( शराब बंदी पर छत्तीसगढ़ी नाटिका )
( टीप:- लेखक द्वारा 39 वर्ष पूर्व लिखी गई रचना प्रतिष्ठित संस्था द्वारा पुरस्कृत )
पात्र परिचय
- समारू
- मनटोरा (समारु की पत्नी)
- दुकालू( समारु का दोस्त)
- मुखिया
- संतोष (समारु का लड़का)
- नोनी (समारु की लड़की)
*प्रथम दृश्य*
समारु अपन घर में परिवार के साथ खाना खाए बर बइठे हे। दुनो लईका मन भी घलो खाना खावत रथे।
लड़का हर सकुल जायके तियारी करते रईथे
मनटोरा (खाना परोसते हुए) सुन थस, नोनी के बाबू !
समारु – (खाना खाते हुए) हाँ सुन..थौं।
मनटोरा – काल संतोष के स्कूल मं फीस पटाये के आखरी दिन हेवय ! अऊ घर में एको पईसा एखर फीस पटाये बर नई हे! कोनो डहर ले मांग के पईसा आज खच्चित ले आहा ! नई तौ संतोष के नाव हर स्कूल ले कट जाही।
समारु (चिढ़कर खाने की थाली आगे सरकाते हुए जोर से कहता है।)
कस ओ तोला कत्तेक बार कहे हंवव, के खात बेरा कोनो गोठ झन गोठियाय कर, लेकिन तैं हर मानत्तेच नहीं हस तोला मैं हर खाथों त अच्छा नई लगै का ?

मनटोरा- कस गा, मैं हर सुते के बेरा में, खाये के बेरा में, जभे तोर से गोठियारथंव तभे तैं हर कोई न कोई बेरा के बहाना ले, बात ल टारे के कोशिश करथस। मैं हर नई जानंव आज संतोष के फीस बर तैं हर पईसा ले के आबे।
समारू – (गुस्साकर खड़ा हो जाता है) देख नोनी के दाई तोर अइसनहे कचर कचर सुन-सुन के मोला महा-महा ताव आथे ! अब पईसा नइहें तव कहां ले पड़सा लावं, का अपन ला बेच के आ जांव।

