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बीमा सुरक्षा का माध्यम बने, न कि मुनाफे का जाल


बीमा का मूल उद्देश्य जीवन की अनिश्चितताओं से सुरक्षा प्रदान करना है। यह व्यवस्था व्यक्ति को बीमारी, दुर्घटना या अन्य संकटों के समय आर्थिक सहारा देती है। परंतु आज के दौर में यह व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य से भटकती हुई दिखाई दे रही है। विशेषकर स्वास्थ्य बीमा के क्षेत्र में जो जटिलताएं, अपारदर्शिता और मनमानी देखने को मिल रही है, उसने आमजन के विश्वास को गहरी चोट पहुंचाई है। बीमा, जो सुरक्षा का माध्यम होना चाहिए था, वह कई बार शोषण का उपकरण बनता जा रहा है। वर्तमान समय में चिकित्सा सेवाओं की लागत अत्यधिक बढ़ चुकी है। निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च लाखों में पहुंच जाता है। सरकार के द्वारा रियायती मूल्यों पर उपलब्ध कराई भूमि पर बने अस्पताल आज गरीबों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। ऐसे में स्वास्थ्य बीमा एक आवश्यक सुरक्षा कवच के रूप में उभरता है। बीमा कंपनियां भी इसी भय और भविष्य की अनिश्चितता का उपयोग कर लोगों को पॉलिसी खरीदने के लिए प्रेरित करती हैं। लेकिन वास्तविक समस्या तब सामने आती है जब बीमा धारक को उसकी जरूरत होती है। दावों के निपटान के समय कंपनियां अनेक तकनीकी कारणों, शर्तों और अपवादों का हवाला देकर भुगतान से बचने का प्रयास करती हैं।

विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, हजारों करोड़ रुपये के बीमा दावे हर वर्ष खारिज कर दिए जाते हैं। यह स्थिति न केवल चिंताजनक है, बल्कि बीमा प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। अक्सर देखा गया है कि पॉलिसी लेते समय ग्राहकों को शर्तों की पूरी जानकारी नहीं दी जाती। जटिल भाषा में लिखे गए नियम और शर्तें आम व्यक्ति की समझ से बाहर होती हैं। परिणामस्वरूप, जब दावा प्रस्तुत किया जाता है, तो उन्हीं शर्तों को आधार बनाकर भुगतान रोक दिया जाता है। इस समस्या का एक महत्वपूर्ण पहलू निजी अस्पतालों और बीमा कंपनियों के बीच संभावित गठजोड़ भी है। कई मामलों में अस्पताल अत्यधिक बिलिंग करते हैं और बीमा कंपनियां कम भुगतान करती हैं, जिससे मरीज को भारी आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है। यह स्थिति विशेष रूप से मध्यम और निम्न वर्ग के लोगों के लिए अत्यंत पीड़ादायक होती है। कई बार तो ऐसी घटनाएं भी सामने आती हैं, जहां अस्पताल बकाया राशि के कारण मरीज के शव को तक रोक लेते हैं, जो मानवीय संवेदनाओं के विरुद्ध है।

यदि हम विकसित देशों की तुलना करें, तो वहां बीमा प्रणाली अधिक पारदर्शी और उत्तरदायी है। दावों का निपटान समयबद्ध और न्यायसंगत तरीके से किया जाता है। भारत में भी भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) जैसे नियामक संस्थान मौजूद हैं, जिनका उद्देश्य बीमा क्षेत्र को नियंत्रित और संतुलित करना है। लेकिन व्यावहारिक स्तर पर इनकी प्रभावशीलता पर प्रश्न उठते रहे हैं। नियामक तंत्र की निष्क्रियता या सीमित हस्तक्षेप के कारण बीमा कंपनियों की मनमानी पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। इस स्थिति में सुधार के लिए सबसे पहले बीमा प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाना आवश्यक है। पॉलिसी दस्तावेजों को आम भाषा में प्रस्तुत किया जाना चाहिए ताकि एक सामान्य व्यक्ति भी उसकी शर्तों को समझ सके। इसके साथ ही, बीमा एजेंटों की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए कि वे ग्राहकों को पूरी और सही जानकारी दें। गलत जानकारी देकर पॉलिसी बेचने पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।

