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उपभोक्ता; सेवा, क्रय पूर्व सजग बने जागरूक रहें

 “कोई भी राष्ट्र उस देश के कानूनों तथा संविधान से महान् नहीं बनता, जन आंकाक्षा ऊर्जा और सतत् प्रयास राष्ट्र को महान बनाते हैं।” उक्त उद्गार बहुत पहले भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने प्रगट किया था। हमारा प्रदेश पिछड़ा इलाका कहलाता है छत्तीसगढ़, पर वर्तमान में इस मानसिकता में बदलाव आ रहा है। व्यावसायिक दृष्टिकोण से भी छत्तीसगढ़ अब एक महत्वपूर्ण क्षेत्र  बनता जा रहा है। बाजार की दृष्टि से बिलासपुर, रायपुर, जगदलपुर, दुर्ग,भिलाई, कोरबा, रायगढ़, अंबिकापुर का तेजी से विकास हो रहा है। पर यहां के बाजार उपभोक्ताओं का बाजार न होकर व्यापारियों एवं बिचौलियं का बाजार बनकर रह गया है।

इसका सबसे प्रमुख कारण है स्वयं उपभोक्ता का अपने अधिकारों के प्रति अनभिज्ञ या लापरवाह रहना। उपभोक्ता फोरम की स्थापना इस बात का संकेत देती है कि वहां उपभोक्ता जगत में जागृति आनी शुरु हो गई है। लेकिन इनका फैलाव सभी वर्गों में न होने से उपभोक्ताओं की अनभिज्ञता का बेजा फायदा व्यापारी उठा रहे हैं। और उपभोक्ता को अंधेरे में रखकर उन्हें लूटा जा रहा है, ठगा जा रहा है।

सबसे पहले देखें पेट्रोल पंप. पेट्रोल पंप वालो को प्रशासन के आदेशानुसार पेट्रोल पंपों में निःशुल्क हवा भरने की व्यवस्था होनी चाहिये लेकिन कितने ऐसी पेट्रोल पंप है जहां उक्त सुविधा को उक्त आदेश के तहत प्रदाय किया जा रहा है। और तो और उलटे हवा भरवाने के लिये पैसे वसूल किये जाते हैं। फिर अधिकांश पेट्रोल पंप वाले पेट्रोल में भी मिलावट कर उपभोक्ता के साथ-साथ सरकार को भी चपत लगा रहे है। ये पेट्रोल पंप वाले पेट्रोल में अब टंकी को टेकर द्वारा भरा जाता है उसी समय मिट्टी तेल आदि मिला देते है। एक दो वर्ष पूर्व बिलासपुर स्थित पेट्रोल पंपो के तेलों की जांच करने पर सरकार ने आठ पेट्रोल पंपो में से छ. पर मिलावट होना पाया था, पर इन गंभीर अपराधों की जांव होना तो दूर बड़ी शांति से लीपापोती की जा चुकी है, और उपभोक्ता सब कुछ भूलकर पुनः अपने रोजमर्रा के तहत अपना काम कर रहा है और ठगा जा रहा है।वहीं सर्राफा बाजार में जब सोने चांदी की दुकान पर उपभोक्ता जाता है तो कुछ व्यापारी आभूषणों आदि की बिक्री करने के बाद रसीद देना आवश्यक नहीं समझते और न ही उपभोक्ता ही रसीद लेने की पहल करते हैं। इससे उपभोक्ता को हानि होती है।

वहीं डॉक्टर्स भी मरीजों की लंबी लाइन के कारण वे मरीज को ठीक तरह से देखे बिना ही दवा लिख ही देते हैं, जिससे वह उस डाक्टर से लुटने के बाद  बीमार हो अपनी परेशानी में और भी इजाफा  कर लेता है जब वह डाक्टर उलटे सीधे दवा लिख देते हैं। उदाहरणार्थ एक सज्जन अपने कान दर्द का इलाज कराने डाक्टर के पास पहुंचे तो उन्होंने उसे जल्दी जल्दी चेक कर बाजार से दवा खरीदकर खाने को कह दिया, वे बेचारे बाजार से उक्त दवा लेकर उसका सेवन कर लिये कि रोग से छुटकारा मिल जायेगा, पर हुआ इसका उलटा ही वे और भी तकलीफ में पड़ गये कान दर्द के साथ – चक्कर भी आने लगा दस्त भी शुरु हो गया, घबराकर वे दूसरे डाक्टर को जब अपनी समस्या बताये तो उन महोदव ने बताया कि आपने गलत दवा का सेवन कर लिया था जिससे आप की तबीयत बिगड़ी। तो ऐसे डाक्टर होते हैं जो अपनी दुकान चलाकर जनस्वास्थ्य जैसे संवेदनशील कार्य को भी बनिये का धंधा बना लिये हैं। ठीक वैसे ही इन डाक्टरों द्वारा बड़े बड़े नर्सिग होम खोलकर मरीजों की जेबों पर खुलेआम डाका डाला जाता है। उनकी चिकित्सा इतनी महंगी होती है कि मध्यम वर्ग तो सोच ही नहीं सकता वहां जाकर अपना इलाज कराने का, फिर सरकारी डाक्टर हैं तो वह अपनी डयूटी को गोलकर अपने ही नर्सिंग होम में समय देता है, ऐसा कर सरकार को भी बेवकुफ बना रहा है। प्रसूति गृहों में प्रसुताओं का बिना वजह आपरेशन कर उनसे पैसा ऐंठा जाता है। ऐसे अनेक प्रकरण सरकार की नजरों में आये है। और तो और इसी चक्कर में इन लोगों ने कइयों की जानें भी ले लिया है।

