भारत सरकार द्वारा वर्ष 2014-15 में आरंभ किया गया नमामि गंगे कार्यक्रम (एनजीपी) आज देश के सबसे व्यापक और बहु-आयामी नदी पुनरुद्धार अभियानों में से एक के रूप में स्थापित हो चुका है। गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों के संरक्षण, स्वच्छता और पुनर्जीवन के उद्देश्य से प्रारंभ यह कार्यक्रम मार्च 2026 तक विस्तारित किया जा चुका है। इसके समानांतर, राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (एनआरसीपी) के माध्यम से अन्य नदियों में प्रदूषण नियंत्रण के प्रयास भी जारी हैं।

यह कार्यक्रम केवल अवसंरचना निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें पारिस्थितिकी, सामुदायिक भागीदारी, वैज्ञानिक निगरानी और तकनीकी नवाचार का समन्वित उपयोग किया गया है, जिससे गंगा बेसिन में दीर्घकालिक सुधार की दिशा में ठोस आधार तैयार हुआ है।
परियोजनाओं की स्थिति: व्यापक निवेश और प्रगति
फरवरी 2026 तक नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत कुल 524 परियोजनाओं को 43,030 करोड़ रुपये की लागत से स्वीकृति प्रदान की गई, जिनमें से 355 परियोजनाएं पूर्ण हो चुकी हैं। इन परियोजनाओं में प्रमुख रूप से सीवेज उपचार, घाट विकास, नदी सतह की सफाई, जैव विविधता संरक्षण और जन-जागरूकता शामिल हैं।
इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (एनआरसीपी) के अंतर्गत 17 राज्यों के 100 शहरों में 58 नदियों को कवर करते हुए 8,970.51 करोड़ रुपये की लागत से परियोजनाएं संचालित की जा रही हैं, जिनसे 3,019 एमएलडी सीवेज उपचार क्षमता का निर्माण हुआ है।
सीवेज अवसंरचना और उपचार क्षमता
राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) द्वारा प्रदूषण नियंत्रण के लिए सीवेज अवसंरचना पर विशेष ध्यान दिया गया है।
| घटक | विवरण |
|---|---|
| कुल सीवरेज परियोजनाएं | 218 |
| कुल लागत | 35,794 करोड़ रुपये |
| कुल उपचार क्षमता | 6,610 एमएलडी |
| पूर्ण परियोजनाएं | 138 |
| चालू क्षमता | 4,050 एमएलडी |
यह प्रगति दर्शाती है कि गंगा में गिरने वाले अनुपचारित सीवेज को नियंत्रित करने के लिए संरचनात्मक क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
तकनीकी निगरानी और ई-फ्लो प्रबंधन
गंगा और यमुना नदियों की जल गुणवत्ता तथा सीवेज उपचार संयंत्रों के प्रदर्शन की निगरानी हेतु “प्रयाग” नामक ऑनलाइन डैशबोर्ड स्थापित किया गया है। यह रियल-टाइम डेटा आधारित प्रणाली नीति निर्माण और त्वरित हस्तक्षेप के लिए महत्वपूर्ण साबित हो रही है।
इसके साथ ही, अक्टूबर 2018 में अधिसूचित न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह (ई-फ्लो) मानकों को सफलतापूर्वक लागू किया गया है, जिसकी निगरानी केंद्रीय जल आयोग द्वारा की जा रही है। इससे नदी के प्राकृतिक प्रवाह और पारिस्थितिकी संतुलन को बनाए रखने में मदद मिली है।
जैव विविधता संरक्षण: एक नई दिशा
गंगा पुनरुद्धार कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू जैव विविधता संरक्षण है। इसके अंतर्गत अनेक उल्लेखनीय पहलें की गई हैं:
- उत्तर प्रदेश में 7 जैव विविधता पार्क स्थापित किए गए।
- बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में 5 आर्द्रभूमि क्षेत्रों को विकसित किया गया।
