असंतुलन होगा; लेकिन जहां प्रेम और संतुलन होगा, वहां परिवार मजबूत होगा।

तेलंगाना का यह कानून एक महत्वपूर्ण पहल है, लेकिन यह अंतिम समाधान नहीं है। कानून बच्चों को माता-पिता का भरण-पोषण करने के लिए मजबूर कर सकता है, लेकिन वह प्रेम, सम्मान और संवेदना पैदा नहीं कर सकता। इसके लिए समाज में नैतिक शिक्षा, पारिवारिक संस्कार और सामाजिक जागरूकता की आवश्यकता है। स्कूलों में, सामाजिक संस्थाओं में और धार्मिक संगठनों में परिवार और बुजुर्गों के सम्मान की शिक्षा दी जानी चाहिए। आज “नया भारत” और “विकसित भारत” की बात की जा रही है, लेकिन केवल आर्थिक विकास ही पर्याप्त नहीं है। यदि समाज में बुजुर्ग असुरक्षित, उपेक्षित और अपमानित होंगे, तो विकास अधूरा रहेगा। वास्तविक विकास वही है जिसमें समाज का हर वर्ग-बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग सुरक्षित और सम्मानित जीवन जी सकें।

अतः आवश्यक है कि हम तीन स्तरों पर कार्य करें-पहला, सरकार और कानून बुजुर्गों की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करें। दूसरा, समाज में माता-पिता के सम्मान और सेवा के संस्कार विकसित किए जाएं। तीसरा, परिवार के भीतर माता-पिता और बच्चों के बीच संतुलित और संवादपूर्ण संबंध स्थापित किए जाएं। यदि ये तीनों स्तर मजबूत हो जाएं, तो न केवल बुजुर्गों का जीवन सुरक्षित और सम्मानजनक होगा, बल्कि परिवार संस्था भी मजबूत होगी और समाज में मानवीय संवेदनाएं जीवित रहेंगी। निश्चिततौर पर कहा जा सकता है कि माता-पिता केवल परिवार का हिस्सा नहीं होते, वे परिवार की जड़ होते हैं। यदि जड़ कमजोर होगी, तो वृक्ष भी कमजोर होगा। इसलिए बुजुर्गों का सम्मान और सुरक्षा केवल एक पारिवारिक या कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि समाज की नैतिकता और सभ्यता की परीक्षा है। जो समाज अपने बुजुर्गों का सम्मान नहीं करता, वह कभी महान नहीं बन सकता।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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