चिकित्सा में लापरवाही के मामले उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत आने चाहिये। यद्यपि चिकित्सकों द्वारा इसका विरोध किया जा रहा है। यह सत्य है कि रोगी उपभोक्ता नहीं हैं, लेकिन यह भी सत्य कि चिकित्सक भी व्यवसायी नहीं है, इसलिये उसे भी चिकित्सा को व्यवसाय के नजरिये से देखने का अधिकार नहीं है। हर स्थिति में उचित चिकित्स प्राप्त करना रोगी का अधिकार है।

शासन प्रशासन भी अब उपभोक्ता हितों की ओर सजग हो रही है। भारतीय संसद ने भारतीय संविधान की मर्यादा में अनेकों अधिनियमों को निर्माण किया है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 भारतीय संसद की एक महत्वपूर्ण देन है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पूर्व  प्रचलित कानूनों से अधिक क्रांतिकारी तथा प्रगति शील हैं। वैसे इस कानून के हमारे देश में प्रभावी होने के पूर्व, विश्व के अनेक देशों जैसे अमेरिका, इंग्लैड, आस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैंड में इस प्रकार के कानून प्रभावशील हैं। वर्तमान कानून जिसे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 (क्रमांक- 68 ) नाम दिया गया हैं इसका मुख्य उदेश्व उपभोक्ताओं को संरक्षण प्रदान करना है।

    इस कानून में उपभोक्ता कौन है परिभाषित है। उपभोक्ता में वस्तुओं तथा सेवाओं, दोनों के उपभोक्ता सम्मिलित हैं। वस्तुओं के संबंध में उपभोक्ता से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है, जो प्रतिफल का भुगतान करके या उसको भुगतान का वचन देकर माल कम या गलत देता /करता है तो यह अधिनियम सेवाओं के उपभोक्ताओं को भी संरक्षण प्रदान करता है। सेवाओं के मामले में उपभोक्ता से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है, जो प्रतिफल का भुगतान करके या उसके भुगतान का वचन देकर या उसका आंशिक भुगतान करके अथवा आंशिक भुगतान का वचन देकर किसी सेवा को किराये से लेता है। इस प्रकार इस अधिनियम की सीमा में वे सभी वस्तु और सेवाएं आती है जिनसे उपभोक्ता सीधे तौर पर जुड़ा हुआ हैं।

अधिनियम का विस्तार अत्यंत व्यापक है। मूलतः यह कानून, जब तक केन्द्रीय शासन किन्ही वस्तुओं अथवा सेवाओं को विशेष छूट नहीं देता है, अपनो परिसीमा में सभी वस्तुओं तथा सेवाओं पर लागू होता है। निजी, सार्वजनिक तथा सहकारी सभी क्षेत्र में इसके क्षेत्राधिकार में आते हैं। यह कानून उपभोक्ता को संरक्षण का अधिकार, ऐसी वस्तुओं के विपणन के विरुद्ध जो जीवन तथा संपत्ति के लिये हानिकारक हो, प्रदान करता है। आज के हमारे बाजार व्यापक तथा व्यवहार तीनों अधिकांशतः मध्वाचारों, कपट तथा छलावे से भरे हैं। यह कानून वस्तु की गुणवत्ता, मात्रा, क्षमता, शुद्धता तथा मूल्य के बारे में उपभोक्ता को जानने का अधिकार प्रदान करता है। प्रतिस्पर्धा मूल्यों पर माल की विभिन्न किस्मों को सुलभ उपलब्धियां देता है। 