- 33,024 हेक्टेयर क्षेत्र में वृक्षारोपण (414 करोड़ रुपये व्यय)।
- 203 लाख भारतीय मेजर कार्प फिंगरलिंग का संवर्धन।
- गंगा डॉल्फिन संरक्षण हेतु पहली डॉल्फिन एम्बुलेंस की शुरुआत।
- 8 डॉल्फिन का सफल बचाव और पुनर्वास।
साथ ही, “सून्स-साथी नेटवर्क” के माध्यम से सामुदायिक भागीदारी को सुदृढ़ किया गया है, जिसमें स्वयंसेवकों और स्थानीय समुदायों की सक्रिय भूमिका सुनिश्चित की गई है।
जलीय प्रजातियों का संरक्षण और पुनर्वास
गंगा और इसकी सहायक नदियों में कछुओं, घड़ियालों और अन्य संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण हेतु वैज्ञानिक कार्यक्रम चलाए गए हैं।
- 22 नदियों में 3,037 घड़ियाल दर्ज किए गए।
- 387 घोंसलों से 7,979 कछुओं का सफल पुनर्वास (96.7% सफलता दर)।
- रेडियो-टैगिंग के माध्यम से प्रजातियों की निगरानी।
चंबल नदी में स्मार्ट-आधारित गश्त प्रणाली लागू कर संरक्षण प्रयासों को तकनीकी आधार प्रदान किया गया है।
औद्योगिक प्रदूषण में कमी
औद्योगिक इकाइयों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने हेतु कड़े उपाय किए गए हैं। जाजमऊ, बंथर और मथुरा में सीईटीपी परियोजनाओं को मंजूरी दी गई, जिनमें से दो पूर्ण हो चुकी हैं।
| संकेतक | वर्ष 2017 | वर्ष 2024 |
|---|---|---|
| बीओडी भार | 26 टीपीडी | 10.75 टीपीडी |
| बहिःस्राव निर्वहन | 349 एमएलडी | 265.56 एमएलडी |
यह डेटा स्पष्ट करता है कि औद्योगिक प्रदूषण में उल्लेखनीय गिरावट आई है।
जल गुणवत्ता में सुधार: राज्यवार स्थिति
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार गंगा की मुख्य धारा में प्रदूषण की स्थिति में सुधार दर्ज किया गया है।
| राज्य | 2018 स्थिति | 2025 स्थिति | अवलोकन |
|---|---|---|---|
| उत्तराखंड | प्रदूषित खंड | कोई पीआरएस नहीं | पूर्ण सुधार |
| उत्तर प्रदेश | कन्नौज–वाराणसी | बिजनौर–तारीघाट | आंशिक सुधार |
| बिहार | बक्सर–भागलपुर | भागलपुर–खलगांव | आंशिक प्रदूषण |
| झारखंड | कोई नहीं | कोई नहीं | स्थिर स्थिति |
| पश्चिम बंगाल | त्रिवेणी–डायमंड | बहरामपुर–डायमंड | सुधार |
इसके अतिरिक्त, पीएच और घुलित ऑक्सीजन (डीओ) के स्तर सभी स्थानों पर स्नान योग्य मानकों के अनुरूप पाए गए हैं।
जैविक जल गुणवत्ता और पारिस्थितिक संकेतक
2024-25 के दौरान की गई जैव निगरानी में गंगा और यमुना के अधिकांश स्थलों पर जल गुणवत्ता ‘अच्छी’ से ‘मध्यम’ श्रेणी में पाई गई। बेंथिक मैक्रो-इनवर्टेब्रेट्स की उपस्थिति यह संकेत देती है कि नदी की पारिस्थितिकीय स्थिति में सुधार हुआ है और जलीय जीवन के लिए अनुकूल वातावरण विकसित हो रहा है।
जन भागीदारी और संस्थागत ढांचा
गंगा संरक्षण को जन आंदोलन बनाने के लिए विभिन्न स्तरों पर संस्थागत तंत्र विकसित किया गया है:
- 139 जिला गंगा समितियों का गठन
- जनवरी 2026 तक 5,118 बैठकें आयोजित
- गंगा टास्क फोर्स द्वारा निगरानी और जन-जागरूकता
- गंगा उत्सव, वृक्षारोपण अभियान, घाट गतिविधियां
इसके अतिरिक्त, “गंगा नॉलेज पोर्टल” के माध्यम से 1,346 से अधिक दस्तावेजों का डिजिटल भंडार तैयार किया गया है, जो शोधकर्ताओं और नीति निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण संसाधन है।
Source: PIB