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छत्तीसगढ़ की सियासत में बड़ा बदलाव तय: प्रदेश की 90 विधानसभा सीट से 120 विधानसभा सीट बढ़ने की संभावना

बिलासपुर: आने वाले कुछ वर्षों में छत्तीसगढ़ की राजनीति बड़े बदलावों की साक्षी बनने जा रही है। प्रस्तावित राष्ट्रीय जनगणना 2027 और उसके बाद होने वाली परिसीमन प्रक्रिया से प्रदेश का राजनीतिक नक्शा पूरी तरह बदल सकता है।

जनगणना 2027 और परिसीमन से बदलेगा पूरा राजनीतिक भूगोल

वर्तमान में 90 सीटों वाली विधानसभा के 120 सीटों तक विस्तार की प्रबल संभावना जताई जा रही है। वहीं, 11 लोकसभा सीटों की संख्या में भी वृद्धि हो सकती है। इस बदलाव का असर केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दशकों से स्थापित राजनीतिक और जातिगत समीकरण भी बदल जाएंगे। जनगणना दो चरणों में होगी पूरी जनगणना 2027 को दो चरणों में संपन्न किया जाएगा।

  • पहला चरण: मकान सूचीकरण (मई से शुरू)

इस चरण में भवनों की गिनती, उनके उपयोग (आवासीय/व्यावसायिक) और उपलब्ध सुविधाओं का विवरण दर्ज किया जाएगा। प्रत्येक 180 से 200 भवनों पर एक प्रगणक नियुक्त किया जाएगा।

  • दूसरा चरण: जनसंख्या गणना

इसमें सामान्य, संस्थागत तथा बेघर परिवारों के सदस्यों का विस्तृत डाटा संकलित किया जाएगा। रायपुर सहित कई शहरी निकायों में मकानों की नंबरिंग का कार्य प्रारंभ हो चुका है।मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी यशवंत कुमार के अनुसार, “जनगणना की प्रक्रिया शुरू होने के बाद परिसीमन की कार्रवाई आगे बढ़ेगी।”

डिजिटल मॉडल पर आधारित होगी जनगणना

इस बार की जनगणना पूरी तरह डिजिटल मॉडल पर आधारित होगी। कागजी दस्तावेजों की जगह मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से डेटा संग्रह किया जाएगा। नागरिकों को स्वयं ऑनलाइन जानकारी भरने का विकल्प भी दिया जाएगा, जिससे प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और तेज होगी।

90 से 120 विधानसभा सीटों का संभावित विस्तार

राज्य गठन (2000) के बाद से 2003 से छत्तीसगढ़ में विधानसभा सीटों की संख्या 90 बनी हुई है। लेकिन संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत 2026 के बाद पहली जनगणना के आधार पर परिसीमन अनिवार्य है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रक्रिया में करीब 30 नई विधानसभा सीटें जुड़ सकती हैं। इसके साथ ही लोकसभा सीटों की संख्या में भी वृद्धि संभावित है।महिला आरक्षण विधेयक लागू होने की स्थिति में लगभग 40 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो सकती हैं, जिससे राजनीतिक प्रतिनिधित्व का स्वरूप भी बदलेगा।

बस्तर संभाग में बड़े बदलाव की संभावना

परिसीमन का सबसे अधिक प्रभाव बस्तर संभाग में देखने को मिल सकता है। वर्तमान में यहां 12 विधानसभा और 2 लोकसभा सीटें (बस्तर और कांकेर) हैं।संभावना है कि बस्तर में 4 से 6 नई विधानसभा सीटें बढ़ें। वहीं, बालोद जिले का वर्तमान कांकेर लोकसभा क्षेत्र से अलग होकर किसी अन्य क्षेत्र में समावेश किया जा सकता है। इससे आदिवासी आरक्षित और सामान्य सीटों का संतुलन भी बदलेगा।

आरक्षण और जातिगत समीकरणों पर असर

ऐतिहासिक रूप से देखें तो 1951 में अविभाजित मध्य प्रदेश के समय छत्तीसगढ़ क्षेत्र की 61 सीटों में से केवल 8 सीटें अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित थीं। 1957 से अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षण लागू हुआ।
वर्तमान में विधानसभा में 29 सीटें एसटी और 10 सीटें एससी के लिए आरक्षित हैं। नए परिसीमन में जनसंख्या के अनुपात के अनुसार इनकी संख्या में बदलाव संभव है—कुछ सीटें बढ़ सकती हैं, तो कुछ का स्वरूप बदल सकता है।

क्या है परिसीमन

परिसीमन का अर्थ है किसी राज्य या देश में निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण। यह प्रक्रिया सामान्यतः जनगणना के बाद की जाती है और इसमें लोकसभा व विधानसभा दोनों क्षेत्रों की सीमाएं तय की जाती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि 2027 की जनगणना के बाद होने वाला परिसीमन केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं होगा, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की सत्ता की नई दिशा तय करेगा। राजनीतिक दलों ने इसके मद्देनजर अपनी रणनीतियां बनानी शुरू कर दी हैं।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य

छत्तीसगढ़ का राजनीतिक सफर 1951 में 61 विधानसभा सीटों से शुरू हुआ था। समय-समय पर परिसीमन के जरिए सीटों की संख्या में बदलाव होता रहा-1962: 81 सीटें 1967: 83 सीटें 2003: 90 सीटें (वर्तमान) अब तक कुल छह बार परिसीमन हो चुका है और यह सातवां परिसीमन होगा।

बदली और समाप्त हुई सीटें

समय के साथ कई विधानसभा सीटें समाप्त हुईं, जिनमें प्रमुख हैं। सूरजपुर, पिलखा, बगीचा, तपकरा, सरिया, सिपत, पामगढ़, मालखरौदा, रायपुर शहर, पल्लारी, भटगांव, भानपुरी, धमधा, खेरथा, चौकी आदि।वहीं, नई सीटों में भरतपुर-सोनहत, प्रतापपुर, रामानुजगंज, कुनकुरी, कोरबा, बेलतरा, जैजैपुर, बिलाईगढ़, रायपुर पश्चिम, रायपुर उत्तर, रायपुर दक्षिण, दुर्ग ग्रामीण, वैशाली नगर, अहिवारा, नवागढ़, पंडरिया, मोहला-मानपुर और अंतागढ़ शामिल हैं।

जनगणना 2027 और उसके बाद होने वाला परिसीमन छत्तीसगढ़ की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव का संकेत दे रहा है। यह केवल सीटों की संख्या बढ़ाने का मामला नहीं, बल्कि सत्ता, प्रतिनिधित्व और सामाजिक संतुलन के नए समीकरण गढ़ने की प्रक्रिया है। आने वाले वर्षों में प्रदेश की सियासत एक नए दौर में प्रवेश करती दिखाई दे रही है।

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