इस कानून में पहली  बार वह व्यवस्था की गई है कि, उपभोक्ता की शिकायत की विधिवत् सुनवाई के पश्चात उसके हितों को समुचित रूप से सुरक्षा प्रदान की जायेगी। अब उपभोक्ता को अनुचित व्यवहार, अनुचित शोषण के विरुद्ध क्षतिपूर्ति का अधिकार प्राप्त है। उपभोक्ताओं में उनके अधिकारों के प्रति जागरुकता लाने के लिये इस कानून के प्रावधानों को सरल भाषा में प्रचार-प्रसार के माध्यमों से आम आदमी को जानकारी देना आवश्यक है। इस अधिनियम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अब किसी शोषित, पीड़ित, ठगे गये उपभोक्ता को शासन तंत्र के किसी विभाग से शिकायत करने की आवश्यकता नहीं है। अब यदि उपभोक्ता को किसी माल की या सेवा की प्रमाणिकता, विशुद्धता, परिमाण अथवा मूल्य संबंधी कोई शिकायत है तो वह क्षतिपूर्ति के लिये तत्संबंधी अधिकारिता रखने वाले जिला फोरम, राज्य आयोग अथवा राष्ट्रीय आयोग में अपनी शिकायत प्रस्तुत कर सकता है।   

इस कानून की विशेषता यह है कि इसमें उपभोक्ताओं की शिकायतों को शीघ्र सरल, तरीकों से, कम से कम खर्चे तथा समय में दूर करने की व्यवस्था है। शिकायतकर्ता को कोई न्याय शुल्क देने की आवश्यकता नहीं है। शिकायत संबंधित अर्धन्यायिक मंडल के समक्ष उसके कानूनी क्षेत्राधिकार के अनुसार प्रस्तुत की जा सकती है। शिकायत करने वाला कोई भी उपभोक्ता हो सकता है। उपभोक्ता का संगठन केन्द्रीय शासन, राज्य शासन, अथवा संघ, राज्य प्रशासन भी हो सकता है। शिकायत किसी व्यापारी के अनुचित व्यवहार, क्रय किये गये माल की कीमत से अधिक वसूली गई हो, के संबंध में भी हो सकता है।

इस कानून में जो त्रिस्तरीय तंत्र की व्यवस्था है, उसकी अधिकारिता के आधार पर माल अथवा सेवा का मूल्य तथा क्षतिपूर्ति की राशि यदि एक लाख से कम है, तो शिकायत जिला फोरम में दायर की जा सकती है जो राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित है। शिकायत उसी जिला फोरम के समक्ष दायर जा सकती है। जहां शिकायत का कारण पैदा हुआ अथवा विरोधी पक्षकार निवास करता है। यदि माल अथवा सेवाओं का मूल्य तथा क्षतिपूर्ति के लिये मांगी गई राशि एक लाख से अधिक है तथा दस लाख से कम है तो शिकायत अधिसूचति राज्य आयोग के समक्ष की जा सकती है। और यदि क्षतिपूर्ति की याचिका राशि दस लाख से अधिक है तो शिकायत राष्ट्रीय आयोग, नई दिल्ली के समक्ष दायर की जा सकती है। इस कानून में यह व्यवस्था है कि शिकायत व्यक्तिगत रूप से अथवा डाक द्वारा भेजी जा सकती है। शिकायत करते समय शिकायतकर्ता अपना नाम तथा सही पता, विरोधी पक्षकार का नाम तथा पता, शिकायत के संबंध में तथ्य, आरोपों का यदि कोई दस्तावेजी समर्थन है तो उसे संलग्न कर दें। तथा क्या राहतें चाहते हैं, उसका उल्लेख करें। उपभोक्ता की शिकायत की जांच के पश्चात माल में जो खराबी है वह दूर की जा सकेगी। माल को बदला जा सकेगा। जो मूल्य दिया गया है, उसे वापिस कराया जा सकेगा। अर्थात् उपभोक्ता को हानि या क्षति हुई हैं उसकी पूर्ति की जा सकेगी।

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      अतः उपभोक्ता जागरुकता से संगठित होकर अपने अधिकारों की रक्षा के लिये संकल्पबद्ध होकर आगे आयें। आज पर्याप्त मूल्य देने के पश्चात् भी जो उचित गुणवत्ता की, परिमाण की, शुद्धता की, मानक मापदंड की, उचित मूल्य की जो आस्था डगमगा चुकी हैं, वह इस कानूनी अस्त्र से तथा इसमें दिये गये न्यायिक तंत्र के माध्यम से बढ़ सकेंगी।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
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