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जलवायु परिवर्तनः भविष्य नहीं, वर्तमान का महाविनाशकारी संकट

आज मानव सभ्यता जिस सबसे बड़े संकट के सामने खड़ी है, वह युद्ध, महामारी या आर्थिक मंदी नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन है। दुनिया आज जलवायु संकट के ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां हर नया आंकड़ा खतरे की घंटी बनकर सामने आ रहा है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन की ताजा रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि 2015-2025 का दशक अब तक का सबसे गर्म दौर रहा है। यह केवल एक सांख्यिकीय तथ्य नहीं, बल्कि पृथ्वी के बदलते स्वभाव का गंभीर संकेत है। रिपोर्ट बताती है कि ग्रीनहाउस गैसों का स्तर रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच चुका है और पृथ्वी का एनर्जी इम्बैलेंस लगातार बढ़ रहा है। महासागर, जो जलवायु संतुलन के सबसे बड़े नियंत्रक माने जाते हैं, अब 90 प्रतिशत से अधिक अतिरिक्त गर्मी सोख रहे हैं। इसका सीधा अर्थ है कि पृथ्वी का तापमान केवल हवा में ही नहीं, जल और भूमि के भीतर भी बढ़ रहा है। जलवायु परिवर्तन अब धीरे-धीरे आने वाली समस्या नहीं रही, बल्कि यह वर्तमान का संकट बन चुका है। दुनिया के अनेक हिस्सों में असामान्य गर्मी, बाढ़, सूखा, चक्रवात और जंगल की आग जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। प्रति का संतुलन बिगड़ रहा है और मौसम का मिजाज अनिश्चित होता जा रहा है। कहीं अत्यधिक वर्षा से बाढ़ आ रही है तो कहीं महीनों तक बारिश नहीं हो रही। यह असंतुलन सीधे-सीधे मानव जीवन, कृषि, जल संसाधनों और अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहा है। इस बदलते मौसम ने सबसे ज्यादा मनुष्य के स्वास्थ्य पर हमला किया है।
भारत के संदर्भ में यह संकट और भी गंभीर रूप लेता जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में भारत के अनेक शहरों में तापमान 48 से 50 डिग्री तक पहुंच गया, जबकि पहले 45 डिग्री को ही अत्यधिक गर्मी माना जाता था। अब असामान्य गर्मी ने फरवरी और मार्च जैसे महीनों को भी झुलसाना शुरू कर दिया है। हीटवेव की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ रही हैं। इसका असर केवल स्वास्थ्य पर नहीं, बल्कि बिजली, पानी, खेती, श्रम, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। बढ़ती गर्मी ने केवल मानव जीवन ही नहीं, बल्कि वन्यजीव, पेड़-पौधे और सम्पूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को भी संकट में डाल दिया है। जलवायु परिवर्तन के पीछे सबसे बड़ा कारण मानव का विकास मॉडल है। कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग, वनों की कटाई, अनियोजित शहरीकरण, औद्योगीकरण और संसाधनों का अंधाधुंध दोहन पृथ्वी को लगातार गर्म कर रहा है। आज वैश्विक तापमान लगभग एक लाख 25 हजार वर्षों के उच्चतम स्तर के आसपास पहुंच चुका है। यह स्थिति बताती है कि समस्या प्रकृति में नहीं, बल्कि मानव की जीवनशैली और विकास की दिशा में है।