दूसरा महत्वपूर्ण कदम है-दावा निपटान प्रक्रिया का सरलीकरण। बीमा दावों के लिए एक मानकीकृत और समयबद्ध प्रक्रिया लागू की जानी चाहिए। यदि कोई दावा खारिज किया जाता है, तो उसके स्पष्ट और उचित कारण बताए जाएं। इसके लिए एक स्वतंत्र अपीलीय तंत्र भी होना चाहिए, जहां उपभोक्ता अपनी शिकायत दर्ज कर सके और उसे त्वरित न्याय मिल सके। तीसरा, अस्पतालों और बीमा कंपनियों के बीच पारदर्शिता सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है। उपचार की लागत को नियंत्रित करने के लिए एक मानक दर प्रणाली लागू की जा सकती है। इससे अनावश्यक बिलिंग और वित्तीय शोषण पर रोक लगेगी। साथ ही, कैशलेस उपचार की सुविधा को अधिक प्रभावी और व्यापक बनाया जाना चाहिए ताकि मरीज को तत्काल आर्थिक राहत मिल सके। चौथा, सरकार को इस क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। एक राष्ट्रीय स्तर की निगरानी प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए, जो बीमा कंपनियों और अस्पतालों की गतिविधियों पर नजर रखे। समय-समय पर ऑडिट और जांच के माध्यम से अनियमितताओं को उजागर किया जाए और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। पांचवां, बीमा साक्षरता को बढ़ावा देना अत्यंत आवश्यक है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को बीमा की शर्तों, अधिकारों और प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी दी जानी चाहिए। विशेष रूप से गरीब और अशिक्षित वर्ग के लिए सरल मार्गदर्शिका और सहायता केंद्र स्थापित किए जाने चाहिए। निश्चित तौर पर बीमा व्यवसाय को केवल लाभ कमाने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में देखा जाना चाहिए। जब तक इस क्षेत्र में नैतिकता, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक आमजन का विश्वास बहाल नहीं हो सकता। आज आवश्यकता इस बात की है कि बीमा प्रणाली को पुनर्गठित कर उसे जनहितकारी बनाया जाए। सरल प्रक्रियाएं, स्पष्ट नियम, सशक्त नियामक तंत्र और जागरूक उपभोक्ता-ये चार स्तंभ ही बीमा क्षेत्र को उसकी वास्तविक दिशा में ले जा सकते हैं। यदि समय रहते इन सुधारों को लागू नहीं किया गया, तो बीमा का यह महत्वपूर्ण साधन आम आदमी के लिए सुरक्षा के बजाय संकट का कारण बना रहेगा।

चिकित्सा और बीमा-दोनों ही ऐसे क्षेत्र हैं जो मूलतः मानव जीवन की सुरक्षा, राहत और सेवा से जुड़े हुए माने जाते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि आज ये दोनों क्षेत्र आमजन के लिए सबसे अधिक जटिल, महंगे और अविश्वसनीय होते जा रहे हैं। एक ओर रियायती जमीन पर बने निजी अस्पताल गरीबों को मुफ्त इलाज देने के अपने दायित्व से बचते नजर आते हैं, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य बीमा के नाम पर बीमा कंपनियां ऐसी शर्तें और प्रक्रियाएं थोप देती हैं कि जरूरत के समय मरीज को बीमा का लाभ मिलना कठिन हो जाता है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि संवेदनहीन व्यवस्था का प्रतीक बनती जा रही है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिल्ली के रियायती जमीन पर बने अस्पतालों को नोटिस जारी करना केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि व्यवस्था को आईना दिखाने जैसा है। जब अस्पताल रियायती जमीन लेते समय गरीबों के इलाज का वायदा करते हैं, तो वह केवल कागजी औपचारिकता नहीं, बल्कि सामाजिक दायित्व होता है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि लाभ तो निजी अस्पताल उठा रहे हैं और दायित्व निभाने से बच रहे हैं। यही स्थिति बीमा क्षेत्र में भी दिखाई देती है, जहां पॉलिसी बेचते समय बड़े-बड़े वायदे किए जाते हैं, लेकिन क्लेम के समय छोटी-छोटी तकनीकी वजहों से दावे खारिज कर दिए जाते हैं।
आम आदमी सालों तक प्रीमियम भरता रहता है, लेकिन जरूरत के समय उसे राहत नहीं मिलती। इस स्थिति में सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता एक सकारात्मक संकेत है। जिस प्रकार अदालत ने अस्पतालों से जवाब मांगा है, उसी प्रकार बीमा कंपनियों की कार्यप्रणाली पर भी सख्त निगरानी और स्पष्ट नियम बनने चाहिए, ताकि बीमा वास्तव में सुरक्षा का माध्यम बने, न कि मुनाफे का जाल। सरकारों की जिम्मेदारी केवल नीतियां बनाने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उनके क्रियान्वयन की सख्त निगरानी भी होनी चाहिए। यदि रियायती जमीन लेने वाले अस्पताल गरीबों का मुफ्त इलाज नहीं करते तो उनसे जमीन का बाजार मूल्य वसूला जाना चाहिए या उनकी मान्यता पर पुनर्विचार होना चाहिए। इसी तरह बीमा कंपनियों को भी क्लेम प्रक्रिया सरल, पारदर्शी और समयबद्ध बनानी चाहिए। स्वास्थ्य और बीमा दोनों ही आम आदमी की जीवन सुरक्षा से जुड़े विषय हैं, इसलिए इनमें मुनाफाखोरी की मानसिकता पर नियंत्रण आवश्यक है। यदि सरकार, न्यायपालिका और नियामक संस्थाएं मिलकर सख्ती और पारदर्शिता सुनिश्चित करें, तो चिकित्सा और बीमा दोनों क्षेत्रों में आमजन का विश्वास फिर से स्थापित हो सकता है। अन्यथा सेवा के ये क्षेत्र केवल व्यवसाय बनकर रह जाएंगे और गरीब आदमी इलाज और बीमा दोनों के बीच पिसता रहेगा।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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