वर्तमान वैश्विक परिस्थितियां इस संकट को और अधिक खतरनाक बना रही हैं। दुनिया के अनेक हिस्सों में युद्ध की स्थितियां बनी हुई हैं। युद्ध केवल मानव जीवन और अर्थव्यवस्था को ही नष्ट नहीं करते, बल्कि पर्यावरण को भी गहरा नुकसान पहुंचाते हैं। युद्ध में इस्तेमाल होने वाले विस्फोटक, रसायन, धातु, ईंधन और आग से वातावरण में भारी मात्रा में जहरीली गैसें फैलती हैं। तेल भंडारों में आग, रासायनिक संयंत्रों का नष्ट होना और सैन्य गतिविधियां वातावरण में कार्बन उत्सर्जन को कई गुना बढ़ा देती हैं। इस प्रकार युद्ध और जलवायु परिवर्तन मिलकर पृथ्वी को दोहरे संकट की ओर धकेल रहे हैं। भारत सहित दुनिया के लगभग 75 प्रतिशत जिले किसी न किसी जलवायु जोखिम के दायरे में आ चुके हैं। हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी नदियों के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लग रहा है। दूसरी ओर समुद्र का जलस्तर बढ़ने से मुंबई, कोलकाता और चेन्नई जैसे तटीय शहरों पर खतरा मंडरा रहा है। यदि समुद्र स्तर इसी गति से बढ़ता रहा तो आने वाले दशकों में तटीय आबादी का बड़े पैमाने पर विस्थापन हो सकता है। यह केवल पर्यावरण संकट नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संकट भी बन सकता है।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए यह स्पष्ट है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तेजी से कटौती नहीं की गई, तो तापमान के नए-नए रिकॉर्ड टूटते रहेंगे और पृथ्वी रहने योग्य स्थान कम होती जाएगी। जल संकट, खाद्य संकट, स्वास्थ्य संकट और प्रवासन जैसी समस्याएं बढ़ेंगी। दुनिया के अनेक वैज्ञानिक अब चेतावनी दे रहे हैं कि यदि तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित नहीं किया गया, तो पृथ्वी का पारिस्थितिक संतुलन गंभीर रूप से बिगड़ सकता है। लेकिन इस संकट में ही अवसर भी छिपा हुआ है। यह समय विकास मॉडल को बदलने का है। ऊर्जा के क्षेत्र में नवीकरणीय ऊर्जा, जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और जल ऊर्जा को बढ़ावा देना होगा। शहरों को कंक्रीट के जंगल बनाने के बजाय हरित शहर बनाना होगा। जल प्रबंधन को जन आंदोलन बनाना होगा। वर्षा जल संचयन, जल पुनर्चक्रण और नदियों के संरक्षण पर गंभीरता से काम करना होगा। कृषि को जलवायु अनुकूल बनाना होगा, कम पानी वाली फसलों और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना होगा। साथ ही जिला स्तर पर हीट एक्शन प्लान, जल संरक्षण योजना, वृक्षारोपण अभियान और स्थानीय पर्यावरण संरक्षण कार्यक्रम लागू करने होंगे। जलवायु परिवर्तन से लड़ाई केवल सरकारें नहीं जीत सकतीं, इसके लिए समाज, उद्योग, वैज्ञानिक और आम नागरिक सभी को मिलकर काम करना होगा।

दुनिया की महाशक्तियों के लिए यह समय सबसे बड़ी परीक्षा का समय है। यदि वे केवल आर्थिक विकास और सैन्य शक्ति की दौड़ में ही उलझी रहीं और पृथ्वी के भविष्य की चिंता नहीं की, तो आने वाली पीढ़ियां उन्हें कभी माफ नहीं करेंगी। उन्हें यह समझना होगा कि पृथ्वी बचेगी तो अर्थव्यवस्था भी बचेगी, मानव सभ्यता भी बचेगी और विकास भी बचेगा। यदि पृथ्वी ही तपती और असंतुलित हो गई, तो सारी प्रगति बेकार हो जाएगी। आज आवश्यकता है कि दुनिया की महाशक्तियां कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए कठोर और बाध्यकारी नीतियां बनाएं, जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करें, वनों की कटाई रोकें और हरित प्रौद्योगिकी को बढ़ावा दें। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब पृथ्वी का तापमान इतना बढ़ जाएगा कि अनेक क्षेत्र रहने योग्य नहीं रहेंगे। निश्चित तौर पर जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की चुनौती नहीं, वर्तमान का संकट है। यदि आज निर्णायक कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को एक असंतुलित और तपती हुई पृथ्वी विरासत में मिलेगी। यह तपती हुई पृथ्वी मानव जीवन के लिए विनाश का कारण भी बन सकती है। लेकिन यदि दुनिया समय रहते चेत गई, तो यही संकट एक नए, संतुलित और टिकाऊ विकास मॉडल की शुरुआत भी बन सकता है। पृथ्वी को बचाना अब विकल्प नहीं, मानव अस्तित्व की अनिवार्यता बन चुका है।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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